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शुक्रवार, 20 जून, 2008 को 20:21 GMT तक के समाचार
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मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे याद रखें : उर्मिला

उर्मिला मांतोडकर
राम गोपालवर्मा की 'रंगीला' को उर्मिला मांतोड़कर की पहली सुपर हिट फ़िल्म माना जाता है.
उर्मिला मातोंडकर ने जब 'रंगीला' जैसी फ़िल्म की तो लोगों ने उन्हें बोल्ड और हॉट अभिनेत्री का तमगा दे डाला.

लेकिन जब वे 'पिंजर' , 'बनारस', 'सत्या' और 'मैंने गाँधी को नहीं मारा' जैसे फ़िल्मों में दिखाई दीं तो लोगों ने उन्हें विशेष सिनेमा की अभिनेत्री कहना शुरू कर दिया था.

पहली बार जब वे सहारा और सोनी चैनल के एक शो में जज और एंकर बनी तो लोगों ने कहा कि अब फ़िल्मों में उनके पास काम नहीं रहा. पर उर्मिला ऐसी चर्चाओं को गंभीरता से नहीं लेती हैं.

वह मानती हैं कि फ़िल्म हो या टीवी लोगों की उम्मीद पर खरा उतरना ज़रूरी है.

इसी महीने उनकी चर्चित फ़िल्म ‘पिंजर’ इसराइल के इंटरनेशनल सिनेमा साउथ फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई गई.

आपकी फ़िल्म 'पिंजर' इतने समय बाद किसी इंटरनेशनल फ़िल्म समारोह में दिखाई गई?

हाँ, अमृता प्रीतम के उपन्यास पर बनी यह क्लासिक फ़िल्म मेरे जीवन की अहम फ़िल्म है.

पर रामू की शोले में जब आप केवल एक आइटम गीत महबूबा..महबूबा में लौटी तो लोगों ने उसे स्वीकार नहीं किया?

कभी कभी ऐसा होता है. मैंने वह आइटम गाना केवल इसलिए किया क्योंकि मैं सिनेमा की पहली आइटम गर्ल हेलन जी को सम्मान देना चाहती थी.

फिर भी रामू कैम्प में तो आपकी वापसी नहीं हुई?

वे प्रतिभाशाली निर्देशकों में हैं. उनके साथ एक बार हर अभिनेत्री काम करना चाहती है.

टीवी पर भी आप इसलिए आईं क्योंकि अब सारे बॉलीवुड स्टार टीवी पर आने लगे हैं ?

नहीं, मैंने पहले भी कहा था कि मैं टीवी पर अभिनय करने नहीं आ रही हूँ. यह केवल जजिंग और एंकरिंग करने तक ही सीमित है. यह मेरे लिए नए अनुभव से भी जुडा है. टीवी के दोनों शो मैंने इसलिए स्वीकार किए क्योंकि मैं नाचना गाना पसंद करती हूँ.

फिर 'नाच' जैसी फ़िल्म में रामू ने आपको क्यों नहीं दोहराया ?

यह मैं कैसे बता सकती हूँ, हो सकता है कि दूसरी अभिनेत्रियाँ मुझसे बेहतर डाँसर हों. (हँसती हैं)

इसकी वजह यह भी रही कि आपकी और रामू की बात बाद में बिगड़ गई और आपने रामू कैम्प से बाहर की फ़िल्में केवल ख़ुद को उनके सामने साबित करने के लिए की ?

नहीं कोई भी कलाकार किसी एक निर्माता या एक निर्देशक के सहारे अपने करियर बनाने इंडस्ट्री में नहीं आता है. यह अलग बात है कि ऐसा मान लिया जाता है. मैंने भी उनके साथ अपने करियर कि 'रंगीला , 'सत्या', और 'भूत' जैसी बेहतरीन फ़िल्में की. लोगों को मेरे और रामू के बारे में बात करने से ज़्यादा मेरे काम के बारे में बात करनी चाहिए.

मैंने उनके साथ तेलगु फ़िल्म 'एन्थम' से शुरुआत की थी जो बाद में 'द्रोही' के नाम से हिंदी में बनी और उनके साथ तेलगु की पहली हिट 'घायम दी थी. हिंदी में शायद रंगीला उनके भी करियर की सबसे पहली हिट थी.

