BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
मंगलवार, 19 जून, 2007 को 10:30 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'निर्देशक के हाथ में मिट्टी के जैसा हूँ'

अमिताभ बच्चन
बाफ़्टा ने अमिताभ बच्चन के सम्मान में लंदन में विशेष आयोजन किया
ब्रिटिश एकेडेमी ऑफ़ फ़िल्म एंड टेलीविज़न आर्ट्स (बाफ़्टा) ने भारतीय सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के सम्मान में हाल ही में विशेष समारोह आयोजित किया.

लंदन में हुए इस कार्यक्रम में पिछले क़रीब 30 वर्षों से अमिताभ बच्चन की कई क्लासिक फ़िल्में दिखाई गई जिनमें शोले से लेकर निशब्द भी शामिल रहीं.

इस मौके पर बीबीसी ने लंदन में अमिताभ बच्चन से ख़ास बातचीत की.

यूँ तो आपको कई पुरस्कार-सम्मान मिल चुके हैं. ब्रिटेन में बाफ़्टा से मिला ये सम्मान किस मायने में ख़ास है आपके लिए.

किसी भी प्रकार का सम्मान एक भारतीय होने के नाते मेरे लिए बड़े गर्व की बात है. मेरा सम्मान जब भी होता है मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि ये मेरा व्यक्तिगत नहीं बल्कि भारतीय फ़िल्म जगत और भारत के लोगों का सम्मान है. ब्रिटेन में बाफ़्टा ने विशेष कार्यक्रम रखा है, मैं बड़ी विनम्रता से इस सम्मान को स्वीकार करता हूँ और ख़ुशी ज़ाहिर करता हूँ.

ब्रिटेन में तो हमेशा से ही भारतीय फ़िल्में काफ़ी लोकप्रिय रही हैं चूँकि यहाँ बड़ी संख्या में एशियाई समुदाय है. आप हाल ही में फ्रांस के प्रतिष्ठित कान फ़िल्म उत्सव में गए थे. वहाँ किस तरह का नज़रिया देखा आपने भारतीय सिनेमा के प्रति.

 कई बार ये आरोप लगाया जाता है कि हम उस स्तर की फ़िल्में नहीं बना पाते हैं जिन्हें कान जैसे फ़िल्म उत्सवों में पुरस्कार मिल सकें. लेकिन हर चीज़ धीरे-धीरे होती है. हमारी कुछ फ़िल्में इन उत्सवों में दिखाई गई हैं, हम वितरण भी कर रहे हैं. मुझे यक़ीन है कि एक दिन हमारी फ़िल्में भी वहाँ झंडा गाड़ेंगी और पुरस्कार जीतेंगी

मैं कान गया था केवल अपनी फ़िल्म का प्रचार करने. मैं ज़्यादा समय तो रहा नहीं वहाँ लेकिन मैने देखा कि भारत से बहुत से लोग अपनी फ़िल्में लेकर वहाँ जाते हैं और मार्केटिंग का मौका मिलता है. जहाँ तक मेरी सीमित जानकारी है ये भारतीय सिनेमा के लिए अच्छी चीज़ है. कई बार हम पर ये आरोप लगाया जाता है या आलोचना होती है कि हम उस स्तर की फ़िल्में नहीं बना पाते हैं जिस स्तर की फ़िल्में कान जैसे फ़िल्म उत्सवों में जाती है, और न हम वहाँ कोई पुरस्कार जीतते हैं. लेकिन हर चीज़ धीरे-धीरे होती है, आज हम वहाँ वितरण कर रहे हैं, कुछ फ़िल्में दिखाई भी गईं. मुझे यक़ीन है कि एक दिन हमारी फ़िल्में भी वहाँ झंडा गाड़ेंगी और पुरस्कार जीतेंगी.

आपकी फ़िल्मों की अगर बात करें तो, हाल के वर्षों में कई तरह के प्रयोग किए हैं आपने भूमिकाओं में-चाहे ब्लैक हो, कभी अलविदा न कहना या निशब्द. बीस-पच्चीस साल पहले हम आपको ऐसी भूमिकाओं में नहीं देखते थे. क्या अब दर्शक ज़्यादा परिपक्व हो गए हैं या फ़िल्मकार इस तरह के प्रयोग और जोखिम उठाने को तैयार हैं.

बीस-पच्चीस साल पहले लोग ऐसी भूमिकाओं में मुझे इसलिए नहीं देखते थे क्योंकि मैं थोड़ा सा जवान था, लीडिंग रोल करता था. अब उम्र हो गई है और इसी तरह के रोल में काम करना पड़ता है, भाग्यशाली हूँ कि अच्छे रोल मिल रहे हैं. लेकिन कहीं न कहीं आपकी बात सही है कि दर्शक पहले से ज़्यादा जागरूक और परिवक्व हो गए हैं. वो अलग तरह की फ़िल्मों और किरदारों को स्वीकार करते हैं. मैं उम्मीद करता हूँ कि आगे भी लोग ऐसी फ़िल्मों को पसंद करेंगे क्योंकि हम फिर प्रोत्साहित होंगे कि ऐसे किरदार निभाते रहें.

जिन निर्देशकों के साथ आप आजकल काम कर रहे हैं, ज़्यादातर युवा निर्देशक हैं. तो क्या उन्हें अपनी बात कहने में कभी किसी तरह की हिचकिचाहट महसूस नहीं होती...आप वरिष्ठ कलाकार हैं और ये निर्देशक आपसे उम्र में काफ़ी छोटे हैं.

