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'ब्लॉग मेरे घर का प्रवेश द्वार है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमिताभ बच्चन इन दिनों खासे व्यस्त हैं. छह जून को उनकी फ़िल्म सरकार राज रिलीज़ होने जा रही है, उसी दिन बैंकॉक में आइफ़ा अवार्ड्स की शुरुआत भी हो रही है. उन्होंने इसी बीच बीबीसी से बातचीत के लिए खास तौर से वक्त निकाला. मुंबई के महबूब स्टूडियो में वो किसी फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे, वहीं इंटरव्यू के सिलसिले में मिलना हुआ. कुछ एक मुलाकातों को छोड़ दें तो अमिताभ से हर बार मिलना एक अलग अनुभव रहा है. इस बार की मुलाक़ात में उन्होंने अपनी फ़िल्म सरकार राज के साथ-साथ अपने चर्चित ब्लॉग, स्वास्थ्य और आइफ़ा की तैयारियों के बारे में विस्तार से बात की. एक बात आपको यहाँ खास तौर पर बता दूँ कि बच्चन साब बात-बात में चुटकी लेना कभी नहीं भूलते. पेश है बातचीत के मुख्य अंश सबसे पहले तो आपका धन्यवाद कि आपने अपने व्यस्त कार्यक्रम में से वक्त निकाला हमसे बात करने के लिए. शुक्रिया लेकिन ये श्रेय इन देवी जी को जाता है ( अपनी मैनेजर की तरफ़ इशारा करते हुए) जिन्होंने आपको यहां बुलाया है. ये जहाँ कहती हैं मैं जाकर बैठ जाता हूं. सबसे पहले ये बताइए कि सरकार कहानी थी सुभाष नागरे की, उसकी सोच की, उसके संघर्षों की. अगर सरकार राज की बात करुं तो इस फ़िल्म की क्या कहानी है. सरकार में जो परिवार था वो सरकार राज में भी है,परिवर्तन कोई ज़्यादा नहीं है. परिवार में क्या घटनाएं घटती हैं उसकी कहानी है. ऐश्वर्य राय फ़िल्म की कहानी में एक नया मोड़ लाती हैं, वो एक प्रोजेक्ट की इंचार्ज हैं एक कंपनी की चीफ़ एक्ज़िक्यूटिव अफ़सर हैं, विदेश से आती हैं और वो एक प्रोजेक्ट महाराष्ट्र में लगाना चाहती हैं. इसके ऊपर क्या बातें होती हैं, क्या परिस्थितियां बनती हैं, क्या राजनीति होती है,यही फ़िल्म की कहानी है. सरकार राज में काम करने का क्या अनुभव रहा ऐसे में जबकि इस फ़िल्म में अभिषेक और ऐश्वर्या भी साथ थे. सभी फ़िल्मों में काम करने का मेरा अनुभव हमेशा बहुत ही अच्छा रहा है वरना मैं काम क्यूँ करुं. लेकिन ये बात सही है कि अगर किसी फ़िल्म में परिवार के सभी सदस्य हों तो काम का अलग ही अनुभव रहता है. ऐसा पहली बार है कि शादी के बाद आप, अभिषेक और ऐश्वर्या एक साथ किसी फिल्म में दिखाई देंगे, ये जानना चाहूंगा कि कितना अलग अनुभव था.
