अब हम वाजपेयी के भारत में नहीं रहते: रामचंद्र गुहा

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- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या में कथित तौर पर संघ परिवार की मिलीभगत होने की आशंका जताने पर इतिहासकार और कमेंटेटर रामचंद्र गुहा के ख़िलाफ़ क़ानूनी नोटिस जारी किया गया है. इसमें उनसे तीन दिन के भीतर बिना शर्त माफ़ी मांगने को कहा गया है.
यह नोटिस कर्नाटक बीजेपी युवा मोर्चा के सचिव करुणाकर खसाले की ओर से भेजा गया है. नोटिस में कहा गया है कि आधारहीन, झूठे और छवि खराब करने वाले आरोप लगाने पर गुहा के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज कराया जाएगा.
खसाले की मुख्य दलील ये है कि दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या के मामले में अभी न्यायिक जांच जारी है. इसके जवाब में गुहा ने ट्वीट करके तंज कसा है.
गुहा ने सोमवार को एक ट्वीट किया, ''अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि किसी किताब या लेख का जवाब दूसरी किताब या लेख हो सकता है. लेकिन अब हम वाजपेयी के भारत में नहीं रहते.''
उन्होंने एक अन्य ट्वीट में लिखा, ''आज भारत में स्वतंत्र लेखकों और पत्रकारों को प्रताड़ित किया जा रहा है, सताया जा रहा है, यहां तक कि हत्या कर दी जा रही है. लेकिन हम चुप नहीं होंगे.''
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बीजेपी की तरफ़ से गुहा को भेजे नोटिस में कहा गया है, ''किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ न तो किसी तरह का मुक़दमा चला है और न ही किसी को दोषी ठहराया गया है. ऐसी स्थिति में बिना किसी सबूत के आप ग़लत और भ्रामक बयान देकर सीधे तौर पर संगठन और इसके सदस्यों की छवि ख़राब कर रहे हैं.''
क़ानूनी नोटिस में कहा गया है गुहा ने एक न्यूज़ वेबसाइट को दिए गए इंटरव्यू में कहा, ''ऐसा बिल्कुल हो सकता है कि गौरी लंकेश के हत्यारे भी उसी संघ परिवार से हों जहां से दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी के हत्यारे आए थे.''

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आरोप
नोटिस में यह भी कहा गया है कि 'गुहा ने पहले एक अख़बार को भी ऐसा बयान दिया है. सिर्फ़ एक बयान ही नहीं, गुहा पूरे इंटरव्यू में संगठन और इसके सदस्यों की छवि पर दाग लगा रहे हैं.'
गुहा ने पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के ठीक बाद ये इंटरव्यू दिया था. गौरी लंकेश की हत्या 5 सितंबर को तब हुई थी जब वह दफ़्तर से घर लौटी थीं.
खसाले ने कहा कि उनका संगठन बेहद सम्मानित है और दुनियाभर के राष्ट्रवादी लोग इसके सदस्य हैं और यह देश के संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करता है.
नोटिस में कहा गया कि 'जानबूझकर बीजेपी के ख़िलाफ़ झूठा बयान देकर गुहा ने संगठन के हज़ारों सदस्यों और उसके समर्थकों को दुख पहुंचाया है.'
क़ानूनी नोटिस में एक उद्योगपति, एक इंटरप्रेन्योर, बिज़नेसमैन और एक प्रोफ़ेसर का भी नाम है जिन्होंने खसाले से गुहा के आरोपों को लेकर निजी तौर पर उनसे जानकारी ली थी.
खसाले ने क़ानूनी नोटिस में कहा कि आधारहीन आरोप लगाकर चारों मामलों की जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई है. उन्होंने कहा ''न्याय प्रक्रिया में गैरक़ानूनी दखल दिया जा रहा है और यह ग़लत है.''

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विरोध और राजनीति
गौरी लंकेश की हत्या के बाद से ही यह तुलना लगातार की जा रही है कि ठीक इसी तरह दो साल पहले डॉ. एमएम कलबुर्गी की हत्या की गई थी.
कलबुर्गी की तरह गौरी लंकेश भी हिंदूवादी ताकतों के ख़िलाफ़ बोलती और लिखती थीं. गौरी ने अपने अख़बार 'लंकेश पत्रिका' में भी दक्षिणपंथी विचारधारा के ख़िलाफ़ खूब लिखा था.
उन्होंने आंदोलन की शुरुआत नक्सल प्रभावित इलाकों से की और कुछ नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने में कामयाब भी रहीं. लेकिन जब उनकी हत्या हुई तो कुछ बीजेपी समर्थकों और सदस्यों ने उन्हें नक्सल समर्थक बताया.
इस वजह से गौरी लंकेश की हत्या का राजनीतिकरण शुरू हो गया. कुछ लोगों ने गौरी पर नक्सल समर्थक होने का आरोप लगाया तो कुछ ने हत्या का आरोप बीजेपी और आरएसएस पर मढ़ा.
फ़िलहाल मामले की जांच जारी है. कर्नाटक सरकार गौरी के हत्यारों को पकड़ने के लिए एसआईटी का गठन किया था जिसमें अब कुछ और सदस्य बढ़ा दिए गए हैं.
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