नज़रिया: कश्मीर बदल चुका है, क्या केंद्र सरकार का फ़ैसला बदलेगा

    • Author, अल्ताफ़ हुसैन
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

मुसलमानों में पाक माना जाने वाला रमज़ान का महीना अब ख़त्म होने को है. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या केंद्र सरकार कश्मीर में एकतरफा सीज़फायर को बढ़ाएगी?

हालांकि सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा को देखें तो सत्ताधारी भाजपा के समर्थक चाहते हैं कि इस सीज़फायर को तुरंत वापस ले लिया जाए. उनका मानना है कि सीज़फायर ने शांति क़ायम करने की कोशिशों में कोई मदद नहीं की है क्योंकि इसे लागू करने के बावजूद चरमपंथियों के ग्रेनेड और आइईडी हमले जारी रहे.

हालांकि सीज़फायर का विरोध करने वालों को ये भी डर है कि घाटी में सीज़फायर लागू रहने से चरमपंथी गुटों को फिर से एक साथ आने में मदद मिलेगी.

लेकिन ये सारी बातें ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर हैं.

अब पहले वाले हालात नहीं हैं

कश्मीर से जुड़े मामलों पर तीन दशकों से अधिक नज़र रखने वालों का मानना है अब हालात पहले जैसे नहीं है.

उनका कहना है कि अब चरमपंथी गतिविधियों से ज़्यादा आम लोग का विरोध देखने को मिलता है.

कश्मीर के कई युवाओं ने चरमपंथ का रुख़ किया है, लेकिन उनकी तादात अभी कम है.

ये आंकड़ा कम ज़रूर है लेकिन ये इन युवाओं की मानसिकता को दर्शाता है जो ताक़तवर भारतीय सेना के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए तैयार हैं. वो मारने के लिए कम और मरने के लिए अधिक हथियार उठाने के लिए तैयार हैं.

'बंदूकें चलाकर शांति नहीं लाई जा सकती'

ऑपरेशन ऑल ऑउट शुरू करने वाले सेना प्रमुख बिपिन रावत ने खुद इस बात को माना था कि बंदूकों के सहारे घाटी में शांति नहीं लाई जा सकती. उन्होंने कहा था, "बंदूकों के ज़रिए ना तो सेना का मकसद पूरा हो सकता है और ना ही चरमपंथियों का."

पर्यवेक्षक और शायद नीति निर्माता भी घाटी के लोगों के गुस्से की अनदेखी करते रहे हैं.

साल 2016 में हिज़बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत की घटना ने यहां हलात बदल दिए. ऐसा नहीं था कि वो हिज़बुल कमांडर थे और इससे संगठन को बड़ा नुक़सान हुआ था. लेकिन इसके बाद से घाटी में आम लोगों के प्रदर्शन बढ़े और इन प्रदर्शनों के दौरान कई लोगों की मौतें हुई

एकतरफा सीज़फायर लागू करने से पहले ये आम बात थी कि कश्मीर के आम लोग मुठभेड़ वाली जगह के नज़दीक चरमपंथियों के समर्थन में प्रदर्शन करते थे. कई बार वो इन प्रदर्शनों के ज़रिए चरमपंथियों को भागने में भी मदद करते थे.

बड़े स्तर पर हो रहे इन भारत विरोधी प्रदर्शनों और आम लोगों की मौतों ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की चिंता बढ़ा दी थी.

कई राजनेता प्रधानमंत्री मोदी से अनकहे शब्दों में ये मांग करने लगे थे कि वो कश्मीर के युवाओं को गले लगाने के अपने वायदे पर अमल करें. बीते स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने कश्मीर के मुद्दे का जिक्र करते हुए कहा था, "न गाली से न गोली से, कश्मीर की समस्या सुलझेगी गले लगाने से."

अब छिप कर नहीं रहते चरमपंथी

कुछ लोगों के इस तर्क में कोई दम नहीं कि चरमपंथी छिपे हुए हैं और सीज़फायर की वजह से उन्हें दोबारा एकजुट होने का मौक़े मिलेगा. क्योंकि आजकल चरमपंथी बमुश्किल अंडरग्राउंड होते हैं.

आजकल चरमपंथी गुटों में शामिल होने के बाद लोग चाहते हैं कि जनता और सुरक्षाबल उनके बारे में जानें और वो सोशल मीडिया के ज़रिए खुलकर सामने आते हैं. वो हाथों में बंदूक लिए अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड करते हैं.

ये सब उन दिनों से बिल्कुल उलट है जब चरमपंथी अपनी पहचान छिपाकर रखते थे और भेष बदलकर घूमते थे.

सीज़फायर के बाद बदले हालात

रमज़ान के महीने में जब एकतरफा सीज़फायर लागू करने की घोषणा की गई तो चरमपंथियों ने इसे मानने से इनकार कर दिया. इसके बावजूद सीज़फायर के दौरान हिंसा के स्तर और मौत के आंकड़ों में कमी आई है.

