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तेरा, मेरा, उसका मानवाधिकार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नक्सलवाद से सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में पुलिस ने पीयूसीएल के एक पदाधिकारी को गिरफ़्तार कर लिया है. डॉ विनायक सेन पर आरोप है कि वे कथित रुप नक्सलियों की मदद कर रहे थे. उनकी गिरफ़्तारी के बाद मानों पूरे देश में खलबली सी मची हुई है. राज्य की राजधानी में हज़ारों लोगों ने इसके विरोध में रैली निकाली है. सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर से लेकर कई दिग्गज इसका विरोध कर चुके हैं. दिल्ली में पत्रकारवार्ता हो चुकी है और छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार की स्थिति पर चिंता जताते हुए न जाने कितने बयान जारी हो चुके. संसद चल रही होती तो शायद मामला वहाँ भी उठ चुका होता. कुल मिलाकर दिखता है कि देश के बौद्धिक और नागरिक समाज की अनुवाई करने वालों का एक बड़ा हिस्सा इन गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ खड़ा है. आश्चर्य होता है कि छत्तीसगढ़ राज्य के एक व्यक्ति की गिरफ़्तारी पर इतनी चिंता हो रही है. सरकारी आँकड़ा बताता है कि उसी छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर इलाक़े में पिछले दो साल में पाँच सौ से अधिक आदिवासियों की मौत हो चुकी है.या तो वे नक्सलियों के हाथों मारे गए हैं या फिर नक्सली होने के शक में पुलिस के हाथों मारे गए हैं. सरकार ही बताती है कि पचास हज़ार से ज़्यादा आदिवासियों को उनके गाँवों से उजाड़कर सड़कों के किनारे कैंपों में लाकर रखा गया है. वह भी ऐसे कैंपों में जहाँ नक्सली जब चाहते हैं, हमला कर देते हैं. हज़ारों लोग पड़ोस के राज्यों आँध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और उड़ीसा में पलायन कर गए हैं और कठिन जीवन गुज़ार रहे हैं. न कैंपों में रह रहे आदिवासियों की सुध लेने की किसी को मोहलत है और न पलायन कर गए आदिवासियों का हाल पूछने की फ़ुर्सत किसी को है. उसी छत्तीसगढ़ राज्य में कभी पुलिस वाले नक्सलियों के बारूदी सुरंग से उड़ा दिए जाते हैं तो कभी बिजली कर्मचारी. एकाधिक बार हो चुका है कि पुलिस के लिए बिछाई गई बारूदी सुरंग से निर्दोष आदिवासी मारे गए. लेकिन तब मानवाधिकार का सवाल खड़ा नहीं होता. तब नागरिक समाज और बौद्धिक समाज के नेताओं को सुध नहीं आती. याद नहीं आता कि निर्दोष आदिवासियों के मारे जाने का विरोध करने के लिए रायपुर में कुछ सौ लोगों ने भी इकट्ठे होकर कोई विरोध जताया हो. बस्तर के संतोषपुर में 12 लोगों की मौत की ख़बर मीडिया में आती है. सरकार को स्वीकार करना पड़ता है कि इनमें से कई लोगों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारा गया. लेकिन एक महीना बीत जाने के बाद उसी पीयूसीएल को बयान जारी करने की मोहलत नहीं मिल पाती जिसके नेता को पुलिस ने पकड़ लिया है और जिन्हें अब मानवाधिकार की याद आ रही है. हो सकता है कि कल कुछ पत्रकारों को गिरफ़्तार कर लिया जाएगा क्योंकि वे नक्सलियों की ख़बरें छापते हैं. ज़ाहिर तौर पर मीडिया इसे लेकर शोर मचाएगा. संपादकों के बड़े-बड़े बयान आएँगे और परिचर्चाएँ की जाएँगीं. लेकिन वही संपादक, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक आदिवासियों की हत्या और उनकी जीवन-परिस्थितियों को लेकर ख़ामोश बैठे हुए हैं.ज़्यादातर अख़बारों और टेलीविज़न चैनल के लिए वह कोई ख़बर ही नहीं है.
यह दरअसल नागरिक अधिकारों, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के प्रति हमारा बर्ताव दोहरा है. हमारे बौद्धिक समाज के पास इन अधिकारों को परखने के लिए दो अलग-अलग पैमाने हैं. नागरिक अधिकार, लोकतांत्रिक अधिकार और मानवाधिकार बड़ी अवधारणाएँ है. लेकिन पिछले बरसों में इन अधिकारों को जिस तरह से देखा और बरता गया है उसके चलते यह सब महिमामंडित शब्द होकर रह गए हैं. साफ़ शब्दों में कहें तो ये अपना वास्तविक अर्थ खो चुके हैं और अब अधिकार संपन्न लोगों के लिए हथियार की तरह हो गए हैं. अब साबुन के एक विज्ञापन में एक व्यक्ति को पूछते हुए दिखाया जाता है कि उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे? लेकिन मानवाधिकारों के लिए तो यह सवाल भी नहीं पूछा जाता कि उसके मानवाधिकारों से मेरा मानवाधिकार छोटा क्यों है? ऐसा इसलिए भी क्योंकि जिनको यह सवाल उठाना है वह एक निरीह समाज का हिस्सा हैं और उनके पास सवाल उठाने के अधिकार नहीं हैं. और जिनके पास सवाल उठाने के अधिकार नहीं हैं उनके सारे अधिकार अपने आप स्थगित हो जाते हैं. यह कहना ठीक नहीं होगा कि पीयूसीएल के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ सेन की गिरफ़्तारी का विरोध नहीं होना चाहिए, अगर वह ग़लत है तो इसका विरोध भी होना चाहिए. लेकिन उसी समय यह भी देखना चाहिए कि क्या आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार के लिए भी क्या कोई आवाज़ उठाई जा सकती है? और अगर उठाई जा सकती है तो सोचना चाहिए कि क्यों नहीं उठाई जा रही है. दोहरा पैमाना इन अधिकारों की बुनियाद में नहीं है और व्यवहार में भी नहीं होना चाहिए. | इससे जुड़ी ख़बरें कोसल में विचारों की कमी26 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस अभिव्यक्ति की एकतरफ़ा स्वतंत्रता22 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस सबसे तेज़, सबसे आगे या....सबसे पीछे12 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस प्रेस की ज़िम्मेदारी का भी सवाल03 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस डिज़ाइनर मेहंदी का रंग...27 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस एक यादगार शहर की यादें...27 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस मुँह खोलने की आदत ज़रूरी20 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस आख़िर यह किसकी दुनिया है?06 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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