ग्राउंड रिपोर्ट: पिटाई नहीं तो आमद ख़ान की मौत की वजह क्या?

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दांतल, जैसलमेर से
जिस आईनाथ के मंदिर में हुई 'पिटाई आमद ख़ान के जान जाने की वजह बनी' वो मंदिर उसके लिए अनजान नहीं था.
उसका पुराना घर मंदिर के बिल्कुल सामने ही तो था!
उस दिन, 27 सितंबर, नवरात्रि के सांतवें दिन, भी वो मंदिर के दरवाज़े के बाहर साज़ लेकर बैठा था- भूरे रंग के दोपल्ले दरवाज़े के ठीक बाईं तरफ़, फ़र्श पर.
जब पुलिस के मुताबिक़ भोपा रमेश चंद्र सुथार से उसकी बहस हुई और आमद ख़ान को पीटा गया और इसके बाद उनकी मौत हो गई.
गांववाले हालांकि पिटाई की बात को ग़लत बताते हैं.

क्या पिटाई नहीं हुई?
गांव के रसूख़दार मेहताब सिंह कहते हैं, "ख़ान और सुथार की बहस मंगणयार आमद ख़ान के अकेले जाने पर हुई थी... कि अकेला आदमी रात भर किस तरह गा पाएगा."
वो कहते हैं कि बात बहस पर ही ख़त्म हो गई थी किसी तरह की मारपीट नहीं हुई.
पूर्व ज़िला परिषद सदस्य खेत सिंह भाटी कहते हैं, "आमद ख़ान को दिल की बीमारी थी. उसे पहले भी दौरा पड़ा था. इस बार भी उसने दिल में दर्द की शिकायत की थी."

मौत से जुड़े अहम सवाल
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कहा गया है कि आमद ख़ान की मौत सिर में गहरी चोट लगने से हुई. हालांकि विसरा की फ़ाइनल रिपोर्ट अभी एफ़एसएल से आनी है.
वैसे आमद ख़ान का पोस्टमॉर्टम मौत के क़रीब हफ़्ते भर बाद हुआ, यानी चार अक्तूबर को, जबकि मौत पुलिस एफ़आईआर के मुताबिक़ 27 सितंबर को रात साढ़े दस से ग्यारह बजे के बीच हुई और उन्हें दूसरे दिन दफ़ना भी दिया गया था.
फलसून के थाना प्रभारी गिरधर सिंह ने कहा, "दो अक्टूबर को तीन लोगों- रमेश सुथार, तारा राम और श्यामलाल के ख़िलाफ़ हत्या, सबूत छिपाने, अपहरण, मारपीट और दूसरी धाराओं में एफ़आईआर दर्ज हुई."
रमेश सुथार फ़िलहाल पंद्रह दिनों की न्यायिक हिरासत में हैं जबकि अन्य दो अभियुक्त फ़रार हैं.

'दबंगई नहीं करते थे'
गांव वाले कहते हैं कि तारा राम और श्यामलाल को मामले में यूं ही घसीटा गया है, उनसे तो किसी तरह की बातचीत भी नहीं हुई.
किसान अमेद सिंह कहते हैं, "तारा राम को तो सुलह करवाने के लिए रोका गया था. उसे तो दूसरे दिन दुबई काम पर जाना था."
सुथार बढ़ई का काम करते हैं और तारा राम के अलावा रमेश सुथार गांव वालों के मुताबिक़ काम के लिए बाहर जाया करते थे.
अभियुक्तों के चचेरे भाई गयाना राम कहते हैं, "कहा जा रहा है कि हम मांगणयारों के साथ दबंगई करते थे अगर हम ऐसा करते तो वो हमारे घर के बिल्कुल सामने रह रहे होते."
वो सामने किसी मंगणयार के अब बंद पड़े घर की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं.

"ख़ुद ही पोस्टमॉर्टम चाहते थे तो..."
लेकिन अगर भोपा रमेश सुथार की कोई ग़लती ही नहीं थी तो फिर सुलह किस बात की, क्योंकि गांववालों का दावा है कि वो आमद ख़ान के परिवार के लिए 10-12 लाख रुपयों तक का इंतज़ाम करने को तैयार थे!
मेहताब सिंह कहते हैं, "वो गांव का था, उसकी मौत हो गई थी, मंगणयारों का सबकुछ जजमान ही करते हैं, तो गांववाले उसकी मदद करना चाहते थे."
खेत सिंह भाटी के मुताबिक़ चूंकि मंगणयार 21 लाख रुपये की मांग कर रहे थे जिसे दे पाना गांववालों के बस में नहीं था.
लेकिन अगर मामला सिर्फ़ मदद का था तो मंगणयार मांग कैसे कर सकते थे क्योंकि ये तो मदद थी?

गांव का ताना बाना बिखेर दिया
भाटी कहते हैं, "लेकिन उन्होंने हमारी बात नहीं मानी और उनके समाज के कुछ बाहरवालों ने उनको बहकाया और पुलिस केस कर दिया तो हमने कहा कि ठीक है तुम जानो अब."
मांगणयारों से जब मैंने जैसलमेर में बात की थी- जहां वो आजकल गांव से भागकर वक़्त काट रहे हैं तो उनकी शिकायत थी कि पुलिस के पास जाने के बाद 'गांव में बात चलने लगी थी कि कोई हमारे हाथ का पानी भी नहीं पीएगा, तो ऐसे हालात में हम वहां कैसे रह सकते थे?"
भाटी से जब मैंने ये सवाल किया कि वहां क्यों नहीं गए तो उनका जवाब था कि अधिकारियों ने किसी को भी वहां जाने से मना कर रखा था, साथ ही वो ये भी कहते रहे कि वो मांगणयारों के ऐसे कामों में नहीं जाते.

इमेज स्रोत, Narayan Bareth
राजपूत योगी दास का बसाया गांव
लेकिन गांववाले मांगणयारों के पुलिस के पास जाने से नाराज़ हों ये भी उनकी बात के ही उलट लगता है. क्योंकि ग्रामीण ही दावा कर रहे हैं कि उन्होंने आमद ख़ान के परिवार से कहा था कि 'अगर कोई शक है तो पोस्टमॉर्टम करवा लो.'
तो सवाल है कि पोस्टमॉर्टम पुलिस के पास जाए बिना कैसे हो सकता है.
कुछ सालों पहले रेत की एक तेज़ आंधी ने देवीस्थान के पास की हर चीज़ को ख़ुद में छुपा लिया था. मांगणयारों को भी वहां से थोड़ी दूर खिसकना पड़ा.
इस बार भी बात-बेबात की ढेर सारी रेत दांतल में बह रही है जिसने 500 साल पुराने राजपूत योगी दास के बसाये गांव का ताना बाना बिखेर दिया है शायद!
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