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बुधवार, 16 जुलाई, 2008 को 20:39 GMT तक के समाचार
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'मैं बहुत देर तक निराश नहीं रहता था'

मनोज वाजपेयी
मनोज वाजपेयी ने थिएटर के ज़रिए फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश किया है

मनोज वाजपेयी फ़िल्मी दुनिया का जाना पहचाना नाम बन चुका है लेकिन स्टारडम का यह रास्ता कांटों भरा रहा है.

बिहार के पश्चिमी चंपारण ज़िले से मुंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने के रास्ते में कई ऐसे मौके आए जब उन्हें हताशा और निराशा का सामना करना पडा लेकिन वो अपने रास्ते से हटे नहीं.

बैंडिट क्वीन, सत्या, पिंजर और शूल जैसी बेहतरीन फ़िल्में कर चुके मनोज अपना अतीत नहीं भूले हैं और अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं.

मनोज बताते हैं, "मैं बेतिया के बेलवा गांव का हूं. मेरे गांव में अभी भी बिजली नहीं है, सड़कों का बुरा हाल है. मैं औसत से थोड़ा बेहतर छात्र था. दोहा प्रतियोगिता भाषण आदि में भाग लेता था लेकिन उस समय ऐसा सोचा नहीं था कि एक्टर बनूंगा".

मुंबई ड्रीम्स शृंखला की आखिरी किस्त में फ़िल्म अभिनेता मनोज वाजपेयी का कांटो भरा सफ़र जो उन्होंने बेलवा गांव से बॉलीवुड तक तय किया.

बाद में मनोज राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ( एनएसडी) में एडमिशन लेने के उद्देश्य से दिल्ली पहुंचे. वो कहते हैं, "ग्रैजुएशन के बाद मैनें चार साल लगातार एनएसडी के लिए अप्लाई किया लेकिन मेरा एडमिशन नहीं हुआ. उस दौरान मैं लगातार थियेटर करता रहा. बैरी जॉन और एनके शर्मा के साथ".

वो कहते हैं कि शुरुआती दौर में एनएसडी में नहीं होने पर उन्हें दुःख हुआ था और पहली बार फेल होने पर पाँच दिन तक वो डिप्रेशन में भी रहे लेकिन फिर संभल गए.

 फ़कीर की तरह रहना पड़ता था. कभी कभी मन में आता था कि वापस दिल्ली चला जाऊं या गांव चला जाऊं. कुछ होने वाला नहीं है. लेकिन मैं दुःखी नहीं रहता था,
मनोज वाजपेयी

धीरे धीरे दिल्ली में उन्हें थियेटर में काम मिलने लगा और वो रम गए थे. वो मुंबई आना भी नहीं चाहते थे और दिल्ली में नौकरी कर के थियेटर करना चाहते थे.

तो फिर मुंबई कैसे आए. वो बताते हैं, "जब मैं नौकरी खोजने की सोच ही रहा था तब तक बैंडिट क्वीन मिल गई. उन दिनों शेखर कपूर बैंडिट क्वीन के लिए दिल्ली और दिल्ली के आसपास से एक्टरों का आडीशन ले रहे थे. मुझे उसमें मानसिंह का रोल मिल गया तो मैं मुंबई आ गया".

मानसिंह के रुप में मनोज का काम सराहनीय रहा लेकिन इसके बाद मनोज को कोई बड़ा ऑफर नहीं मिला. वो कहते हैं, "मुझे की दिन काम के बिना बिताने पड़े. मैं 24 घंटे थियेटर करता था और मुंबई में मुझे प्रोड्यसरों को जाके फोटो दिखाना पड़ता था. बहुत तकलीफ़ होती थी. फिर स्वाभिमान सीरियल मिला और गोविंद निहलानी ने कुछ काम दिया".

सत्या का ऑफर

मनोज को सबसे बड़ा ब्रेक सत्या के ज़रिए मिला और तब तक वो पाँच साल कष्ट में बिता चुके थे. वो कहते हैं, "फ़कीर की तरह रहना पड़ता था. कभी कभी मन में आता था कि वापस दिल्ली चला जाऊं या गांव चला जाऊं. कुछ होने वाला नहीं है. लेकिन मैं दुःखी नहीं रहता था, हां झटके मिलते थे".

मनोज वाजपेयी और उर्मिला मातोंडकर
मनोज के करियर में पिंजर एक सशक्त फ़िल्म रही

वो याद करते हुए कहते हैं, "एक दिन बहुत बुरा था मुझे उस दिन तीन कामों से बाहर किया गया. एक सीरियल से, एक डॉक्यू ड्रामा और एक सीरियल से मुझे निकाल दिया गया था. इस घटना से मेरे दोस्तों को लगा कि मैं आत्महत्या कर लूंगा लेकिन मैं एक दिन के बाद सब भूल गया".

मनोज कर्ज़ लेकर, छोटे मोटे काम करके अपनी जीविका चलाते रहे लेकिन उन्हें अपने ऊपर भरोसा था और वो कहते हैं कि अपने प्रति प्रेम ने उन्हें मुंबई में रोके रखा.

सत्या की भूमिका ने मनोज को एक अभिनेता के तौर पर स्थापित किया. वो बताते हैं, " रामगोपाल ने तमन्ना और बैंडिट क्वीन देखी थी और उन्हें मेरा काम पसंद आया. सत्या जब बन रही थी तब सेट पर लगता था कि ये फ़िल्म हिट होगी क्योंकि ये सभी लोगों को पसंद आ रही थी लेकिन इतनी बड़ी हिट होगी ये नहीं सोचा था".

वो कहते हैं, "सत्या जैसी फ़िल्में कम ही बनती है और कभी कभी बनती हैं. अभिनेता मैं बन गया लेकिन मैं मानता हूं कि ये मंजिल नहीं है. नई चुनौतियां हैं और मैं उनके लिए तैयार रहता हूं".

सत्या के बाद पिंजर और शूल में मनोज के काम की तारीफ़ हुई. अब वो स्थापित हो चुके हैं लेकिन अभी भी किसी को सलाह देने से कतराते हैं.

वो कहते हैं, "मैं सलाह देने से डरता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि कहीं न कहीं इंडस्ट्री में मेरी गोटी फिट बैठ गई इसलिए मैं यहां हूं. वैसे एक ही चीज है कि आप जो करना चाहते हैं वो मन लगाकर कीजिए और यह मत सोचिए कि इससे मिलेगा क्या".

यानी कि कर्म कीजिए फल की चिंता मत कीजिए, इस पर मनोज कहते हैं, "अगर आप कर्म करते समय फल के बारे में सोचते हैं तो इसका यही मतलब है कि कर्म में आपका भरोसा नहीं है. इसलिए बस अपना काम कीजिए".

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