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एक बहादुर लड़की की दर्द भरी दास्तान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बांग्लादेश टीवी की एक बाल कलाकार का जीवन किसी टीवी सीरियल की तरह ड्रामाई अंदाज़ से बदल गया है. तेरह वर्षीय शीमू ने लड़कियों की शिक्षा और बाल विवाह की बुराइयों को दिखाने वाले एक लोकप्रिय टीवी सीरियल में काम किया है. सीरियल में जिस तरह उनका चरित्र कई परेशानियों में उलझता रहा, उसी तरह उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी में भी कम दुख नहीं झेले. टीवी सीरियल में अभिनय के लिए उन्हें ज़्यादा पैसे नहीं मिलते थे और ग़रीबी के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी. उन पर बाल-विवाह का भी दबाव बना, जब उनके परिवार वालों ने उन्हें गाँव भेज दिया. ये बात अख़बारों की सुर्खियां बन गई. लेकिन स्थानीय समर्थकों और अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था की मदद से वे अब वापस स्कूल मे पहुँच गई हैं और साथ ही टीवी के लिए अभिनय भी कर रही हैं. उन्हें अपनी पढ़ाई और अभिनय के अपने करियर को बनाए रखने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा. किया. इस संघर्ष में उनकी यूनीसेफ़ और एक थियेटर ग्रुप ने काफ़ी सहायता की. फ़ुटपाथ के सितारे शीमू नुक्कड़ नाटक करने वाले ढाका के टोकाई नाट्य दल के उन 30 ग़रीब बच्चों में से एक हैं जो लगभग हर दोपहर ढाका के ग़रीब इलाक़ों में मिलते हैं. इनमें से कई बच्चे स्कूली पढ़ाई के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं और खाली समय में परिवार की आर्थिक मदद के लिए कुछ काम भी करते हैं. इन सभी बच्चों की एक ही तमन्ना है - टीवी कलाकार बनना. शीमू बांग्लादेशी टीवी पर लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रसारित होने वाले एक टीवी सीरियल की स्टार हैं. इसमें वह एक ऐसी लड़की का किरदार निभा रही हैं, जिसके माता-पिता उसका स्कूल छुड़वाना चाहते हैं. उसे शहर जाना पड़ता है और वहाँ कपड़ों के एक कारखाने में काम करना पड़ता है. इस सीरियल ने उन्हें एक लोकप्रिय कलाकार बना दिया, लेकिन उनकी निजी जिंदगी भी कई परेशानियों से भरी हुई थी. ग़रीबी ने उनकी पढ़ाई और करियर दोनों के ख़तरे में डाल दिया. वह कहती है, "मैं अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी. लेकिन मेरे दादा-दादी ग़रीबी के कारण मेरे स्कूल का खर्च नहीं उठा सकते थे.उन्होंने मुझे वापस गाँव भेज दिया, जिससे मुझे अपना थियेटर ग्रुप छोड़कर जाना पड़ा." उन्होंने बताया, "लेकिन इसके बाद यूनिसेफ़ और मेरा थियेटर ग्रुप सहायता के लिए आगे आए, उन लोगों ने मेरी और मेरे परिवार की आर्थिक मदद की, जिसके बाद मुझे ढाका में रहने की अनुमति मिल गई." बचपन की कहानी शीमू के पैदा होने से पहले ही उनके पिता का निधन हो गया था, जिसके बाद उनकी मां ने दूसरी शादी कर ली. जिसके बाद उनके दादा-दादी ने उनकी देखभाल की. उनकी दादी आयशा कहती हैं, "पैसे की कमी हमेशा से समस्या रही है. हम इसकी पढ़ाई के लिए संर्घष कर रहे हैं." उन्होंने बताया, "जिस समय हमने उसे घर भेजने का निर्णय लिया, उस समय हम जिस झोपड़पट्टी में रहते हैं, वहां से हमें हटाने का आदेश जारी हुआ था." उन्होंने कहा, "उस समय हमें लगा कि फ़ुटपाथ पर हम तो रह सकते हैं, लेकिन एक जवान लड़की का फुटपाथ पर रहना सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए हमारे पास उसे वापस गाँव भेजने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था." आजकल यूनीसेफ़ और टीवी सीरियल बनाने वाली कंपनी शीमू की पढ़ाई के लिए सहायता उपलब्ध करा रही है. अब वह अपने स्कूल के पास की एक झोपड़पट्टी में अपने दादा-दादी के साथ रहती है. वह कहती हैं, "मुझे यहाँ रहने में खुशी मिलती है, क्योंकि यहाँ सब लोग हैं और सब लोग मुझे जानते हैं." टीवी सीरियल में शीमू ने जो भूमिका निभाई है, वह बांग्लादेश की अधिकांश ग़रीब लड़कियों की हालत बयान करता है. | इससे जुड़ी ख़बरें ऐसा अख़बार जिसमें सभी 'बाल पत्रकार'09 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस हक़ के लिए बार बालाएँ कोलकाता पहुँचीं02 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस बाली उमर में कैटवाक पर रोक की सलाह11 जुलाई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस भारत में बाल विवाह एक बड़ी चुनौती08 जून, 2006 | भारत और पड़ोस 'आज भी भारत में लाखों बाल मज़दूर हैं'10 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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