नज़रिया: 'हिंदुत्व का इस्तेमाल अब दो हज़ार के नोट की तरह करेंगे मोदी?'

- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
राजनीतिक नारे नोट की तरह होते हैं, वे तभी चलते हैं जब जनता उन पर यक़ीन करती है. यही वजह है कि किसी नारे का अंत प्रश्नवाचक चिन्ह से नहीं होता.
'अबकी बार... सिरीज़', 'हर हर मोदी' और 'सबका साथ सबका विकास' जैसे नारे तीन साल तक असरदार रहे क्योंकि नोटबंदी के तकलीफ़देह अनुभव के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों का विश्वास कायम रहा.
इन नारों की खिल्ली उड़ाने वाली पैरोडियाँ पहले तीन साल नज़र नहीं आईं, मगर आज सोशल मीडिया पर उनकी भरमार यूँ ही नहीं है.
किसी लोकप्रिय नारे का मज़ाक उड़ाना आसान नहीं होता. जब तक जनता की ताक़त नारे के साथ होती है ऐसी हर कोशिश पिट जाती है बल्कि लोग ऐसी गुस्ताख़ी करते ही नहीं. इन दिनों फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर वायरल हो रही फ़ब्तियाँ इस ओर इशारा कर रही हैं कि पब्लिक का मूड बदल रहा है.

ट्रोल और आइटी सेल के कारीगर चाहे भाजपाई हों या कांग्रेसी, वे लाख कोशिश कर लें, बात वही आगे चलती है जिसे पब्लिक आगे बढ़ाती है. अगर कुछ समय पहले तक मोदी को देश का सबसे बेहतरीन पीएम मानने वालों की भारी भीड़ सोशल मीडिया पर दिख रही थी तो ये बेशक उनकी लोकप्रियता का संकेत था.
सरकार के 40वाँ महीना पार करते ही, अब ज़्यादातर नारों में प्रश्नवाचक चिह्न आ गया है. अगर बहुत सारे लोग पूछने लगे हैं 'किसका साथ, किसका विकास?' तो ये भी लोगों के मन में उपजी शंका का उतना ही सटीक संकेत है.
अच्छे दिनों का लंबा इंतज़ार
'अच्छे दिनों' का वादा सबसे पहले छींटाकशी का शिकार हुआ, जब अगस्त 2015 में पॉर्न साइटों को बंद करने की चर्चा शुरू हुई तब मज़ाक चल पड़ा कि 'अच्छे दिन तो आए नहीं, अच्छी रातें भी गईं.'
लेकिन नारों की असली छीछालेदार इस साल सितंबर महीने में शुरू हुई जब हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे विकास बराला पर एक आइएएस अधिकारी की बेटी का पीछा करने और अपहरण करने की कोशिश का आरोप लगा. यहीं से 'विकास' के वादे और 'बेटी बचाओ' के नारों पर तंज़ कसे जाने की ठोस शुरुआत हुई.

मोदी और अमित शाह के गृह राज्य गुजरात में 'विकास गांडो थयो छे' (विकास पागल हो गया है) इस क़दर ट्रेंड करने लगा कि मुख्यमंत्री विजय रुपाणी भी उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सके, विकास के पगलाने के नए-नए लतीफ़े आज भी लगातार चल रहे हैं, ये देश के सबसे बड़े और सबसे लंबे समय तक चलने वाले सोशल ट्रेंड्स में से एक है.
'सबका साथ, सबका विकास' ऐसा नारा था जिसे सरकार ने ही बीच रास्ते अचानक बदल दिया. नया नारा आया--'साथ है, विश्वास है, हो रहा विकास है', सरकार लोगों को आश्वस्त करने का प्रयास करती दिखने लगी कि चिंता मत करें, विकास हो रहा है, इसकी ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि लोग पूछने लगे थे--'कहाँ है विकास?'
'काला धन' लाने और लोगों के खातों में 15 लाख रुपया पहुँचाने के चुनावी वादे को अमित शाह ने फ़रवरी 2015 में बिहार चुनाव प्रचार के दौरान जुमला बताया था, तब से आज तक सरकार के कई नारे-वादे जुमला होने के शक में घिर गए हैं.
सरकार के मंत्री 'स्मार्ट सिटी', 'मेक इन इंडिया', डिजिटल इंडिया, 'स्किल इंडिया' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं की बातें करना छोड़ चुके हैं. इस साल अगस्त महीने से 'संकल्प से सिद्धि' का नया नारा चलाया जा रहा है. कहा गया है कि 2022 तक 'न्यू इंडिया' बन जाएगा जबकि सरकार का कार्यकाल 2019 तक ही है.
अब ये सरकार का 2019 में जीत का अति-आत्मविश्वास है या इस बात की स्वीकारोक्ति कि 2022 से पहले ज़्यादा की उम्मीद न रखें?

