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टीवी विज्ञापनों की आवाज़ ऊँची क्यों!
विज्ञापनों की तीखी आवाज़
बहुत से लोगों को यह बुरा लगता है तो बहुत से लोगों को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
क्या आपने कभी ग़ौर किया है कि टीवी पर चलने वाले विज्ञापन दूसरे आम कार्यक्रमों से ज़्यादा तेज़ आवाज़ वाले क्यों होते हैं.

सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं ज़्यादातर सभी देशों में टीवी चैनलों में दिखाए जाने वाले विज्ञापन उसमें दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों से ज़्यादा ऊँची आवाज़ में सुनाए जाते हैं.

जैसे ही टीवी पर चल रहे कार्यक्रम के बीच कोई विज्ञापन दिखाया जाता है, बिना सोचे ही आपके हाथ रिमोट कंट्रोल पर पहुँच जाते हैं ताकि आप जल्दी से जल्दी इसकी आवाज़ को कम कर सकें.

ज़्यादातर विज्ञापनों की शुरूआत परेशान कर देने की हद तक ऊँची आवाज से होती है.

यह ऊँची आवाज़ तब तो और भी परेशानी पैदा कर देती है जब आपके बच्चे सोने की कोशिश कर रहे हों या आपके और आपके चिड़चिड़े पड़ोसी के घर के बीच की दीवार पतली हो.

अनेक शिकायतें

इस बारे में दर्शकों की सैकड़ों शिकायतों के बाद ब्रिटेन में ब्रॉडकास्ट कमेटी ऑफ़ एडवर्टाइज़िंग प्रैक्टिस (बीसीएपी) ने टीवी की आवाज़ के स्तर को लेकर एक नया नियम बनाया है.

इसके अनुसार सात जुलाई के बाद से टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन अत्यधिक शोरगुल और तेज़ आवाज़ वाले नहीं होंगे.

 कार्यक्रमों और विज्ञापनों की आवाज़ का स्तर का अंतर दरअसल होता नहीं है, केवल लोगों को ऐसा महसूस होता है
आईटीवी की प्रमुख मिशेल ग्रेड

कमेटी ने कहा, "विज्ञापनों की आवाज़ के स्तर की अधिकतम सीमा चैनल के दूसरे कार्यक्रमों के बराबर और निश्चित होनी चाहिए."

इसमें वर्तमान नियमावली स्पष्ट की गई है कि जो ब्रॉडकास्ट कंपनियों को आवाज़ की एक नियत सीमा तय करने के लिए प्रोत्साहित करती है ताकि विज्ञापनों और कार्यक्रमों की आवाज़ के बीच संतुलन बना रहे.

द एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी को इस बारे में 2007 में लगभग सौ शिकायतें मिलीं जबकि इससे पहले के दो वर्षों के दौरान भी उन्हें सैकड़ों शिकायतें मिल चुकी थीं.

कार्रवाई की व्यवस्था

रॉयल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ द डीफ़ (आरएनआईडी) में इस अभियान की प्रमुख एम्मा हैरिसन ने इस ओर आईटीवी की प्रमुख मिशेल ग्रेड का ध्यान आकर्षित किया.

इस पर आईटीवी की प्रमुख मिशेल ग्रेड का कहना है कि विज्ञापनों और कार्यक्रमों की आवाज़ में अंतर जानबूझकर पैदा नहीं किया जाता, लेकिन लोगों को ऐसा लगता है क्योंकि विज्ञापनों में प्रयोग होने वाली ध्वनि फ़ाइलें संकुचित होती है.

उन्होंने कहा, "विज्ञापनों और कार्यक्रमों की आवाज़ की गुणवत्ता का अंतर दरअसल होता नहीं है, केवल लोगों को महसूस होता है. लेकिन ब्रॉडकास्टिंग कंपनियाँ इस उद्योग के नियमों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."

एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी के मैट विल्सन कहते हैं, " यदि किसी चैनल ने इन नियमों को तोड़ा या भंग किया तो पहले तो उन्हें चेतावनी दी जाएगी लेकिन अगर फिर भी वे नहीं माने तो उन पर जुर्माना लगाया जाएगा. उनका लायसेंस भी रद्द किया जा सकता है."

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