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शनिवार, 26 मई, 2007 को 23:20 GMT तक के समाचार
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कोसल में विचारों की कमी

कोसल अधिक दिन टिक नहीं सकता
कोसल में विचारों की कमी है.

इतिहास के बहाने समकालीन सत्ता प्रतिष्ठान को चेतावनी देने वाली यह पंक्तियाँ कवि श्रीकांत वर्मा की हैं.

श्रीकांत वर्मा सत्ता प्रतिष्ठान को इस तरह चेता सकते थे क्योंकि वे ख़ुद सत्ता प्रतिष्ठान के अभिन्न अंग थे और असलियतों से वाकिफ़ थे. राज्यसभा के सदस्य और कांग्रेस के प्रवक्ता रहे श्रीकांत वर्मा जानते थे कि राजनीतिक दलों और सत्ता प्रतिष्ठान के पास विचारों की कितनी कमी है.

श्रीकांत वर्मा न सिर्फ़ इस कमी से अवगत थे बल्कि वे विचारों को वोट में तब्दील करने की कला से भी परिचित थे. कहा जाता है कि इंदिरा गाँधी को ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा उन्होंने ही दिया था. ग़रीबी न हटनी थी, न हटी लेकिन इस विचार के सहारे कांग्रेस सत्ता पर फिर से काबिज हो गई.

अब श्रीकांत वर्मा नहीं रहे लेकिन कांग्रेस है और सत्ता भी. सत्ता में टिके रहने के लिए विचारों की कमी के संकट से जूझना होगा यह सच भी बरकरार है. और इस सच को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बख़ूबी जानते हैं.

उन दिनों मनमोहन सिंह राजनीति में नए थे और प्रधानमंत्री नरसिंह राव के विश्वस्त वित्तमंत्री नियुक्त हुए थे. मनमोहन सिंह इस देश की अर्थव्यवस्था को एक नए मोड़ पर ले जा रहे थे. तब उन्होंने अपने बजट भाषण में कहा था कि इस अर्थव्यवस्था परिवर्तन का लक्ष्य ‘आख़िरी आदमी’ तक लाभ पहुँचाना है. तब उन्होंने ईमानदारी से स्वीकार किया था कि यह विचार उन्होंने महात्मा गाँधी से उधार लिए हैं.

पिछले डेढ़ दशक में आख़िरी आदमी तक क्या पहुँचा है और क्या नहीं पहुँचा इस पर बहस करना बेमानी है. प्रकारांतर से उन्ही मनमोहन सिंह ने, जो अब देश के प्रधानमंत्री हैं, मान लिया है कि आम आदमी अब भी हाशिए पर है.

इस बार चूंकि वे सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष पर हैं, विचारों की कमी का अहसास उन्हें ख़ुद नहीं हो पा रहा है. उनके एक विद्रोही क़िस्म के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने उन्हें याद दिलाया, “महामना, कोसल को ख़तरा है, क्योंकि कोसल में विचारों की कमी दिखाई पड़ रही है.”

पहले एशियाड के आयोजन के सहारे मणिशंकर अय्यर ने यह बात कही और जब बात सत्ता के गलियारों में गुम हो गई तो उन्होंने सीधे-सीधे कहा कि 'यह आम आदमी की सरकार नहीं है'.

तब अचानक मनमोहन सिंह जी के मन में आया कि आख़िरी आदमी या आम आदमी के विचार पर लौटना होगा. लिहाज़ा उन्होंने उद्योगपतियों और व्यावसायियों से कहा कि वे अपनी आमदनी में कटौती करें और आम आदमी की ओर ध्यान दें.

पता नहीं क्यों लग रहा है कि यह बात आम आदमी की चिंता में कम और उद्योगपतियों को किसी संभावित जनविद्रोह से बचाने की कोशिश में ज़्यादा कही गई है. बहरहाल, आम आदमी को न ‘ग़रीबी हटाओ’ के समय समझ में आया था न अब ‘वेतन कटौती’ के नारे से समझ में आ रहा है कि सत्ता पर टिके रहने को सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली की ओर से विचार उछाला जा रहा है.

ऐसा ही एक विचार पूर्ववर्ती एनडीए सरकार के मन में आया था ‘इंडिया शाइनिंग’ का. लेकिन आम आदमी को समझ में ही नहीं आया. भू-सुधार करके तीन दशक से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर क़ायम वामपंथी पार्टियों के मन में अब नया विचार आया है कि किसानों की ज़मीनें लेकर उद्योगों को दे दी जाएँ. वे न दें तो गोली मारकर ले ली जाएँ. और आम आदमी है कि अड़ा हुआ है.

वह लालकृष्ण आडवाणी थे या कि मणिशंकर अय्यर हैं. वह मनमोहन सिंह हैं या फिर बुद्धदेब भट्टाचार्य. अगर वे बोलते हैं तो बार-बार फिर श्रीकांत वर्मा ही कौंधते हैं,

मगध, मगध नहीं रहा
सभी हृष्टपुष्ट हैं
कोई नहीं रहा कृशकाय
किसी में दया नहीं
किसी में हया नहीं
कोई नहीं सोचता
जो सोचता है,
दोबारा नहीं सोचता.

तो, अगर किसी ‘आम’ कहे जाने वाले आदमी को लग रहा है कि सत्ता प्रतिष्ठान उनके हक़ में सोच रहा है तो वह भूल जाए. कहने को उसके बारे में विश्व व्यापार संगठन से लेकर जी-8 तक और विश्वबैंक से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष तक सभी चिंता कर रहे हैं. लेकिन कम्बख़्त विचारों का क्या करें जो अनुदान और दान से ऊपर जा ही नहीं पाते.

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