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शुक्रवार, 27 जुलाई, 2007 को 23:47 GMT तक के समाचार
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ख़बरों की उनकी परिभाषा

भारतीय टेलीविज़न चैनल
भारत में टेलीविज़न चैनलों की संख्या बढ़ती ही जा रही है
पिछले दिनों भारतीय मी़डिया को लेकर एक दिलचस्प चर्चा को देखने-सुनने का मौक़ा मिला.

रामनाथ गोयनका फ़ाउंडेशन की ओर से आयोजित इस बहस में टेलीवि़ज़न और अख़बार की बड़ी शख़्सियतों ने एक खुली बहस में हिस्सा लिया. इस खुली बातचीत की ख़ासियत यह थी कि इसमें सवाल पूछने वाले लोग वो थे जो अक्सर सवालों के जवाब देते रहे हैं. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी तक.

इस चर्चा में टेलीविज़न और अख़बारों की भूमिका, उनकी प्रतिद्वंद्विता और सहअस्तित्व के सवाल थे. कहना न होगा कि उनकी सामाजिक ज़िम्मेदारियों और व्यावसायिक प्रतियोगिता पर भी भरपूर सवाल उठाए गए.

सभी सवालों के जवाब तो इस चर्चा से भी नहीं मिले. वे शायद कभी मिल भी नहीं सकते. लेकिन अच्छा यह रहा कि सबने अपनी कमज़ोरियों और ख़ूबियों पर खुली चर्चा की. ताक़त का ज़िक्र किया तो बेचारगी बयान करने का मौक़ा भी आया.

इस चर्चा ने साफ़ कर दिया कि आने वाले दिनों और बरसों में भी ख़बरों के चैनलों के बीच टीआरपी की दौड़ ख़त्म नहीं होने वाली है. चूंकि टीआरपी का ताल्लुक़ चैनलों को मिलने वाले विज्ञापनों से है इसलिए यह आसान भी नहीं दिखता.

इसका मतलब यह है कि टीआरपी जुटाने के चक्कर में टेलीविज़न चैनल वह सब परोसते रहेंगे जिसे न ख़बर कहा जा सकता है और न प्रसारण योग्य माना जा सकता है.

इसका मतलब यह भी है कि टेलीविज़न चैनलों का ‘मनोहर कहानियाँ’ और ‘सत्यकथा’ अवतार दिखाई देता रहेगा. इसमें हत्या, बलात्कार से लेकर भूत-प्रेत और राशिफल तक सब कुछ दिखता रहेगा. गली-चौराहे के प्रेम-त्रिकोण ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ होते रहेंगे और सामाजिक ज़िम्मेदारी के नाम पर उद्दीपक और जुगुप्सा जगाने वाले दृश्यों को लूप में डालकर दिखाया जाता रहेगा. डेढ़ मिनट की ख़बर को एंकर डेढ़-दो घंटे खींचता रहेगा.

और सरकार असहाय सी देखती रहेगी. वह कर भी क्या सकती है. कुछ करे तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आँच आने का अंदेशा है. कई साल से माँग की जा रही है कि टेलीविज़न के लिए भी एक नियामक संस्था बना दी जाए लेकिन ऐसा हो नहीं सका है. अख़बारों के लिए ‘भारतीय प्रेस परिषद’ जैसी एक निरर्थक संस्था फिर भी है. लेकिन टेलीविज़न पर किसी की नज़र नहीं.

वैसे कहने को सूचना और प्रसारण मंत्रालय नज़र रखे हुए है. वह 'एफ़टीवी' और 'एएक्सएन' जैसे चैनलों को आपत्तिजनक सामग्रियों के प्रसारण का दोषी बताकर डेढ़-दो महीने के लिए बंद भी कर चुका है.

 इस उम्मीद पर जिया जा सकता है कि टेलीविज़न चैनलों पर भी एक दिन किसी की नज़र जाएगी और एक दिन उनसे कहा जाएगा कि वे ख़बरों की अपनी परिभाषा को ज़रा सुधार लें

लेकिन मंत्रालय को अभी अश्लील एमएमएस के बहाने दिखाए जा रहे दृश्यों को लेकर आपत्ति नहीं हो रही है. भूत-प्रेत की कहानियों को प्रामाणित करने की चैनलों की कोशिशों को अभी ऐतराज़ के लायक नहीं माना जा रहा है. न सूचना प्रसारण मंत्रालय पूछ रहा है और न विज्ञान-प्रौद्योगिकी मंत्रालय आपत्ति जता रहा है कि इक्कीसवीं सदी में इस तरह के अंधविश्वास को ख़बर बनाकर किस तरह दिखाया जा सकता है? नाग-नागिन और सँपेरों के खेल को दैवीय चमत्कार के रुप में किस आधार पर प्रतिस्थापित किया जा सकता है?

गनीमत है कि अंडरवियर के दो बेहद अश्लील विज्ञापनों पर सरकार की नज़र गई है. लेकिन वह भी तब जब टेलीविज़न चैनल उसे दिन में अनगिनत बार की दर से महीनों तक दिखा चुके थे. अख़बारों से लेकर इंटरनेट तक, इन विज्ञापनों को लेकर बहस हो चुकी थी. और विज्ञापन करने वाली कंपनियाँ लाखों-करोड़ों कमा चुकी थीं. इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि देर से ही सही सरकार जागी तो है.

और इस उम्मीद पर जिया जा सकता है कि टेलीविज़न चैनलों पर भी एक दिन किसी की नज़र जाएगी और एक दिन उनसे कहा जाएगा कि वे ख़बरों की अपनी परिभाषा को ज़रा सुधार लें.

और जब तक ऐसा नहीं हो जाता भारतीय टेलीविज़न चैनल ख़बरों की दुनिया में क्रांति का दंभ भरते रहेंगे. बकौल प्रभाष जोशी यह ऐसा ही है जैसे कोई सब्ज़ी बेचने वाला कहे कि वह सब्ज़ी बेचकर क्रांति कर रहा है.

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