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शुक्रवार, 22 जून, 2007 को 13:09 GMT तक के समाचार
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लड़ाई हम और तुम के बीच

सलमान रुश्दी का विरोध
सलमान रुश्दी को सम्मान का जगह-जगह विरोध हुआ
भारतीय मूल के ब्रितानी लेखक सलमान रुश्दी को सर का ख़िताब दिए जाने पर ईरान और पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन तो हुए ही भारतीय कश्मीर में भी बंद का आहवान किया गया.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के पाठकों ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं. कुछ पाठक तटस्थ थे तो कुछ ने इसे एक मुसलमान और एक हिंदू की नज़र से देखने का प्रयास किया.

'मुसलमानों' का कहना था कि सलमान रुश्दी किसी भी तरह के सम्मान के अधिकारी नहीं हैं क्योंकि उन्होंने इस्लाम और पैग़ंबर मुहम्मद का अपमान किया है और मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है.

इसके जवाब में 'हिंदुओं' ने उन्हें याद दिलाया कि चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन ने हिंदू देवियों के नग्न चित्र बना कर हिंदुओं की भावनाओं पर प्रहार किया है और वे भी सम्मान के नहीं भर्त्सना के पात्र हैं.

क्या अहम है?

सलमान रुश्दी को सम्मान उनके साहित्य के लिए दिया गया है या एमएफ़ हुसैन ने देवी-देवताओं के चित्रों के अलावा कुछ उल्लेखनीय काम भी किया है, यह मसला यहाँ पर गौण हो गया है.

 किसी भी मुद्दे पर परस्पर विरोधी बयान न केवल स्वाभाविक हैं बल्कि वे एक स्वस्थ बहस को जन्म भी देते हैं. लेकिन आपस में यह टकराव, किसी भी मामले को किसी धर्म-विशेष से जोड़ना और उसको मात्र इसलिए उचित ठहराना क्योंकि उसका ख़ुद से कोई संबंध नहीं है, समझ में नहीं आता.

आख़िर क्यों किसी का मज़हब या किसी का धर्म इतना कमज़ोर हो जाता है कि एक क़लम या एक कूची उसे अपमानित करने की ताक़त रखती है.

इस्लाम बनाम अन्य धर्मों की यह लड़ाई बार-बार सर उठाती है और आम आदमी न चाहते हुए भी उसमें उलझने पर मजबूर हो जाता है.

बाबरी मस्जिद गिरी तो मुझे भारी आघात पहुँचा. उतना ही आघात मेरे अनेक हिंदू दोस्तों को भी पहुँचा.

लगभग पाँच सौ साल पुरानी एक इमारत को नेस्तनाबूद करने का हक़ कैसे किसी को दिया जा सकता है.

भावी पीढ़ी की धरोहर

वह बाबरी मस्जिद हो या अफ़ग़ानिस्तान की बौद्ध प्रतिमाएँ, आने वाली पीढ़ियों की धरोहरें हैं और उन्हें मिटाना अमानत में ख़यानत करने के बराबर है.

बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई. बात हो रही थी सलमान रुश्दी के सम्मान की.

अपने पाठकों की प्रतिक्रियाओं ने मुझे एक सवाल सोचने पर मजबूर कर दिया.

किसी भी मुद्दे पर परस्पर विरोधी बयान न केवल स्वाभाविक हैं बल्कि वे एक स्वस्थ बहस को जन्म भी देते हैं.

लेकिन आपस में यह टकराव, किसी भी मामले को किसी धर्म-विशेष से जोड़ना और उसको मात्र इसलिए उचित ठहराना क्योंकि उसका ख़ुद से कोई संबंध नहीं है, समझ में नहीं आता.

किसी भी मामले को हम तटस्थ हो कर क्यों नहीं देखते? हम धर्म और भाषा और राष्ट्रीयता के दायरे से परे हट कर अपनी राय क्यों नहीं देते?

लेकिन यह सब कहने के बावजूद, हम अपने पाठकों की बेबाक राय की क़द्र करते हैं, उसे अपने पन्ने पर जगह देते हैं.

बस इंतज़ार है उस दिन का जब कोई हिंदू किसी मुसलमान को और कोई मुसलमान किसी हिंदू को सिर्फ़ इसलिए ग़लत नहीं ठहराएगा क्योंकि उसका मज़हब कुछ और है.

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