जस्टिस करनन हुए रिटायर, उनसे जुड़े 6 अहम सवाल

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- Author, जे वेंकटेसन
- पदनाम, क़ानूनी मामलों के जानकार, बीबीसी तमिल के लिए
कलकत्ता हाई कोर्ट के जज के रूप में 12 जून जस्टिस करनन के कार्यकाल का अंतिम दिन था. अब वह रिटायर हो गए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना के मामले में उन्हें छह महीनों की जेल की सज़ा सुनाई है लेकिन वह पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. जस्टिस करनन के मामले के कारण न्यायपालिका और उसके आदेशों से जुड़ी कई तरह की चिंताएं उठ रही हैं.
उनसे जुड़े इन 6 सवालों के जवाब मिलने अब भी बाकी हैं-
1. सुप्रीम कोर्ट से अवमानना में दोषी क़रार दिए जाने का क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट का आदेश तब तक प्रभावी रहेगा जब तक पुलिस उसे लागू न कर दे या स्वयं सुप्रीम कोर्ट उसे बदल न दे. इस बीच जस्टिस करनन ने भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के समक्ष दया याचिका पेश कर दी है.
इसे राष्ट्रपति कार्यालय ने सरकार की टिप्पणी के लिए क़ानून मंत्रालय को भेज दिया है. राष्ट्रपति का फ़ैसला आमतौर पर कैबिनेट मंत्रियों की सलाह पर ही आधारित होता है.
सरकार को अभी इस दया याचिका पर फ़ैसला लेना बाक़ी है. इसलिए अभी तक जस्टिस करनन को कोई राहत नहीं मिली है.
2. क्या उनके पास सज़ा से बचने या फ़ैसले को पलट देने के कोई क़ानूनी विकल्प हैं?
नौ मई को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अवमानना मामले में दोषी क़रार दिया था. सात सदस्यीय बेंच ने अपने आदेश में कहा था कि जस्टिस करनन को क्यों दोषी ठहराया जा रहा है, इस पर वह विस्तृत फ़ैसला सुनाया जाएगा.
अभी अदालत ने ये विस्तृत आदेश नहीं सुनाया है. बेंच में शामिल जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष 27 मई को रिटायर हो गए हैं. अब विस्तृत फ़ैसला सुनाने के लिए बेंच को फिर से बनाना होगा और मामले की सुनवाई फिर से करनी होगी.

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अंतिम फ़ैसला आने तक जस्टिस करनन ने सज़ा को निलंबित करने के लिए रिट याचिका दायर की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने इसे यह कहते हुए पंजीकृत नहीं किया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती है.
ऐसे में जस्टिस करनन को सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिल रही है. अब सिर्फ़ राष्ट्रपति ही संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत हस्तक्षेप कर सकते हैं.
अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को किसी भी न्यायिक आदेश को रद्द करने या किसी भी सज़ा को माफ़ करने का अधिकार देता है. लेकिन सवाल ये है कि क्या कोई दोषी या अभियुक्त सज़ा के किसी भी हिस्से को पूरा किए बिना ये राहत पा सकता है?
अगर ऐसा होता है तो इसका मतलब ये होगा कि राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ही रद्द कर दिया है जिसकी परिभाषा इस अनुच्छेद में नहीं है.
मार्च 2010 में हरियाणा प्रांत और अन्य बनाम जगदीश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति के अधिकारों की व्याख्या की थी. उसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति के क्षमा देने के अधिकार पर कोई अंकुश नहीं है और राष्ट्रपति इसे किसी अभियुक्त के सज़ा पूरी करने से पहले भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि अभियुक्त के अधिकार सिर्फ़ नियमों के तहत सुनवाई किए जाने तक ही सीमित हैं. वो समय से पहले रिहाई का दावा अधिकार की तरह नहीं कर सकता है. इसका मतलब ये है कि अभियुक्त को सज़ा का कुछ हिस्सा काटना ही होगा.

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3. क्या करननन पेंशन और अन्य भत्तों की सुविधा के साथ रिटायर होंगे?
भले ही जस्टिस करनन फरार हैं और गिरफ़्तारी से बच रहे हैं लेकिन वो 12 जून को रिटायर हो गए हैं. ग्रेच्युटी क़ानून के तहत रिटायर हो रहे सरकारी कर्मचारी को उसके रिटायरमेंट के दिन ही ग्रैच्युटी की राशि दी जानी चाहिए.
यदि उसके ख़िलाफ़ कोई आपराधिक जांच चल रही है तो फिर सक्षम प्राधिकरण को पेंशन और अन्य भत्ते रोकने के लिए अलग से आदेश पारित करना होगा (इस मामले में राष्ट्रपति को) .
ऐसे किसी आदेश के अभाव में करनन अपनी पेंशन और भत्ते पाने के अधिकारी हैं. लेकिन अभी ये स्पष्ट नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपना विस्तृत फ़ैसला अभी नहीं सुनाया है.
4. सुप्रीम कोर्ट के जजों के ख़िलाफ़ दिए गए उनके अपने आदेशों का क्या होगा?
कोलकाता में अपने आवास से समय-समय पर जारी किए गए ये आदेश प्रभावहीन हैं. एक मई को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश पारित किया था जिसके तहत 8 फ़रवरी के बाद से दिए गए जस्टिस करनन के सभी आदेशों पर रोक लगा दी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 8 फरवरी को ही अवमानना का नोटिस जारी किया था. सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित प्राधिकरणों को जस्टिस करनन के आदेशों पर अमल न करने का आदेश दिया था. जस्टिस करनन ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया को आठ जजों को भारत न छोड़ने देने का आदेश भी दिया था और उस पर भी रोक लगा दी गई थी.

5. क्या हाई कोर्ट के किसी जज की शक्तियों को कार्यकाल के दौरान समाप्त करना संभव है?
हाई कोर्ट के जज को न्याययिक और प्रशासनिक कार्यों को करने से सुप्रीम कोर्ट के जज के आदेश पर रोका जा सकता है या नहीं, इस बात को लेकर स्पष्टता नहीं है. जज इनक्वॉयरी एक्ट 1968 तीन जजों की समिति को जज के ख़िलाफ़ जांच करने, आरोप लगाने और सुनवाई करने की शक्ति देता है.
यदि उसे दोषी पाया जाता है तो रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाती है जो उसे राष्ट्रपति को भेजता है. इसके बाद जज को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है.
जस्टिस करनन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जजेज़ इनक्वायरी एक्ट के प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं किया है. अदालत ने अपने सम्मान और महिमा की रक्षा के लिए अनुच्छेद 129 के तहत मिले अपने अवमानना के अधिकार का इस्तेमाल किया है.
6. जस्टिस करनन के पास अपने कृत्यों के लिए क्या बचाव है?
जस्टिस करनन की शिकायत ये है कि 8 फ़रवरी को उनके ख़िलाफ़ अवमानना का नोटिस जारी करते हुए और उनकी न्यायिक शक्तियां छीनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्पष्टीकरण देने का मौका नहीं दिया.
अदालत की अवमानना क़ानून के तहत यदि कोई न्यायिक प्रक्रिया शुरू की जाती है तो अभियुक्त पर आरोप तय किए जाते हैं जिसे आरोपों पर स्पष्टीकरण देने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता है.
इस मामले में कोई आरोप तय नहीं किया गया है. कोई जांच भी नहीं हुई है और जस्टिस करनन को अदालत की अवमानना का दोषी क़रार दे दिया गया है.
जस्टिस करनन ये जानना चाहते हैं कि उन्हें किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई जवाब नहीं दिया है.
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