 कोई भी कलाकार किसी एक निर्माता या एक निर्देशक के सहारे अपने करियर बनाने इंडस्ट्री में नहीं आता है. यह अलग बात है कि ऐसा मान लिया जाता है
उर्मिला मांतोडकर, अभिनेत्री

अब आपकी फ़िल्मों की क्या स्थिति है ?

'स्पीड' और 'ओम शांति ओम' जैसी फिल्में की हैं और अभी 'क़र्ज़', 'लंदन ड्रीम्स' , 'ई एम् आई', 'स्टॉप फ़न' और निखिल आडवाणी की एक एनीमेशन फ़िल्म और विक्रम भट्ट की फ़िल्म है.

'क़र्ज़' की रीमेक में आप सिम्मी ग्रेवाल वाला करिश्मा कर पाएँगी ?

मैं किसी करिश्मे के लिए फ़िल्में नहीं करती और न ही मैं किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हूँ कि मैं किसी के काम या भूमिका को धो सकती हूँ. निर्देशक सतीश कौशिक ने इसमें अपनी तरह का फ्लेवर दिया है .यह 'क़र्ज़' के फ्रेम टू फ्रेम नक़ल नहीं है.

आप चुनिंदा फ़िल्में करती हैं और लोगों उन का मानना है कि आप को टीवी पर प्रतिभा तलाशने के इस बाज़ार से अलग रहना चाहिए ?

किसी की प्रतिभा का आकलन करना आसान नही. मैं तो ख़ुद अभी सीख रही हूँ. मेरी तुलना दूसरे लोंगों से मत कीजिए प्लीज़. जहाँ तक सोनी के इस शो ‘वार परिवार’ की बात है तो मैं उनके साथ केवल जून तक हूँ.

उर्मिला मांतोडकर
उर्मिला मांतोडकर मानती हैं कि वे किसी करिश्में के लिए फ़िल्में नहीं करती हैं.

पर तुलना होना तो लाज़मी है ?

तुलना मुझे पसंद नहीं. मैंने अपनी शुरुआत 'कलयुग', 'मासूम' और 'डकैत' जैसी फ़िल्मों में एक बाल कलाकार की तरह की थी. उसके बाद मैं 'नरसिम्हा' से नायिका बनी. लेकिन उसके बाद मैंने 'पिंजर' , 'भूत' , 'एक हसीना' , 'बनारस' , 'जुदाई' , 'नैना' और 'मैंने गाँधी को नही मारा' जैसी फिल्में की, ये फ़िल्में मुझे दूसरी अभिनेत्रियों की भीड़ से अलग करती हैं. मुझे जो ख़राब लगता है मैं मना कर देती हूँ.

सफलता क्या है?

हम जब लीक से अलग हटकर ख़तरे उठाने लगे तो समझना चाहिए कि अब आप सफलता के करीब पहुँच गए हैं. मैंने 'सत्या' और 'पिंजर' उन हालातों में की जब कई अभिनेत्रियों ने मना कर दिया था.

और बनारस ?

वो मैंने पंकज पराशर से ख़ुद माँग कर ली थी. (हंसती हैं )

'पिंजर' , 'बनारस' और 'मैंने गाँधी को नहीं मारा' के बाद कहा जा रहा था कि आप नेशनल अवॉर्ड की हक़दार हो गई हैं ?

मैंने कोई फ़िल्म इसलिए नहीं की कि मैं किसी अवार्ड के लिए काम कर रही हूँ. मैं ख़ुद को दोहराना नही चाहती, बस पर मैं ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती कि मुझे ख़ुद से ही सवाल पूछना पड़े कि मैंने क्या किया. 'रंगीला' में मैंने जो ट्रेंड शुरू किया था वो अब ज़ीरो साइज़ पर पहुँच गया है पर मैं उस हद तक नहीं जा सकती.

अब आप बदले हुए बॉलीवुड में ख़ुद को कहाँ पाती हैं ?

जब भी भारतीय सिनेमा की बात हो तो लोग कहे की उर्मिला एक एक्ट्रेस थी.

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