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शुक्रवार, 27 अप्रैल, 2007 को 09:40 GMT तक के समाचार
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एक यादगार शहर की यादें...

कहते हैं वतन वह नहीं है जहाँ आपका सबसे अधिक समय बीता है. वतन वह है जहाँ आपका जन्म हुआ हो.

और वाक़ई, अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा दिल्ली और उसके बाद लंदन में बिताने के बावजूद मेरी जन्मभूमि लखनऊ मेरे लिए अतुलनीय है.

अभी पिछले दिनों जब लखनऊ जाना हुआ तो अचानक ख़्याल आया कि अगर तीन साल और न आती तो चौदह वर्ष के वनवास की अवधि पूरी हो जाती.

ग्यारह बरस में बहुत कुछ बदल गया था. हज़रतगंज और हलवासिया मार्केट पहचान में नहीं आते थे और मेफ़ेयर सिनेमा की जगह कोई दफ्तर खड़ा हो चुका था.

एक पुराना, टूटा-फूटा कॉफ़ी हाउज़ अब भी उन दिनों की याद ताज़ा कर रहा था जब मैं बचपन में अपने पिता की उंगली पकड़ कर वहाँ आ कर बैठती और चोटी के साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों के बहस-मुबाहिसे को बड़े ग़ौर से सुनती.

लखनऊ की गलियाँ दिल्ली और लंदन की स्ट्रीट्स के मुक़ाबले आज भी कहीं अपनी लगीं. इन्हीं गलियों पर कुछ अरसा पहले अपनी एक नज़्म में मैंने कहा था,

'अजीब बात है जो और कहीं नहीं मिलती,
वह शहर ठोकरें खाने पे थाम लेता था'

और भी बहुत सी अजीब बातें हैं जो कम से कम मुझे तो और कहीं नहीं मिलेंगी.

न्यू हैदराबाद में मेरे दादा का मकान, दारुल सिराज, जहाँ मेरे चचा मजाज़ ने अपनी शायरी को परवान चढ़ाया और जहाँ मेरी फुफी के बेटे जावेद अख़्तर के 'पाँव पालने में ही नज़र' आने लगे.

कल का भैंसाकुंड और आज का गोखले मार्ग जहाँ मेरे नाना की निशानियाँ मौजूद हैं और सब से बढ़ कर निशातगंज का वह क़ब्रिस्तान जहाँ मेरे परिवार के सभी बुज़ुर्गों की क़ब्रें हैं.

तो लखनऊ मेरे लिए अनमोल तो होना ही है.

इस यात्रा के दौरान दफ़्तर का काम ख़त्म करके सोचा एक बार वह सभी इलाक़े देख कर आऊँ जहाँ बचपन के बाद कभी झांकने का ही मौक़ा नहीं मिला.

पुरानी यादों में साइकिल रिक्शा की सवारी भी शामिल थी. लिहाज़ा एक रिक्शा रोका और उससे गोखले मार्ग चलने को कहा.

यह बताते हुए बड़ी शर्म महसूस हो रही है कि हज़रतगंज पहुँचते-पहुँचते मई की चिलचिलाती धूप ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया और हिम्मत जवाब दे गई.

ख़ुद को यह कह कर दिलासा दिया कि अगर बीमार पड़ गई तो दफ़्तर का काम धरा रह जाएगा और रिक्शा वाले को वापस होटल की तरफ़ मुड़ने का इशारा कर दिया.

लेकिन फिर यह भी तो है कि वो सारी यादें मेरे ज़हन में तो गहराई से बसी ही हुई हैं, 'जब ज़रा गरदन झुकाई देख ली'.

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