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ऐसा अख़बार जिसमें सभी 'बाल पत्रकार' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मध्य प्रदेश में एक स्वयंसेवी संस्था ने 'बच्चों की पहल' नामक त्रिमासिक अख़बार शुरू किया है. ख़ास बात ये है कि इस अख़बार के सभी रिपोर्टर स्कूली बच्चे हैं. होशंगाबाद ज़िले की सोहागपुर तहसील में यूनीसेफ़ की पहल पर दलित संघ नामक स्थानीय स्वयंसेवी संस्था ने यह पहल की है. तीन कमरों वाले स्कूलों में जहाँ कक्षा एक से आठ तक की पढ़ाई होती है, वहाँ पढ़ने वाले इन बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है. वे अपना परिचय कुछ इस अंदाज़ में देते हैं. “मेरा नाम ज्योति है. मैं आठवीं में पढ़ती हूँ और दलित संघ की पत्रकार हूँ...या “ मैं शिवकुमार हूँ और मैं पत्रकार हूँ...” उत्साह इन परिचयों को किसी खेल या नाटक की रिहर्सल का हिस्सा समझने वाले आगंतुकों को वहाँ मौजूद शिक्षक और कभी खुद बच्चे बताते हैं कि वे वाकई पत्रकार हैं. हिंदी में छपने वाले चार पन्नों के ‘बच्चों की पहल’ न्यूज लेटर के दो अंक अब तक प्रकाशित हो चुके हैं और तीसरा ज़ल्द ही आने वाला है. यूनिसेफ़ की मध्य प्रदेश इकाई के प्रमुख हामिद अल बशीर कहते हैं कि यह प्रोजेक्ट समाज में बदलाव के लिए बच्चों की पहल है. संस्था के प्रवक्ता अनिल गुलाटी के अनुसार यूनिसेफ़ ने इस न्यूज़ लेटर के लिए दलित संघ को ख़ुद से इसीलिए जोड़ा क्योंकि संस्था एक ऐसे वर्ग के लिए काम कर रही है जो हमेशा सबसे पीछे की पंक्ति में खड़ा मिलता है. संपादक गोपाल नारायण आवटे का कहना है कि मौजूदा समाचार माध्यमों में आजकल गाँव से जुड़ी ख़बरें लगभग नगण्य हैं, ख़ासतौर पर दलितों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी ख़बरें जिन्हें समाज के सामने लाने में इस न्यूज लेटर से मदद मिलेगी. यह पूछे जाने पर कि संवाददाताओं के तौर पर बच्चों का ही चयन क्यों किया गया, आवटे कहते हैं कि पहले तो ग्रामीण दलितों के बीच से नियमित तौर पर ख़बरें भेजने के लिए पढ़े-लिखे लोगों की कमी थी और दूसरे वह भविष्य के लिए एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते हैं जो अपनी बात निडरता से सत्तासीन लोगों के सामने कह सके. नई दुनिया ‘बच्चों की पहल’ ने ग्रामीण बच्चों के लिए ख़बरें लिखने के तरीके, फ़ोटोग्राफी और कार्टूनों की एक नई दुनिया ही खोल दी है. नवलगाँव के चौकीदार के बेटे दयाशंकर जहाँ अख़बार के लिए संवाददाता और कार्टूनिस्ट दोनों की भूमिका निभा रहे हैं, वहीं मज़दूर के बेटे हरिओम अपने विचार कार्टून की आड़ी-तिरछी लकीरों के माध्यम से सामने रखने लगे हैं. होशंगाबाद के सोहागपुर तहसील के दूरदराज़ इलाकों में रह रहे ये किशोर संवाददाता अपनी रिपोर्टें, लेख और प्रकाशन के लिए दूसरी सामग्रियां दलित संघ कार्यकर्ताओं या डाक के माध्यम से सोहागपुर भेजते हैं. जहाँ ख़बरों के संकलन और संपादन के बाद उन्हें प्रकाशित किया जाता है. दलित संघ कार्यकर्ता सुनील कहते हैं कि न्यूज़ लेटर की ख़बरें कई मामलों में अपनी छाप भी छोड़ रही हैं. मसलन गुंदरई स्कूल में खेल मैदान न होने की ख़बर प्रकाशित होने के बाद मुख्यमंत्री ने जिल़ा कलेक्टर को इस बाबत निर्देश दिए. मगर जहाँ दलित सशक्तीकरण, बच्चों में सामयिक विषयों पर होनेवाली चर्चाएं, उनके बढ़ते शब्दकोष और अभिव्यक्ति में आया पैनापन खुशी का विषय है, वहीं शिक्षक तरवर सिंह पटेल चिंतित हैं कि कहीं बार-बार समस्याओं की बात उठाने से बच्चे शक्तिशाली लोगों को अपना दुश्मन न बना लें. लेकिन मास्टर साहब की चिंताओं से बेख़बर स्वभाव से शर्मीली मीना जहाँ नारी अधिकार पर अपनी कविता सुना रही हैं, वहीं पूजा रघुवंशी ‘भगवान ने पेट किस लिए दिया है, पायजामा बाँधने के लिए’ जैसे चुटकुले सुनाकर ठहाके लगवा रही है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'ट्विंकल ट्विंकल' पर लगी पाबंदी14 जून, 2006 | भारत और पड़ोस पत्नी की वजह से विवादों में फंसे शिवराज18 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस दो पहियों पर देखी सारी दुनिया22 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस मध्य प्रदेश में एक महिला 'सती' हुई22 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस गाँवों में एड्स फैलने पर चिंता30 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस जापानी साध्वी की भूमिगत समाधि26 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस मध्य प्रदेश की गायें, राजस्थान के साँड़09 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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