 मैं एक कलाकार हूँ, गीली मिट्टी हूँ निर्देशक के हाथों में, वो जिस तरह से चाहें मुझे मोड़ सकते हैं, मुझे जिस ढाँचे में चाहें ढाल सकते हैं

ऐसा कोई भेदभाव नहीं है. मैं एक कलाकार हूँ, गीली मिट्टी हूँ निर्देशक के हाथों में, वो जिस तरह से चाहें मुझे मोड़ सकते हैं, मुझे जिस ढाँचे में चाहें ढाल सकते हैं. निर्देशक कैप्टन है जहाज़ का, वो बताता है कि हमें क्या करना चाहिए. मेरे साथ तो ऐसा कभी हुआ नहीं कि किसी न हमें कहा हो कुछ करने के लिए और हमने इनकार कर दिया हो. इस तरह का वातावरण प्रचलित नहीं है कि मैं चूँकि सीनियर हूँ तो मुझसे कम उम्र के कलाकार डरेंगे. हम सब एकजुट होकर, एक टीम की तरह काम करते हैं. जो निर्देशक कहता है, मैं उसे करता हूँ. ये मेरा कर्तव्य है एक कलाकार की हैसियत से.

हर क्षेत्र में कोई न कोई शख़्सियत होती है, जिसे लोग बेंचमार्क मान कर चलते हैं. क्रिकेट में शायद कुछ लोगों के लिए वो मानक सचिन तेंदुलकर या कपिल देव हों. अभिनय में कई लोगों के लिए वो मानक आप हैं. लेकिन ख़ुद अमिताभ बच्चन के लिए वो मानक क्या है.

 मैं तो नहीं चाहूँगा कि कोई मुझे अपना उदाहरण बनाए क्योंकि मुझमें बहुत सी कमियाँ हैं. मैं उन्हें ठीक करना चाहूँगा

इस तरह की धारणाओं में मुझे विश्वास नहीं है. हर इंसान अपने आप में अलग होता है. उसकी तरह सोचने वाला, दिखने वाला दूसरा व्यक्ति तो होता नहीं. हाँ ये ज़रूर है कि समाज में ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो दूसरों के लिए उदाहरण बन जाते हैं. इसमें कोई बुरी बात नहीं है. मैं तो नहीं चाहूँगा कि कोई मुझे अपना उदाहरण बनाए क्योंकि मुझमें बहुत सी कमियाँ हैं. मैं उन्हें ठीक करना चाहूँगा. प्रतिदिन यही कोशिश रहती है कि किस तरह उन कमियों को, ख़ामियों को दूर कर सकूँ. यदि कोई मुझे अपना मानक समझता है तो मैं अपने आप को भाग्यशाली समझता हूँ. मैं तो केवल यही कहूँगा कि उन्हें अपने आप में विश्वास रखना चाहिए, मेहनत करनी चाहिए क्योंकि मेहनत का फल मीठा होता है.

सेलिब्रिटी होने के नाते आप हमेशा लोगों और मीडिया की नज़रों में रहते हैं. आप क्या करते हैं, कहाँ गए, किससे मिले, किस मंदिर में गए. सब चीज़ों पर लोगों की नज़र रहती है और लोग टिप्पणी भी करते रहते हैं. क्या इससे आपको किसी तरह की परेशानी तो नहीं होती?

इसमें हमें कोई एतराज़ नहीं हैं यदि मीडिया हमारे बारे में जानकारी हासिल करना चाहता है, तस्वीरें लेता है तो उसे हम कहाँ रोक सकते हैं. ये तो पब्लिक डोमेन है और वो सबके लिए है. हाँ हमारे घर के अंदर हम जो भी करें वो अलग बात है. यदि हम बाहर जाते हैं तो मीडिया को पूरी छूट है कि वो हमारे बारे में लिखे या जो भी उसकी धारणा है उसका प्रचार करे.

भारत को आज़ाद हुए 60 वर्ष हो चुके हैं. आज की तारीख़ में कैसे देखते हैं आप भारत और भारतीय सिनेमा को.

हर वर्ष भारतीय सिनेमा प्रगति कर रहा है. जिस तरह भारतीय सिनेमा का प्रचार हो रहा है, दूसरे देशों के लोग इसके बारे में जानना चाहते हैं ये सब बातें सिनेमा के लिए अच्छी हैं. मैं उम्मीद करता हूँ कि हम इसी तरह प्रगति करते जाएँ और विश्व में हमारा झंडा और बुलंद हो.

अमिताभ बच्चनलोगों का प्यार है बस...
बिग बी कहते हैं कि लोगों का प्यार इस उम्र में भी काम करने की ऊर्जा देता है.
इससे जुड़ी ख़बरें
पर्ल पर आधारित फ़िल्म का प्रीमियर
15 जून, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
शबाना, अमिताभ और यश चोपड़ा का सम्मान
10 जून, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
अमिताभ को हाईकोर्ट से राहत मिली
08 जून, 2007 | भारत और पड़ोस
खीर जलेबी में 'चीनी कम' नहीं
22 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
अमिताभ बच्चन ने पत्रकारों से माफ़ी माँगी
22 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
'लोगों का प्यार ऊर्जा देता है'
31 मार्च, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>