ELECTION SPECIAL: 'चीनी के कटोरे' से ग़ायब होती गई मिठास?

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, गोरखपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
"मोदी जी जब आए थे पिछली बार यहां तो वादा करके गए थे कि पड़रौना चीनी मिल को चलवाएंगे, लेकिन भूल गए." गोरखपुर से कुशीनगर जाने वाले रास्ते में मिले एक बुज़ुर्ग किसान देवनारायण ने बेहद ग़ुस्से में ये बातें कहीं.
आगे फिर बोले, "रेलवे लाइन का भी वादा कर गए थे लेकिन वो भी नहीं पूरा किए. केवल लुभावना वादा जानते हैं वो, पूरा करना नहीं."
देवनारायण का ये ग़ुस्सा सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नहीं था बल्कि नरेंद्र मोदी सिर्फ़ राजनीतिक दलों के प्रतीक मात्र थे, उनका ग़ुस्सा सभी नेताओं और पार्टियों पर था. देवनारायण की तरह ये ग़ुस्सा वहां बैठे लगभग सभी लोगों में था.

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चीनी मिलें
चीनी का कटोरा कहे जाने वाले पूर्वांचल के इस इलाक़े में कभी गन्ने की फ़सलें खड़ी रहती थीं और गन्ने की खेती यहां के किसानों के लिए उनके सुखद जीवन-यापन का ज़रिया हुआ करती थीं. ऐसा इसलिए था क्योंकि यहां की ज़मीन गन्ने की खेती के लिए बेहद अनुकूल समझी जाती है और इसी वजह से यहां बड़ी संख्या में चीनी मिलें लगाई गई थीं.
ये चीनी मिलें किसानों का गन्ना लेती थीं, उन्हें समय पर पैसे देती थीं और किसान आगे की फ़सल की तैयारी करता था. यह क्रम क़रीब पचास दशक तक बना रहा. किसान गन्ना उगाते रहे, मिलें चीनी बनाती रहीं और इलाक़े में खुशहाली बनी रही.
लेकिन 1990 के बाद से मिलों और गन्ना किसानों के बीच बनी रिश्तों की मिठास कम होने लगी जिसका नतीजा हुआ कि मिलें बंद होने लगीं और किसान बर्बाद होने लगे. आज स्थिति ये है कि इस इलाक़े की ज़्यादातर चीनी मिलें या तो बंद पड़ी हैं या फिर वो घाटे में चल रही हैं.

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सरकारी नीतियां
अकेले देवरिया ज़िले में 14 चीनी मिलें थीं लेकिन उनमें से आज सिर्फ़ पांच में ही चीनी का उत्पादन हो रहा है, बाकी मिलें बंद हो गई हैं. कुशीनगर के हाटा चीनी मिल की ओर जाने वाले रास्ते पर गन्ना लादे ट्रैक्टरों की लंबी क़तार दिखी. कुछ किसानों से हमारी बात हुई तो उनका कहना था कि फ़िलहाल उन्हें समय पर पैसा मिल रहा है.
हालांकि कुछेक किसानों का ये भी कहना था कि दो-तीन साल पहले समय पर भुगतान की समस्या कुछ ज़्यादा थी. ग़ैर-सरकारी आँकड़ों के मुताबिक अकेले पूर्वांचल के गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर तीन सौ करोड़ रुपये से ज़्यादा का बक़ाया है. वहीं चीनी मिलों के संचालक इसके लिए सरकारी नीतियों को दोष देते हैं.
हाटा चीनी मिल के प्रबंधक सुधीर कुमार सिंह बताते हैं, "सरकारें गन्ने का रेट तो बढ़ा देती हैं लेकिन चीनी के दाम वही रहते हैं. ऐसी स्थिति में मिलों पर दबाव पड़ता है. यदि मिलें ये दबाव झेल ले जाती हैं तो ठीक है अन्यथा उन्हें बंद करने पर मजबूर होना पड़ता है."