सब चकाचक है वाला नैरेटिव
सितंबर का पूरा महीना मोदी सरकार के लिए लगातार मुसीबतें लेकर आया, जो अक्तूबर में भी जारी है. इससे पहले तक आलोचना को रद्द करने और देश में 'सब कुछ अच्छा अच्छा हो रहा है' की कहानी को आगे बढ़ाने में सरकार ने भरपूर कामयाबी हासिल की.
इससे पहले के तीन साल नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, लव जिहाद, एंटी-रोमियो स्क्वॉड, गोहत्या, देशभक्ति, वंदे मातरम, 'कश्मीर में देश विरोधी गतिविधियों को करारा जवाब' और प्रधानमंत्री की 'अति सफल' विदेश यात्राओं में निकल गए. इन सभी मामलों में कहानी कैसे आगे बढ़ेगी इस पर सरकार का पूरा नियंत्रण था. मगर सितंबर के बाद लगातार ऐसी चीज़ें सामने आईं जिनके लिए सरकार तैयार नहीं थी.
गोरखपुर में बच्चों की मौत, राम-रहीम की गिरफ़्तारी के समय प्रशासनिक विफलता, बेरोज़गारी की भयावह तस्वीर, नोटबंदी की नाकामी का रिज़र्व बैंक का ऐलान, जीडीपी में गिरावट के अकाट्य आँकड़े और तेल की ऊँची क़ीमत का विरोध, कई रेल हादसे, जीएसटी को लेकर ग़ुस्सा...कुछ ऐसी बड़ी घटनाएँ हैं जिन पर सरकार रंग-रोगन नहीं कर सकी, शायद इसलिए भी कि ये सब बहुत तेज़ी से कुछ ही दिनों के भीतर हुआ.

विपक्ष की लुंजपुंज हालत से पैदा हुए ख़ालीपन को पार्टी के भीतर मौजूद यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, कीर्ति आज़ाद और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोगों ने सरकार की खुली आलोचना करके पूरा कर दिया.
इन सबके बावजूद कोई इस्तीफ़ा तो दूर, सरकार संवेदना और सहानुभूति तक प्रकट करने के लिए तैयार नहीं थी क्योंकि उनकी नज़र में इसे कमज़ोरी का संकेत माना जाता. यहाँ तक कि लड़कियों पर लाठी-चार्ज के बावजूद बनारस हिंदू यूनिर्वसिटी के कुलपति जैसे प्यादे को भी सार्वजनिक तौर पर पद से नहीं हटाया गया.

उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह का बयान कि "सितंबर में तो बच्चे हर साल मरते हैं" या केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का बेरोज़गारी पर चल रही बहस में कहना--"ये तो अच्छा संकेत है", यही दिखाते हैं कि सब चकाचक है वाले नैरेटिव को सरकार पूरी ताक़त से आगे बढ़ाने में जुटी रही है.
चाहे गोरखपुर में बच्चों के मरने पर संवेदना व्यक्त करने, अख़लाक की हत्या की निंदा करने या फिर गौरी लंकेश की हत्या के बाद उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने वालों को अनफॉलो करने या खट्टर, योगी और प्रभु के इस्तीफ़े की माँग हो, मोदी ने हर मौक़े पर दिखाया कि वे जो करेंगे अपनी मर्ज़ी से करेंगे, किसी की माँग पर नहीं. उनकी नज़र में ये सरकार की मज़बूती का संकेत है.
बदलाव की झलक

यह समझना ग़लत होगा कि सरकार बदली बयार से वाक़िफ़ नहीं है. पिछले दिनों जीएसटी में कुछ बदलाव और तेल पर लगने वाले केंद्रीय उत्पाद शुल्क में दो रुपए प्रति लीटर की कटौती वो दो पहले क़दम हैं जो इस सरकार ने जन-दबाव में उठाए हैं.
माना जा रहा है कि जीएसटी में ढील गुजरात के व्यापारियों की नाराज़गी को देखते हुए दी गई है क्योंकि सूरत और राजकोट जैसे शहरों में कारोबारियों ने विशाल विरोध प्रदर्शन किए हैं.
गुजरात में चुनाव नज़दीक है जहाँ पार्टी लंबे समय से सत्ता पर काबिज़ है और विपक्ष काफ़ी कमज़ोर है. हालाँकि राहुल गांधी ने वहाँ कई रैलियाँ की हैं, दबंग पटेल सरकार से नाराज़ हैं और दलितों के पास भी बीजेपी का साथ देने की कोई वजह नहीं दिखती.
इन सबके बावजूद यही माना जा रहा है कि बीजेपी गुजरात में काफ़ी मज़बूत है और उसके हारने की भविष्यवाणी कोई नहीं कर रहा है, मगर इतना तय है कि दो सबसे शक्तिशाली नेताओं के गृह राज्य के नतीजे आगे की बिसात तय करेंगे.
अमित शाह के बेटे के कारोबार से जुड़े विवाद का राजनीति पर कितना असर होगा ये कहना मुश्किल है लेकिन वंशवाद और भ्रष्टाचार से ऊपर रहने के दावे का नैतिक बल शायद पहले जैसा नहीं रह पाएगा.

गुजरात का चुनाव जीतने के लिए बीजेपी ये साबित करने की कोशिश करेगी कि 'विकास' पागल नहीं हुआ है लेकिन इतना तय है कि 'संकल्प से सिद्धि' के नए नारे में लोगों का विश्वास जगाने के लिए उसे पहले के मुक़ाबले अधिक मेहनत करनी होगी.
मोदी के पुराने नारे अभी 500 और 1000 रुपए के नोट तो नहीं हुए हैं लेकिन उन्हें हाथों-हाथ लेने वाले लोगों की तादाद कम होती दिख रही है.
विकास और हिंदुत्व के बेमिसाल कॉम्बिनेशन की वजह से 2014 में सत्ता में आए मोदी विकास के मोर्चे पर उज्जवला स्कीम और जनधन खातों के खुलने के अलावा शायद ऐसा कोई दावा नहीं कर सकते जो चुनौतियों से परे हो.
अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत में 2019 से पहले विकास के मैदान में कोई बड़ा काम करना या करोड़ों रोज़गार पैदा करने का वादा पूरा करना तक़रीबन असंभव है, ऐसे में मोदी हिंदुत्व को दो हज़ार के नोट की तरह सामने लाएँगे या नहीं, यही सबसे बड़ा सवाल है.
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