बकरीदः क्या मुसलमान साल में तीन ईद मनाते हैं?

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दुनिया भर में मुस्लिम समुदाय के लोग इस सप्ताहांत बकरीद का त्योहार मनाएँगे. भारत में बकरीद रविवार 10 जुलाई को हो रही है. वहीं सऊदी अरब और खाड़ी के देशों में ये त्योहार एक दिन पहले यानी नौ जुलाई को मनाया जा रहा है.
भारत में इससे पहले एक और ईद मनाई जा चुकी है. दो मई को भारत में ईद-उल-फ़ितर मनाया गया.
ऐसे में मन में ये सवाल उठने लगता है कि मुसलमान साल में कितनी ईद मनाते हैं. बकरीद के मौक़े पर एक बार फिर पढ़िए बीबीसी पर प्रकाशित हुआ एक विशेष लेख.

कुछ लोगों का मानना है कि मुसलमान सिर्फ़ दो ही ईद मनाते हैं, ईद-उल-फ़ितर और ईद-उल-अज़हा. वो भी अपनी जगह सही हैं क्योंकि उनका तर्क है कि नबी यानी हज़रत मोहम्मद के जन्म से ख़ुशी तो होती है लेकिन उनके जन्मदिन को ईद से तुलना नहीं की जा सकती है.
एक तीसरा पक्ष भी है जो कहता है कि इसे जश्न-ए-मिलाद-उन-नबी कहा जाना चाहिए. यानी हज़रत मोहम्मद के जन्म का जश्न तो मनाया जाए लेकिन इसे ईद नहीं कहा जाए.
नबी यानी इस्लाम के आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद (570-632) का जन्म सऊदी अरब के शहर मक्का में साल 570 ईस्वी में इस्लामिक वार्षिक कैलेंडर के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल की 12 तारीख़ को हुआ था.
इस्लामिक कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित होता है इसलिए इस्लामिक तारीख़ और अंग्रेज़ी तारीख़ अलग-अलग होती है.
मुसलमानों का विश्वास है कि अल्लाह ने अलग-अलग समय पर दुनिया के हर हिस्से में अपना संदेश देने के लिए अपने दूत भेजे हैं जिन्हें नबी या पैग़म्बर (पैग़ाम यानी संदेश देने वाला) कहा जाता है. हज़रत मोहम्मद अल्लाह के भेजे गए आख़िरी दूत हैं.
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ईद-उल-फ़ितर

ईद-उल-फ़ितर को भारत में आम ज़ुबान में मीठी ईद या सेवई वाली ईद कहते हैं. इस ईद के दौरान सेवई एक ख़ास पकवान के रूप में बनाई जाती है, इसीलिए इसे मीठी ईद भी कहते हैं.
ये ईद मुसलमानों के पवित्र महीने रमज़ान की समाप्ति पर मनाई जाती है. रमज़ान के दौरान मुसलमान पूरे महीने रोज़ा रखते हैं और रमज़ान का महीना ख़त्म होने की ख़ुशी में ईद मनाई जाती है.

ईद-उज़-ज़ोहा या बकरीद

ईद-उल-अज़हा या ईद-उज़-ज़ोहा ये ईद इस्लामिक कैलेंडर के आख़िरी महीने ज़िलहिज्ज की दसवीं तारीख़ को मनाया जाता है.
ये ईद मुसलमानों के एक पैग़म्बर और हज़रत मोहम्मद के पूर्वज हज़रत इब्राहिम की क़ुर्बानी को याद करने के लिए मनाई जाती है.
मुसलमानों का विश्वास है कि अल्लाह ने इब्राहिम की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ की क़ुर्बानी मांगी. इब्राहिम ने अपने जवान बेटे इस्माइल को अल्लाह की राह में क़ुर्बान करने का फ़ैसला कर लिया.