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चीनी का उत्पादन
सुधीर कुमार सिंह कहते हैं कि अब ये स्थिति सुधर रही है. उन्हें यक़ीन है कि अगले दो-तीन साल में ये समस्या ख़त्म भी हो जाएगी क्योंकि सरकार भी इसकी गंभीरता को समझ रही है और चीनी मिलें भी पॉवर प्लांट इत्यादि मिलों में लगाकर अपने नुक़सान की भरपाई कर रहे हैं.
चीनी मिलों के बंद होने के सवाल पर सुधीर कुमार सिंह कहते हैं, "मिलें भले ही बंद हुई हैं लेकिन चीनी का उत्पादन कम नहीं हुआ है क्योंकि मिलों की क्षमता में बढ़ोत्तरी हुई है. इसलिए किसानों का नुक़सान नहीं होने पाया और उनका गन्ना मिलें ख़रीद रही हैं."
लेकिन किसान ऐसा नहीं मानते. कुशीनगर, देवरिया, आज़मगढ़ के कई किसान कहते हैं कि उन्हें गन्ने की मांग में कमी आने के चलते दूसरी फ़सलों की ओर रुख़ करना पड़ा. चीनी मिलों की ही तरह पूर्वांचल के दूसरे उद्योगों का भी हाल है.
मऊ ज़िले की कताई मिल और स्वदेशी कॉटन मिल, गोरखपुर का फर्टिलाइज़र कारखाना इसके उदाहरण हैं.

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बंद मिलें
ग़ाज़ीपुर के एक समाजसेवी उमेश श्रीवास्तव कहते हैं कि ये हाल तब है जब इस इलाक़े से न सिर्फ़ राज्य सरकार के कई मंत्री हैं बल्कि केंद्र सरकार में भी कई मंत्री ऊंची हैसियत में हैं.
1970 में स्थापित और अपने उर्वरको के लिए मशहूर गोरखपुर फर्टिलाइजर कारखाना बंद होने से जहाँ इस क्षेत्र के लाखों कामगार मजदूर हो गए और बाहर जाकर परिवार का पेट पालने को विवश हो गए वहीं कारखाने की वजह से स्थानीय लोगों को मिला रोज़गार भी ख़त्म हो गया.
मऊ ज़िले के पत्रकार वीरेंद्र चौहान कहते हैं कि पूर्वांचल में पिछले पचास साल से कोई नया कारखाना या फैक्ट्री नहीं लगी है बल्कि जो थीं, उनमें से ज़्यादातर बंद हो चुकी हैं. मऊ ज़िले की कताई मिल और स्वदेशी कॉटन मिल इसके उदाहरण हैं.

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बकाए की आस
राज्य सरकार की ओर से संचालित मऊ ज़िले की कताई मिल के बड़े से परिसर में अभी भी कई पूर्व कर्मचारी अपने बकाए की आस में वहीं रहने को मजबूर हैं.
एक कर्मचारी फूलचंद विश्वकर्मा बताते हैं, "यहां क़रीब 3000 कर्मचारी काम करते थे. मिल मुनाफ़े में थी लेकिन जानबूझकर कुछ लोगों ने यहां विवाद कराकर 2005 में तालाबंदी करा दी."
कर्मचारियों का आरोप है कि कुछ स्थानीय नेताओं और अधिकारियों की ये चाल थी कि मिल को बंद कराकर ज़मीन ख़रीद ली जाए लेकिन मामला कोर्ट में जाने के कारण उनकी ये कोशिश क़ामयाब नहीं हो सकी.
कुछ ऐसा ही हाल स्वदेशी कॉटन मिल का है जो कि केंद्र सरकार का उपक्रम था. सैकड़ों एकड़ में फैली ये फैक्ट्री अब वीरान पड़ी है.
कर्मचारियों को वीआरएस देकर उनके घरों को वापस कर दिया गया और मिलों पर ताला लग गया. वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि उद्योंगो के नष्ट होने के पीछे सबसे बड़ी वजह तो सरकारी अनदेखी ही रही लेकिन राजनीति भी इसके लिए बराबर ज़िम्मेदार है.

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इलाके से पलायन
वो कहते हैं, "क़रीब तीन दशक से उद्योगों का ये बुरा हाल लगातार हो रहा है लेकिन न तो किसी भी राजनीतिक दल ने इसे मुद्दा बनाया और न ही इसके लिए स्थानीय स्तर पर कोई आवाज़ उठी."
पत्रकार वीरेंद्र चौहान कहते हैं, "मिलों के बंद होने से सबसे ज़्यादा नुक़सान स्थानीय लोगों को हुआ क्योंकि इनके चलते हज़ारों लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोज़गार मिला हुआ था. मिलों के बंद होने की वजह से ही इस इलाक़े से पलायन भी बड़ी संख्या में बढ़ा है."












