'भगत सिंह फांसी के 86 साल बाद भी आज़ाद नहीं'

- Author, इशलीन कौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता लंदन
'इंकलाब ज़िंदाबाद', 'क्रांति ज़िंदाबाद', 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद'… ये कुछ ऐसे नारे हैं जिनकी गूंज उन भारतीयों की यादों में बाक़ी है जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को ख़ुद देखा है, या फिर जिन्हें स्वतंत्रता के संघर्ष की कहानियां जानने की उत्सुकता रही है.
मेरे जन्म के समय भगत सिंह को फांसी दी जा चुकी थी. लेकिन भारत में सिर्फ़ मेरी ही उम्र के नहीं बल्कि भगत सिंह से पहले और बाद की पीढ़ियों के लोग भी उनकी क्रांतिकारी कहानियों से प्रभावित होते रहे हैं.
वो तमाम पत्र जो भगत सिंह ने लिखे थे और उनकी वो डायरी जो जेल में उनके साथ थी, कई मुद्दों पर उनकी मज़बूत सोच की गवाही देते हैं. अपने एक ख़त में उन्होंने ख़ुद के नास्तिक होने का एलान किया है.
उन्होंने लिखा कि उनके कई दोस्त अक्सर उन्हें तानाशाह और कई बार तो दिखावा करने वाला भी बुलाते थे.

सिख परिवार में पैदा हुए भगत सिंह ने दाढ़ी और बाल बढ़ाने के बारे में लिखा है, "ऐसा करने के बावजूद मैं ख़ुद को सिख धर्म या किसी और धर्म के प्रभाव के बारे में राज़ी नहीं कर पाया. लेकिन मेरा ईश्वर में एक अडिग और अटूट विश्वास है."
एक ख़ूबसूरत नौजवान होने के अलावा उनका लोगों को देखने का अंदाज़ और उनके लिखने की ताक़त लोगों के सामने रही. उनकी इन्हीं बातों ने बड़ी संख्या में इतिहासकारों को भी आकर्षित किया.
एक भारतीय होने के अलावा सिख परिवार में जन्म लेने की वजह से मैं कुछ उन लोगों में शामिल हूं जिन्होंने भगत सिंह की कहानियों के साथ ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानियों को भी क़रीब से जाना है.
मेरी किस्मत देखिए कि लंदन में रहते हुए मैं भगत सिंह की पुण्यतिथि के करीब उनके बारे में ब्रिटिश लाइब्रेरी में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में रिसर्च कर रही हूं.
मैं हैरान हूं कि बचपन में सुनी कहानियों में इतिहास के बिखरे हुए पन्नों के टुकड़े किस तरह एक साथ जुड़ते नज़र आ रहे हैं.

ब्रिटिश लाइब्रेरी में शुरू हुआ ख़्वाबों सा लगने वाला ये सिलसिला यहीं नहीं थमता है. लाइब्रेरी में मुझे उन तमाम चीज़ों का एक कैटालॉग मिला जिनके छपने पर रोक थी.
पैम्फ़लेट, पोस्टर, लीफ़लेट, पेंटिंग और हैंड बिल के नमूने जिन पर आज़ादी से पहले चार दशक तक ब्रितानी साम्राज्य की तरफ़ से रोक लगी थी.
ज़ाहिर है मेरी दिलचस्पी उन पोस्टरों में हुई जिन पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की तस्वीरें थीं. दुख की बात ये है कि भगत सिंह आज भी आज़ाद नहीं हैं. फांसी के 86 साल बाद भी नहीं.
भगत सिंह को अक्सर 'असली शहीद' भी कहा जाता है. वो बातचीत में माहिर थे. उन्हें लिखे और बोले गए शब्दों की ताकत का अंदाज़ा था. आज़ादी के लिए लड़ने वाले उस नौजवान के वो पोस्टर आज तक आज़ाद नहीं हो पाए हैं.
मुझे ब्रिटिश लाइब्रेरी ने बताया कि उन पोस्टरों को दोबारा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि उन्हें लेकर कॉपीराइट का मसला है.

ब्रिटेन का कॉपीराइट कानून इन पोस्टरों को प्रकाशित करने की इजाज़त नहीं देता, जब तक इन पोस्टरों को बनाने वाला व्यक्ति हमें इसकी इजाज़त ना दे.
मेरे अंदर का पत्रकार और देशप्रेमी ख़ामोश नहीं रह सका. मैंने कानपुर के श्याम सुंदर लाल पिक्चर हाउस को ढूंढ निकाला. इनमें से एक पोस्टर उनके यहां छापा गया था. श्याम सुंदर लाल के पोते हरीश ने मेरा फ़ोन उठाया.
जब मैंने उनसे पोस्टर के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, "मैडम आप समझ क्यों नहीं रही हैं, हम उनके पोते हैं जिन्होंने ये बनाया था. हमें इस बारे में कुछ नहीं पता."
कुल मिलाकर दस मिनट में मेरे हाथ में इतना ही नतीजा था - पोस्टर, उन्हें बनाने वाले का नाम और पता और उनके पोते की तरफ़ से इस बात की इजाज़त कि मैं इनका जो चाहे करूं. लेकिन मैं फिर भी इन्हें इस्तेमाल नहीं कर सकती हूं.
इस पर और समय बिताने के बजाय मैंने अपने एक सहकर्मी की मदद से इन पोस्टरों के ऐसे स्केच बनवाए जो हमारे पाठकों को इन पोस्टर्स की झलक दे सकें.

