ELECTION SPECIAL: वॉर रूमों से वोटरों पर 'बमबारी'

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दोपहर के तीन बजे हैं. लखनऊ विधानसभा के सामने भारतीय जनता पार्टी कार्यालय में ज़्यादा हलचल ग्राउंड नहीं बल्कि इमारत के फर्स्ट फ्लोर पर है.
राजनाथ सिंह कुछ देर पहले ग्राउंड फ़्लोर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे लेकिन अब कर्मचारी खाली गिलास और बचे हुए स्नैक्स हटा रहे हैं.
ऊपर बड़े-बड़े हॉलों में दर्जनों लोग कंप्यूटर स्क्रीन, मोबाइल और टीवी मॉनिटर पर नज़र गड़ाए, कुर्सियों से चिपके बैठे हैं.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए बनाया गया ये भाजपा का वॉर रूम है जहाँ 200 लोग रोज़ काम करते हैं. इसके अलावा 115 लोग शहर के अलग हिस्से में थोड़ा 'गुप्त' रखे गए एक दूसरे 'ऑफ़िस' से काम करते हैं.
होड़ इस बात की है कि सोशल मीडिया प्रचार में कोई भी कमी न रह जाए, किसी तरह की कोताही न दिखे.
वॉर रूम में युद्धस्तर पर काम हो रहा है
प्रदेश भाजपा के आईटी सेल प्रमुख संजय राय इतने व्यस्त थे कि भोजन छूट गया तो शाम को मुझे भी लाई-चना का स्नैक्स ही ऑफ़र कर सके.
उन्होंने बताया, "हम कोई स्पोंसर्ड कैम्पेन नहीं चला रहे. प्रदेश में करीब 14 करोड़ वोटर और 22 करोड़ की आबादी है. इसमें से डेढ़ करोड़ लोग फ़ेसबुक और पांच करोड़ व्हॉट्सऐप पर हैं. हमारा मिशन उन तक पहुँचने का और अपनी बात रखने का है".

इसके बगल वाले कमरे में पांच लोगों की टीम ताज़ी बालूशाही खाते हुए सिर्फ़ ये मॉनिटर कर रही थी कि प्रदेश के 1,40,000 बूथों से क्या सुझाव/शिकायतें पहुँच रहीं हैं.
लगभग सभी राजनीतिक दलों में सोशल मीडिया पर 'प्रचार की बमबारी' करने की होड़ है.
मायावती की बहुजन समाज पार्टी को छोड़ सभी इस रेस में हैं और अपने को बेहतर बताने के दावे के साथ.

सभी तक-पहुंचने की हरसंभव कोशिश
भाजपा के वॉर रूम से महज़ एक किलोमीटर दूर एक सफ़ेद आलीशान इमारत में समाजवादी पार्टी का वॉररूम युवाओं से गुलज़ार है.
मुम्बई, पुणे और दिल्ली से प्रोफ़ेशनल यहाँ महीनों से इस जुगत में हैं कि सत्ताधारी सपा और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 'हर प्लेटफ़ॉर्म पर दिखें'.
इसकी कमान मीडिया मैनेजमेंट कर चुके आशीष यादव के पास है जो बताते हैं कि 'उनका कैम्पेन सकारात्मक है'.

उन्होंने कहा, "हमारा कैम्पेन 360 डिग्री मॉनिटरिंग और 24 घंटे के फ़ीडबैक पर आधारित है. हमारी कोशिश होती है कि हर दिन हम सोशल मीडिया वगैरह के ज़रिए एक करोड़ वोटरों तक पहुँच सकें."
बगल के बड़े हॉल में तीन विभाग बंटे हुए हैं जिनमें सबसे अहम लगा रिसर्च डिपार्टमेंट.
इसे चलाने वाले अंशुमन शर्मा हाल ही में हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय से लौटे हैं और मानते हैं कि "सही और प्रामाणिक रिसर्च के बिना कोई भी कैम्पेन सफल नहीं हो सकता".
कुछ ऐसे ही लोग भाजपा के भी वॉर रूम में मिले थे जो विदेशों में अच्छी नौकरियां छोड़ अपनी-अपनी पसंद की पार्टियों के साथ आकर जुड़ गए.

नौकरियां छोड़ जुड़ रहे हैं युवा
पटना, बिहार के रहने वाले दानिश दुबई की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करते थे, लेकिन सब त्याग बिना अपने माता-पिता को बिना बताए भारत आ गए और अब भाजपा वॉर रूम में मीडिया मॉनिटरिंग करते हैं.
उन्होंने बताया, "मुझे इस बात को लोगों तक पहुंचाना है कि मेरी पार्टी में मुसलमान लोगों की भी पूछ है. जब दोस्तों से बात हुई तब उन्हें भी इस बात को समझाया कि मुझे भविष्य के लिए कुछ करना है".
समाजवादी पार्टी वॉर रूम में भी कुछ ऐसे ही लोग मिले जो बड़ी नौकरियां छोड़ पार्टी से जुड़े हैं.

पैसे के मामले में चुप हैं सब
दिल्ली की रहनेवाली कृतिका पिछले कई महीनों से लखनऊ सपा कार्यालय में ब्रैंड अखिलेश की मार्केटिंग में लगी हुईं हैं.
कृतिका ने बताया, "दुनिया की टॉप ब्रैंड्स के साथ काम करने के बाद अब एक मुख्यमंत्री के साथ काम करने को मिला है जो बहुत दिलचस्प है. शायद मेरे करियर का सबसे चैलेंजिंग काम यही है".

कांग्रेस पार्टी ने अपने वॉर रूम रणनीति पर सार्वजनिक तौर से ज़्यादा बात नहीं की है जबकि बहुजन समाज पार्टी सोशल मीडिया कैम्पेन में थोड़ा देर सही लेकिन शामिल हो गई है.
हालांकि जितने भी वॉर रूमों में जाना हुआ किसी में भी काम करते किसी एक व्यक्ति ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि उन्हें सैलरी या मेहनताना कितना मिलता है.