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लेकिन वो जैसे ही अपने बेटे को क़ुर्बान करने वाले थे अल्लाह ने उनकी जगह एक दुंबे को रख दिया. अल्लाह केवल उनकी परीक्षा ले रहे थे.
दुनिया भर में मुसलमान इसी परंपरा को याद करते हुए ईद-उज़-ज़ोहा या ईद-उल-अज़हा मनाते हैं. इस दिन किसी जानवर (जानवर कैसा होगा इसकी भी ख़ास शर्ते हैं) की क़ुर्बानी दी जाती है. इसीलिए भारत में इसे बक़रीद भी कहा जाता है.
इस ईद का संबंध हज से भी है जब दुनिया के लाखों मुसलमान हर साल पवित्र शहर मक्का जाते हैं. बकरे की क़ुर्बानी हज का एक अहम हिस्सा है.

ईद मिलाद-उन-नबी

दुनिया भर के मुसलमान हज़रत मोहम्मद के जन्म को तो पवित्र मानते हैं लेकिन इसे मनाने के अलग-अलग रूप हैं. सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को मनाने को लेकर कोई ख़ास मतभेद नहीं हैं.
ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद इमाम ख़ुमैनी ने ये कहा था कि हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को दुनिया भर में उनके संदेश को पहुंचाने के रूप में मनाया जाना चाहिए. इसलिए शिया मुसलमान इस दिन को याद तो करते हैं लेकिन इस दिन कोई विशेष आयोजन नहीं करते हैं.
लेकिन ख़ुद सुन्नी मुसलमानों के अंदर इसको लेकर मतभेद हैं. सऊदी अरब में इसे ईद के रूप में नहीं मनाया जाता है, लेकिन तुर्की और कई दूसरे इस्लामी देशों में हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है.
भारत की बात करें तो यहां के सुन्नी मुसलमान दो ख़ास हिस्सों में बंटे हुए हैं. एक हिस्सा ख़ुद को बरेलवी मुसलमान कहता है जबकि दूसरा हिस्सा ख़ुद को देवबंदी मुसलमान कहता है.
बरेलवी मुसलमान हज़रत मोहम्मद के जन्म को बहुत धूम-धाम से मनाते हैं.
इस दिन बरेलवी मुसलमान ख़ास आयोजन करते हैं. कई जगहों पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं जिनमें इस्लाम और हज़रत मोहम्मद के जीवन के बारे में लोगों को बताया जाता है.
हज़रत मोहम्मद की शान में जुलूस निकाले जाते हैं. एक से एक बढ़िया पकवान बनते हैं. ग़रीबों और यतीमों को खाना खिलाया जाता है.
लेकिन देवबंदी मुसलमान इस अवसर पर कोई ख़ास आयोजन नहीं करते हैं. उनका कहना है कि इस्लाम में जन्मदिन मनाने की कोई प्रथा नहीं है.
भारत में भी इसे बड़े पैमाने पर मनाने की जानकारी नहीं मिलती है. हालांकि बरेलवी मुसलमान कहते हैं कि भारत में मुग़लों के दौर में भी हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को बड़े धूम-धाम से मनाने का रिवाज रहा है.
1989 में वीपी सिंह की नेशनल फ़्रंट सरकार ने हज़रत मोहम्मद के जन्मदिवस को सरकारी छुट्टी घोषित कर दिया जिसके बाद इसके बारे में ज़्यादा चर्चा होने लगी और मुसलमानों का एक हिस्सा भी इसे बढ़-चढ़ कर मनाने लगा.
एक ख़ास बात ये है कि मुसलमानों के विश्वास के मुताबिक़ हज़रत मोहम्मद का देहांत भी इसी दिन हुआ था. इसलिए इसे बारह-वफ़ात (मौत का दिन) भी कहा जाता है. जो लोग ईद मिलाद-उन-नबी के दिन ख़ुशी नहीं मनाते हैं, वो एक तर्क ये भी देते हैं कि हज़रत मोहम्मद की मौत भी उसी दिन यानी 12 रबी-उल-अव्वल को हुई थी तो उस दिन ख़ुशी कैसे मनाई जा सकती है.
सबके अपने-अपने तर्क हैं. कुछ लोग हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को ईद मानते हैं, कोई नहीं. लेकिन इसमें कोई मतभेद नहीं कि दुनिया के सारे मुसलमान दो ईद यानी ईद-उल-फ़ितर और ईद-उल-अज़हा एक साथ मिलकर मनाते हैं.
(ये लेख इससे पूर्व 21 नवंबर 2011 को ईद-मिलाद-उन-नबी के मौक़े पर प्रकाशित किया गया था)
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