जहां तक मेरी जानकारी है राज कपूर साहब की फ़िल्म आवारा में उनके परिवार के तीन सदस्य थे-वे स्वयं, उनके पिता पृथ्वी राज जी और पृथ्वी राज जी के पिता जी थे. बाद में डब्बू कपूर (रणधीर कपूर) ने एक फ़िल्म बनाई जिसमें राज जी थे, पृथ्वीराज जी थे, डब्बू खुद थे और बबिता जो कि शायद उस वक्त उनकी पत्नी हो चुकीं थीं या होने वाली थीं उन्होंने भी अभिनय किया था. तो ये श्रेय उनको जाना चाहिए ये हमारा श्रेय नहीं है. दूसरी बात ये कि ज़ाहिर है कि जब परिवार के सदस्य एक साथ होते हैं तो अच्छा लगता है. जब कैमरा ऑन होता है तो किरदार बन जाते हैं जब कैमरा ऑफ़ होता है तो परिवार बन जाते हैं. उठना बैठना तो रहता ही है और हमारे लिए ये खास इसलिए भी रहा क्योंकि हमारे परिवार के सदस्य अलग-अलग दिशाओँ में अपने-अपने काम में मसरुफ़ रहते हैं, इस फ़िल्म के ज़रिए ये मौका ज़रुर मिल गया कि एक साथ बैठ उठ सकें,खा पी सकें. सरकार में अभिषेक की परफॉर्मेंस की काफ़ी तारीफ़ की गई थी. अब आपने उनके साथ सरकार राज में भी काम किया है. आप क्या कहना चाहेंगे इस फिल्म में उनकी परफॉर्मेंस के बारे में. मैं तो कहूंगा कि अच्छी है. रामू ने जो उनसे चाहा या जिस तरह से उनसे चाहा है वो उन्हें मिला है. राम गोपाल वर्मा के साथ आपने कई फिल्में की हैं. उनमें से कुछ बॉक्स ऑफ़िस पर काफी सफल रही हैं जबकि कुछ फ्लॉप. एक निर्देशक के लिहाज़ से आप उनके बारे में क्या सोचते हैं. मैं उनको बड़ा सक्षम निर्देशक मानता हूं, उनके साथ काम करके मुझे बड़ा सुख मिलता है. मेरा ऐसा मानना है कि वो इंडस्ट्री के गिने चुने निर्देशकों में से एक हैं. उन्होंने मुझे हमेशा ऐसे किरदारों की रुपरेखा दी है प्रस्तुत करने के लिए जो मेरे लिए बड़ा संघर्षपूर्ण रहा और किसी भी कलाकार के लिए ये बड़ा सुखद अनुभव होता है जब उसे किसी भूमिका के लिए संघर्ष करना पड़े. उन्होंने हमेशा ऐसे किरदारों का निर्माण किया है जिन्हें करने में मुझे अत्यंत सुखद अनुभव रहा है. एक सवाल मेरे ज़हन में आ रहा है कि आपकी फ़िल्म सरकार राज कहीं न कहीं पावर की बात करती है अगर मैं आपसे ये पूछूं कि पावर शब्द का क्या मतलब है आपके लिए.
ये कहना बड़ा मुश्किल है, पावर शब्द के बारे में कुछ कहना. ये इत्तेफ़ाक की बात है कि आपने जब मुझसे ये प्रश्न पूछा है, मैं अभी-अभी बैठा अपने ब्लॉग में इसी के बारे में लिख रहा था. पावर का अलग अलग रुपांतर हो सकता है. पावर को किसी राजनेता से जोड़ा जा सकता है, पावर शब्द किसी उद्योगपति से जुड़ सकता है,पावर किसी व्यवसाय से जुड़ता है ,पावर मीडिया के पास है, पावर आपके पास है. आप अभी बैठकर मेरा इंटरव्यू ले रहे हैं, इस वक्त ये पावर आपके पास है कि आप मुझसे प्रश्न पूछें. आप शायद ये चाहेंगे कि इस इंटरव्यू में आप मुझसे ज़्यादा पावरफुल दिखें और मैं चाहूंगा कि मेरे जवाब अच्छे हों, मैं कहीं ढीला ना दिखूं. तो तरह तरह के पावर होते हैं. फिल्म की जहां तक बात है तो कहानी है एक ऐसे सशक्त परिवार की जिसका मुखिया अपने आस पास ऐसा माहौल बनाए रखता है जिसे पावर कहा जा सकता है. और उसके परिवार से जुड़ने वाला हर व्यक्ति चाहे वो राजनीति का हो, व्यवसाय का हो किस तरह से खुद को प्रस्तुत करता है ये उसका नज़रिया है. तो पावर के अलग अलग मायने हैं, मैं तो पावरफुल हूं नहीं इसलिए इस विषय में कुछ ज़्यादा नहीं कह सकता लेकिन ये ज़रुर है कि जो किरदार है वो सशक्त किरदार है और राजनीति में न होते हुए भी एक ऐसा माहौल तैयार करना कि ये लगे कि ये पावरफुल हैं ये इस फ़िल्म की कहानी है. छह जून से बैंकॉक में आइफ़ा पुरस्कार समारोह की शुरुआत होने जा रही है.