ग्राउंड रिपोर्टः राजस्थान के मांगणयारों ने कहा, सड़कों पर सोना पड़े तो भी गांव नहीं जाएंगे

मांगणयार
    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जैसलमेर से

उनका दावा है कि 'संगीत उनकी रगों में दौड़ता है', लेकिन वही संगीत अमद ख़ान की 'हत्या' की वजह बना; और जब मांगणयारों ने जजमानों की नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो उनका हुक़्क़ा-पानी बंद हो गया, और तबसे वो भाग रहे हैं...

पहले पास के गांव बलाड़ रिश्तेदारों के घर, और, अब जैसलमेर- जहां के एक रैन बसेरे ने उन्हें चंद दिनों का आसरा दिया है.

"हमसे पंचायत ने कहा कि लाश दफ़न कर दो, हम उसके लिए भी तैयार हो गए, लेकिन वो इंसाफ़ करने को तैयार नहीं थे तो फिर हम पुलिस के पास चले गए," चेहरे पर कई दिनों की बढ़ी दाढ़ी लिए." कमीज़-पायजामा पहने ज़क्के ख़ान कहते हैं.

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'रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की जा रही है'

मांगणयार पंचों से मांग कर रहे थे अपने भाई के कथित क़ातिलों, तंत्र-पूजा करने वाले भोपा रमेश सुथार और उसके साथियों को सज़ा दिए जाने की. पर गांववालों की बातों से उन्हें लगा कि मामले को महज़ रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की जा रही है.

अमद ख़ान के चचेरे भाई बरियाम ख़ान ने कहा कि हमारे प्रशासन के पास जाने से गांववाले इस क़दर नाराज़ हो गए कि ये बात होने लगी कि कोई हमारे हाथ का पानी तक न पिये.

"हमारे पास क्या रास्ता था, हमारे पास तो अपना कुछ भी नहीं है, हम तो जजमानों के आसरे हैं, उनकी ज़मीन पर रहते हैं, उन्हीं का दिया खाते हैं, अगर गांववाले हमारा हुक़्का-पानी बंद कर देंगें तो वहां जी कैसे पाएंगे?" अधेड़ उम्र के हाकिम ख़ान सवाल करते हैं.

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गुस्से से ज़्यादा डर है

जजमानों पर पूरी तरह आश्रित, उनके उत्सवों और ग़मी में गा-बजाकर, उनके ज़रिये दिए गए इनाम के सहारे ज़िंदगी काटनेवाले मांगणयारों में ख़ुद से इंसाफ़ न होने के ग़ुस्से से ज़्यादा गांववालों की नाराज़गी का डर गहरा बैठा है.

मुस्लिम मज़हब से तालुक्क़ रखनेवाले मांगणयार अपने हिंदू जजमानों के यहां गाते-बजाते हैं और ये संबंध पीढ़ियों से जारी है.

रैन बसेरे के मैदान में बिछी दरी पर बैठे, हमसे बातें करते-करते वो बार-बार मुझसे गुहार करते हैं, "हमारे बारे में गांववालों को न बताएं", "पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट का ज़िक्र न करें."

क्योंकि ये पहली बार तो है नहीं कि दांतल गांव में किसी मांगणयार का क़त्ल हुआ हो!

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अहमद ख़ान के एक भाई को कोई शख़्स अपने साथ काम के लिए ले गया था और बाद में उसकी लाश मिली थी. लेकिन तब भी गांववालों ने मामले में सुलह-सफ़ाई करवा दी थी और मांगणयार मान भी गए थे.

लेकिन इस बार पहले तो "समुदाय के कुछ युवकों ने मामले को इंटरनेट के ज़रिये सोशल मीडिया पर डाल दिया और फिर पुलिस में शिकायत हो गई", ज़क्के ख़ान दावा करते हैं.

क्या है पूरा मामला?

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कहा गया है कि अमद ख़ान की मौत सर में चोट लगने से हुई.

परिवार ने हमें उनकी मौत के बाद की जो तस्वीरें दिखाईं उसमें जिस्म पर नीले रंग की चोट के गहरे निशान साफ़ दिखते हैं.

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पुलिस के मुताबिक़, 27 सितंबर को हुई नवरात्रि जागरण के एक कार्यक्रम में भोपे रमेश ने अमद ख़ान से एक ख़ास राग की फरमाइश की ताकि देवी आकर उसमें समाये. लेकिन अमद ख़ान के सुर से वो ख़ुश नहीं हुआ.

इसके बाद कथित तौर पर अमद ख़ान की इतनी पिटाई की गई कि उसकी मौत हो गई.

घटना से डरे हुए मांगणयार ऐसी जल्दी में गांव से भागे हैं कि 'अपने जानवरों - घोड़ों और बकरियों तक को भगवान के सहारे छोड़ आए हैं.'

प्रशासन और पुलिस के लाख समझाने पर कह रहे हैं कि वो 'वापस नहीं जाएंगे चाहे सड़कों पर सोना और मजूरी करनी पड़े.'

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