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सोमवार, 30 जनवरी, 2006 को 07:39 GMT तक के समाचार
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पराशर का एक और प्रयोग 'बनारस'

फ़िल्म बनारस का एक दृश्य
फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह से लेकर डिंपल कपाड़िया तक कई बड़े कलाकार हैं
चालबाज़ और जलवा जैसी फ़िल्मों से पहचान बनाने वाले निर्देशक पंकज पराशर ने 14 फ़ीचर फ़िल्मों में विभिन्न विषयों पर अलग सी शैली की फ़िल्में बनाई हैं.

'बनारस' उनकी ताज़ातरीन फ़िल्म है जिसकी कहानी अध्यात्म की ऊँचाई और प्रेम की गहराई के ताने–बाने पर बुनी गई है.

फ़िल्मांकन के अपने अंदाज़ से दृश्यों में जादू जगाने के फ़न में माहिर पंकज की अधिकांश फ़िल्में दर्शकों की आँखों में तो बसती हैं लेकिन अक्सर कमज़ोर स्क्रिप्ट के कारण दिल में उतर नही पातीं.

इसके बारे में पंकज साफ़गोई के साथ बताते हैं, "मेरी ट्रेनिंग फ़िल्म इंस्टीट्यूट पूना में हुई जहाँ छात्रों को दुनिया भर के सिने दिग्गजों के काम को देखने और समझने का मौका मिलता है."

पंकज कहते हैं, "वे फ़िल्में नाच गाने से भरी काल्पनिक कहानियाँ नहीं होतीं बल्कि इंसानियत के नए मानी तलाशने की यात्रा होती है. इंस्टीट्यूट से बाहर आते ही औरों की तरह मुझे भी समझ आया के जीवन को तलाशने और तराशने वाले विषयों पर फ़िल्म बनाकर दाल रोटी नहीं कमाई जा सकती, सो मैं भी प्रचलित फार्मूले की बंबईया फ़िल्में बनाता रहा और उस ढाँचे में जितने हो सके उतने प्रयोग भी किये."

फिर वे अपनी प्रयोगधर्मिता के बारे में कहते हैं, "दूसरी तरफ सच और यथार्थ से रिश्ता कायम रखने के लिये डाक्यूमेंट्रीज़ भी बनाता रहा."

अलग सी फ़िल्म

पंकज पराशर कहते हैं कि दर्शन और आध्यात्म में उनकी शुरू से ही कुछ रुचि रही, ऐसे में जब एलसी सिंह ने प्रेम और सत्य की खोज पर एक कहानी सुनाई और उस पर फ़िल्म बनाने की इच्छा ज़ाहिर की.

पंकज पाराशर
पंकज पराशर अपनी फ़िल्मों में प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं

पंकज बताते हैं, "एलसी सिंह से शुरू में ही कहा के ऐसे विषय पर फ़िल्म बनना व्यावसायिक तौर पे ख़तरा उठाने जैसी बात हो सकती है, ऐसी फ़िल्मों को यूरोप या जापान में तो आसानी से बेचा जा सकता है मगर भारत में ऐसी फ़िल्मों की परंपरा नहीं रही है."

वे कहते है कि सिंह अपने निश्चय पर अडिग रहे. पंकज मानते हैं कि भारत में ऐसा प्रोड्यूसर मिलना चमत्कार से कम नहीं है जो एक रचनात्मक खोज के लिये अपने पैसे दाँव पर लगाए.

वे कहते हैं, "उनके विश्वास ने मेरा उत्साह बढ़ाया और हम जुट गए."

बनारस में शूटिंग

'बनारस' एक कुलीन ब्राम्हण परिवार की लड़की ( उर्मिला मार्तोंडकर ) और एक नीची जाति के लड़के ( अश्विन पटेल ) की प्रेम कथा है. नायक का व्यक्तित्व आध्यात्म और संगीत में रचा बसा है.

बनारस का एक दृश्य
फ़िल्म में बनारस के दृश्यों की भरमार है

फ़िल्म में नसीरूद्दीन शाह, राज बब्बर, डिंपल कापाड़िया जैसे सधे हुए कलाकार हैं.

दीपा मेहता की फ़िल्म के दौरान हुए हंगामे के बाद से आमतौर पर फ़िल्म निर्माता-निर्देशक बनारस जाने से घबराने लगे हैं लेकिन पंकज का अनुभव अलग रहा, "हमने पटकथा पर आम लोगों की सहमति पहले ही ले ली थी इसलिये हमारी टीम को बनारस वासियों से गजब का सहयोग मिला."

फ़िल्म में बीएचयू, कबीर मठ और बनारस के घाट बार-बार दिखाई पड़ते हैं.

इस फ़िल्म के निर्माण के पूरे अनुभव पर पंकज पराशर कहते हैं, "बनारस बनाने के बाद लगा जैसे ज़िदगी का एक ज़रूरी काम पूरा हुआ. फ़िल्म की सफलता- असफलता से अलग मैं इसे बनाकर भीतर तक संतोष महसूस कर रहा हूँ."

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