आप आइफ़ा के ब्रैंड ऐम्बैस्डर हैं. ये पूछना चाहूंगा कि क्या खास है इस बार. आइफ़ा पुरस्कारों को ये नवां वर्ष है और जब ये शुरु हुआ था तो केवल एक अवार्ड समारोह बनकर शुरु हुआ था जिसमें कि उन कलाकारों को जिनकी फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन किया था उनको सम्मानित किया जाता था. लेकिन धीरे धीरे जैसे वर्ष बढ़ते गए दो इसका फैलाव तीन दिन तक हो गया जहां पुरस्कारों के अलावा कई अन्य चीज़ें जैसे बिज़नस फ़ोरम,चेरिटी से जुड़ी हुई बातें,स्पोर्ट्स से संबंधित चीज़ो का आयोजन किया जाता है. धीरे धीरे ये एक पुल बनता जा रहा है जहां एक समुदाय दूसरे समुदाय से मिलता है. हमारी पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लोग एक दूसरी जगह पर एक साथ एकत्र होते हैं और इस बात की चर्चा होती है कि हम अपने यहां भारत में किस तरह की फ़िल्में बनाते हैं तो मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि आइफ़ा के ज़रिए हमारा संपर्क और देशों के साथ बनता जा रहा है और ये एक मंच बनता जा रहा है जिसके ज़रिए हम दूसरे देश के लोगों को अपनी कला, संस्कृति, इतिहास से रुबरु करवा सकते हैं। जुलाई महीने में आपका बहुचर्चित वर्ल्ड शुरु होने जा रहा है. ये किन किन देशों में होगा और इसकी रुपरेखा क्या होगी.. ये इसका पहला चरण है और हम पहले चरण में पश्चिमी देशों में जाएंगे जैसे कि लंदन,यूरोप और अमरीका. हो सकता है कि हम वेस्टइंडीज़ भी जाएं. इसकी रुपरेखा अभी बन रही है. आप इतने व्यस्त रहते हैं, ऐसे में खुद को चुस्त दुरुस्त रखने के लिए क्या करते हैं.. हंसते हुए.. वही करता हूं जो एक आम आदमी करता है. थोड़ी बहुत वर्जिश कर लेता हूँ शाकाहारी व्यक्ति हूं, सिगरेट, शराब नहीं पीता. और भी बाकी कई चीजें नहीं करता हूँ. पता नहीं ये अच्छा है या बुरा लेकिन मैं नहीं करता और अगर इन्हीं सब वजहों से मेरा स्वास्थ्य ठीक रहता है तो मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूं. इन दिनों आपका ब्लॉग काफ़ी चर्चा में है. कुछ लोग तारीफ़ करते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आलोचनाएं करते हैं. कैसा लगता है जब कोई कड़वी आलोचना होती है, प्रतिक्रिया होती है ब्लॉग पर लिखी आपकी बातों को लेकर.. मैं इन प्रतिक्रियाओं को वैसे ही लेता हूं जैसे कि लेना चाहिए. अपने ब्लॉग को मैं अपने घर का प्रवेश द्वार मानता हूं, जिसे मैने खोल दिया है जिसमें मैं अपनी भावनाएं व्यक्त करता हूं और लोग उसे पढ़कर अपनी भावनाएं उस द्वार के आड़ में डाल देते हैं जिसे मैं देखता हूं. फिर चाहे फिर उसमें आलोचना हो, बुराई हो ,गाली गलौज हो मैं उन सारी चीज़ों को स्वीकार करता हूं. |
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