सीज़फायर लागू होने के बाद पंद्रह दिनों में पत्थरबाज़ी की करीब 45 घटनाएं हुईं, लेकिन ये घटनाएं मुठभेड़ वाली जगह के नज़दीक ना के बराबर हुईं.

जबकि पिछले साल इसी वक्त, मुठभेड़ वाली जगह के पास नागरिकों और सुरक्षाबलों के बीच झड़पों की 67 घटनाएं हुई थीं. माना जा रहा है कि सीज़फायर के बाद सुरक्षाबलों के अभियान रोकने की वजह से इन घटनाओं में कमी आई है.

पहले ज़्यादातर मौतें मुठभेड़ के बाद होने वाले प्रदर्शनों में होती थीं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ सीज़फायर लागू होने के बाद पहले 15 दिनों में चरमपंथी हिंसा की करीब 29 घटनाएं हुईं.

इन घटनाओं में तीन आम नागरिकों की मौत हुई जबकि 13 लोग घायल हो गए. सेना के एक जवान की भी जान गई है और 11 जवान घायल हुए हैं. इन घटनाओं में 11 चरमपंथी भी मारे गए हैं.

बदलाव दिखा पर असर नहीं

एकतरफा सीज़फायर लागू होने के बाद पूरी स्थिति में बदलाव तो देखा गया, लेकिन इसका जितना असर पड़ना चाहिए था, वो नहीं पड़ पाया.

इसकी वजह नौहट्टा जैसी घटनाएं रहीं जिसमें सुरक्षाबलों ने आम लोगों की हिंसक भीड़ को तितर-बितर करने में संयम नहीं बरता. एक जून को हुई घटना में सीआरपीएफ का एक वाहन नौहट्टा में एक युवक, कैसर अहमद बट पर चढ़ गया था.

इस घटना से गुस्साए पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने ट्वीट किया, "पहले वो प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए जीप के सामने लोगों को बांधकर गांव में घूमाते थे. लेकिन अब वो जीप सीधे प्रदर्शनकारियों पर चढ़ा देते हैं. क्या ये आपका नया तरीका है मुख्यमंत्री महबूबा साहिबा? सीज़फायर के दौरान बंदूक का इस्तेमाल नहीं हो सकता तो जीप का इस्तेमाल ही सही?"

सीज़फायर शुरू होने के पहले 5 मई को भी ऐसी ही घटना हुई थी. जब स्थानीय पुलिस के एक वाहन ने राजधानी के नूरबाग इलाके में 21 साल के नागरिक आदिल को कुचल दिया था.

घटना का वीडियो देखने पर पता चलता है कि गाड़ी जानबूझकर चढ़ाई गई थी, इसके बावजूद ड्राइवर के ख़िलाफ़ सिर्फ लापरवाही से गाड़ी चलाने का मामला बनाया गया.

ऐसी घटनाओं को मानवाधिकार के उल्लंघन के तौर पर देखा जाता है और कश्मीर के आम लोगों में इससे गुस्सा और बढ़ता है.

विश्वास बढ़ाने के लिए

सरकार ने सीज़फायर की घोषणा की. अब अगर सीज़फायर के बाद सरकार बातचीत की पहल करे तो ये विश्वास बढ़ाने के लिए एक बड़ा कदम हो सकता है.

अलगाववादी नेता कई बार कह चुके हैं कि वो बातचीत के लिए तैयार हैं. लेकिन भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने उनकी इन बातों की अनदेखी की है.

अलगाववादी नेता एक संयुक्त प्रेस वार्ता में ये भी कह चुके हैं कि अगर कश्मीर समस्या का हल निकालने की कोशिश की जाती है तो वो भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों की "ज़रूरतों और चिंताओं" को ख्याल रखेंगे.

उनकी वार्ता से ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो सभी पक्षों की बातों को ध्यान में रखते हुए कश्मीर के लोगों की आज़ादी की मांग के प्रति समझौता करने को भी तैयार हैं.

लेकिन भारत की सरकार ने अभी तक उनकी इस बात का कोई जवाब नहीं दिया है कि उनकी ओर से प्रस्तावित बातचीत का एजेंडा क्या होगा. और ना ही किसी को बातचीत का औपचारिक आमंत्रण ही दिया गया है. इस कारण अब तक इस दिशा में कोई तरक्की नहीं हो पाई है.

गृहमंत्री राजनाथ सिंह गुरुवार को दो दिन के जम्मू-कश्मीर दौरे पर श्रीनगर पहुंचे हैं. उनका कहना है कि सरकार के शांति कायम करने के इरादों के तहत वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा अब तक 11 बार कश्मीर आ चुके हैं.

लेकिन जहां तक सीज़फायर आगे बढ़ाने की बात है इस मसले पर उन्होंने कहा कि इसके लिए सारे विकल्प खुले हैं.

(अल्ताफ़ हुसैन स्वतंत्र पत्रकार हैं. वो बीबीसी के लिए उत्तर भारत के संवाददाता रह चुके हैं. उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ भी काम किया है.)

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