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बुधवार, 10 अगस्त, 2005 को 04:29 GMT तक के समाचार
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अपहरणः राजनीति-अपराध का ताना-बाना

नाना पाटेकर और अजय देवगन
'भूत' के बाद नाना पाटेकर और अजय देवगन एक बार फिर साथ दिखेंगे
प्रकाश झा की नज़रें इस बार देश में तेज़ी से फैली अपहरण संस्कृति पर है. झा ने इसी संस्कृति के तमाम पहलुओं को उजागर करने की कोशिश की है ‘अपहरण’ में.

अजय देवगन, नाना पाटेकर, बिपाशा बसु और मोहन अगाशे की मुख्य भूमिका वाली ‘अपहरण’ का ताना बाना बिहार की पृष्ठभूमि में ही बुना गया है.

प्रकाश झा ने इसमें राजनीति और अपराध के जिस तालमेल को सामने रखा है, फिल्म से इतर उन्हें देखने के लिए वहां ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है.

उद्योग का रूप ले चुके अपहरण के बाज़ार की बारीकियों को इस फिल्म में खोल कर रख दिया है आधा दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और अनगिनत दूसरे राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय सम्मान पा चुके इस फिल्मकार ने.

'दामुल' से लेकर अब 'अपहरण' तक प्रकाश की फिल्मों पर ग़ौर करें तो एक सवाल अक्सर उठता है - क्या ये फिल्में उनका एक्टिविज़्म हैं.

बिहार से चुनाव लड़ चुके प्रकाश झा इस सवाल के जवाब में कहते हैं, "एक्टिविज़्म तो नहीं. हां, मैं कहानियां और पात्र वहां के समाज से उठाता हूं जो मुंबई से दूर यूपी बिहार, बंगाल या यूं कहिए देश भर में है. बड़े शहरों से बाहर बैठे लोगों की समस्याएं, वहां हो रहे सामाजिक राजनीतिक मनोवैज्ञानिक बदलाव पर मेरी लगातार नज़र रहती है और मेरी फिल्में इन सब पर मेरी प्रतिक्रिया होती है."

वे कहते हैं, "असल में अपहरण संस्कृति देश में हो रहे सामाजिक आर्थिक बदलावों का ही नतीजा है जो खास तौर पर बिहार में तेज़ी से पनपी और आज एक उद्योग बन गयी है."

कहानी

फिल्म में अजय देवगन एक ऐसे मध्यवर्गीय युवक हैं जिसके छोटे-छोटे मध्यवर्गीय सपने हैं. उन सपनों से ज्यादा वह कुछ नहीं चाहता. लेकिन मेहनत के बावजूद वह उन सपनों को साकार नहीं कर पाता.

हताश अजय को ऐसे में मिलते हैं राजनेता तबरेज़ आलम यानी नाना पाटेकर, जो अपने हर अच्छे बुरे काम को खुदा का नाम लेकर सही ठहराने में माहिर है. जो अपने कानून खुद बनाता है. वहां से अजय के हाथ में आ जाती है पिस्तौल.

फिल्म में बिपाशा बसु इस बार ग्लैमरगर्ल नहीं एक छोटे शहर के मध्यवर्गीय परिवार की एक ऐसी लड़की के किरदार में हैं जिसे अच्छे बुरे की काफी अच्छी समझ है.

मोहन अगाशे अजय के ऐसे आदर्शवादी प्रोफेसर पिता हैं, जिन्हें आखिर ये मानना पड़ता है कि दुनिया भर को सही राह दिखाने में जिंदगी झोक देने वाला शख्स महान तो हो सकता है पर एक सफल पिता भी हो ये जरूरी नहीं.

जल्द ही रिलीज़ होने जा रही इस फिल्म को देखने पर इन पात्रों को आप दूसरे नामों से पहचान लें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.

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