पहली तस्वीर जिसने मेरा ध्यान अपनी तरफ़ खींचा, वो थी भगत सिंह की हैट पोट्रेट. इस तस्वीर को हमने अपने बचपन में ख़ूब देखा है और ये उनकी कुछ मशहूर तस्वीरों में से एक है.
ब्रिटिश लाइब्रेरी के पूर्व अधिकारी ग्राहम शॉ का इस कैटलॉग को बनाने में बड़ा योगदान है.
ग्राहम के मुताबिक एक पब्लिशिंग हाउस ने भगत सिंह की इस तस्वीर को एक राइटिंग पैड के कवर के तौर पर इस्तेमाल किया जिससे वो भारत के बच्चों के दिल में भगत सिंह के नाम का बीज बो सके और साथ ही उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित कर सकें.
ब्रिटिश लाइब्रेरी में मिली इस तस्वीर पर 'राइटिंग पैड' लिखा था और साथ ही लिखा है '100 पन्ने'.

उनकी इस तस्वरी की अक्सर अलबर्टो कोर्डा की खींची हुई चे गुएवारा की तस्वीर से भी तुलना की जाती है. दोनों ही अत्यंत फ़ोटोजेनिक होने के अलावा अपने सिद्धांतो के लिए याद किये जाते हैं.
दूसरी तस्वीर की हेडिंग अग्रेज़ी और हिन्दी दोनों भाषाओं में है. लिखा है 'भारत के तीन सिंह'. यही वो तस्वीर है जिसके कॉपीराइट धारक को मैं ढूंढ रही थी.
इस तस्वीर में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू जेल में देखे जा सकते हैं. वो क़ैद में ज़रूर दिखाई देते हैं लेकिन उनके चेहरे बेख़ौफ हैं. चेहरों पर डर या तनाव का कोई निशान नहीं.
तीसरे पोस्टर 'लाहौर षड्यंत्र मामले का फ़ैसला' में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु भारत माता को अपने सिर भेंट चढ़ा रहे हैं - उनकी फांसी के फ़ैसले और देशभक्ति की झलक.
चौथा और आख़री पोस्टर, जिसमें तीनों शहीदों को फ़रिश्ते फांसी के बाद स्वर्ग ले जा रहे हैं. इससे ज़ाहिर होता है कि उस दौर में लोगों के दिलों में इन तीनों के लिए कैसी श्रद्धा थी.
भारतीयों के लिए वे हीरो थे. पोस्टर में कई अन्य भारतीय भी पहले से स्वर्ग में उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई देते हैं.

भगत सिंह के छोटे भाई कुलबीर सिंह के बेटे अभय सिंह संधु ने बताया उनके परिवार ने भी ऐसे पोस्टर देखे हैं जिनमें नज़र आता है कि भगत सिंह उस ज़माने में लोगों के लिए कितने बड़े हीरो थे.
इन पोस्टरों में लोगों के मन में उनके ताया के लिए प्यार नज़र आता है. भगत सिंह के शहीद होने के 86 साल बाद भी लोग उनके जीवन के बारे में बहुत कुछ जानना चाहते हैं.
लोग भगत सिंह को एक अच्छे इंसान और सोने के दिल वाले के तौर पर याद करते हैं जो लोगों की सेवा करना चाहते थे. हम चाहते हैं कि ऐसा आगे भी बरकरार रहे.
लोगों के सामने भगत सिंह की जो तस्वीरें हैं वो उनके परिवार की दी हुई हैं. वो चाहते हैं ऐसी और तस्वीरें लोगों के सामने आएं. लेकिन उन्हें ये जान कर दुख हुआ कि ऐसे तमाम पोस्टर कॉपीराइट के झंझटों में उलझ कर रह गए हैं.
एक तरफ जहां अभय सिंह सिंधु को इस बात से निराशा महसूस हो रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्राहम शॉ मानते हैं कि ऐसे तमाम दस्तावेज़, जो किसी तरह से भारत की स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा हैं, उन्हें भारत की जनता के लिए उपलब्ध बनाना चाहिए ताकि उन्हें अपने समृद्ध इतिहास का एहसास हो.
लेकिन जैसे मार्क ट्वेन ने कहा, "भगवान के लिए केवल एक चीज असंभव है, धरती पर किसी भी कॉपीराइट कानून को समझाना."
(इस विषय पर भगत सिंह की भतीजी वीरेंद्र संधू और भतीजे अभय सिंह संधू ने अपनी प्रतिक्रिया दी है)













