फ़्रांस को पछाड़ने के बाद भी भारत इतना पीछे कैसे

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
वर्ल्ड बैंक की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में छठे पायदान पर पहुँच गई है.
भारत ने आर्थिक तौर पर फ़्रांस को सातवें पायदान पर धकेल दिया है और अब दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है.
भारत से आगे अब ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, चीन और अमरीका हैं.
विश्व बैंक की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी पिछले साल के आखिर में 2.597 ट्रिलियन डॉलर था जबकि फ़्रांस का 2.582 ट्रिलियन डॉलर.
आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक़ कई तिमाहियों की मंदी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था जुलाई 2017 से फिर से मज़बूती की राह पर है. भारत की आबादी इस समय करीब 1 अरब 34 करोड़ है और यह दुनिया का सबसे आबादी वाला मुल्क बनने की तरफ़ बढ़ रहा है.
भारत की जीडीपी
फ़्रांस आबादी के लिहाज़ से भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे सूबों से भी टक्कर नहीं ले सकता. फ़्रांस की आबादी 6 करोड़ 7 लाख के आसपास है.
आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक के आंकड़े बताते हैं कि एक दशक पहले तक भारत की जीडीपी फ़्रांस की तक़रीबन आधी थी.
नोटबंदी और वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) लागू करने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ ठहराव आया था, लेकिन इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई तेज़ी से भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटती दिखी.
आंकड़ों की बात करें तो पिछले एक दशक में भारत की जीडीपी दोगुनी हो चुकी है और संभावना जताई जा रही है कि अभी ग्रोथ के मामले में चीन के साथ क़दम मिलाकर चल रही भारतीय अर्थव्यवस्था जल्द ही चीनी अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ सकती है.


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क्या ये वाकई बहुत बड़ी उपलब्धि?
पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी कहा था कि साल 2018 में भारत की ग्रोथ 7.4 फ़ीसदी रह सकती है और टैक्स सुधारों एवं घरेलू खर्च में बढ़ोतरी के चलते 2019 में भारत की विकास दर 7.8 फीसदी तक पहुंच सकती है. जबकि इस दौरान दुनिया की औसत विकास दर के 3.9 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है.
लेकिन सवाल उठता है कि जीडीपी में फ़्रांस से आगे निकलना क्या वाकई बहुत बड़ी उपलब्धि है और या सिर्फ़ आंकड़ों की खुशफहमी है. इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले ये जान लेते हैं आख़िर ये जीडीपी बला क्या है?
जीडीपी किसी भी देश की आर्थिक सेहत को मापने का सबसे ज़रूरी पैमाना है. जीडीपी किसी ख़ास अवधि के दौरान वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल क़ीमत है. जीडीपी को दो तरह से पेश किया जाता है क्योंकि उत्पादन की लागत महंगाई के साथ घटती-बढ़ती रहती है, यह पैमाना है कॉन्स्टैंट प्राइस.

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भारत की कॉन्स्टैंट प्राइस
इसके तहत जीडीपी की दर और उत्पादन का मूल्य एक आधार वर्ष में उत्पादन की क़ीमत पर तय होता है.
मसलन अगर आधार वर्ष 2010 है तो उसके आधार पर ही उत्पादन मूल्य में बढ़त या गिरावट देखी जाती है.
जीडीपी को जिस दूसरे तरीके से पेश किया जाता है वो है करेंट प्राइस. इसके तहत उत्पादन मूल्य में महंगाई दर भी शामिल होती है.
भारत की कॉन्स्टैंट प्राइस गणना का आधार वर्ष अभी 2011-12 है.
मसलन अगर 2011 में देश में सिर्फ़ 100 रुपये की तीन वस्तुएं बनीं तो कुल जीडीपी हुई 300 रुपए. और 2017 तक आते-आते इस वस्तु का उत्पादन दो रह गया, लेकिन क़ीमत हो गई 150 रुपए तो नॉमिनल जीडीपी 300 रुपए हो गया.
लेकिन असल में हुआ क्या, भारत की तरक्की हुई या नहीं?


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भारत की तुलना बेमानी
यहीं बेस ईयर का फॉर्मूला काम आता है. 2011 की कॉन्स्टैंट प्राइस (100 रुपए) के हिसाब से वास्तविक जीडीपी हुई 200 रुपए. अब साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि जीडीपी में गिरावट आई है.
ये तो सही है कि भारत में विनिर्माण गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन लोगों के जीवनस्तर के मामले में फ़्रांस से भारत की तुलना करना बेमानी ही होगा. फ़्रांस के जीवनस्तर के मानकों के आगे भारत कहीं नहीं ठहरता.
लोगों की प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो एक औसत भारतीय कमाई 1,940 डॉलर है, जबकि एक औसत फ्रांसीसी की कमाई 38,477 डॉलर यानी 20 गुना से अधिक.
इस लिस्ट में अमरीका 59,532 डॉलर के आंकड़े के साथ पहली पायदान पर है, जबकि कनाडा (45,032 डॉलर) दूसरे नंबर पर और जर्मनी (44,470 डॉलर) तीसरे नंबर पर. भारत के पड़ोसी चीन में प्रति व्यक्ति सालाना औसत कमाई 8,827 डॉलर है.
अगर परचेज़ पावर पैरिटी (यानी किसी सामान को ख़रीदने की क्षमता) की बात करें तो वर्ल्ड बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत की औसतन प्रति व्यक्ति आय 7,060 डॉलर है, जबकि फ़्रांस की 43,720 डॉलर.
इस रैंकिंग में भारत दुनिया में 123वें स्थान पर है, जबकि फ़्रांस 25वें पायदान पर.
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