|
कितनी अहम है मीडिया की भूमिका? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय मीडिया में आजकल मीडिया की भूमिका भी चर्चा का एक विषय है. वह चाहे प्रियदर्शिनी मट्टू की हत्या का मामला हो या स्टिंग ऑपरेशन के टेपों को बेचे जाने का, दोनों के ही सुर्ख़ियों में आने का कारण कहीं न कहीं मीडिया है. मीडिया की ताक़त का एक अनुभव तो मुझे भी हो चुका है जो मैं आपसे बाँटना चाहती हूँ. भारत में लाखों की संख्या में ऐसे मामले हैं जिनमें सुनवाई तो दूर मुक़दमे तक दर्ज नहीं हुए हैं. अपनी रेडियो श्रंखला 'इंसाफ़' की रिकॉर्डिंग के दौरान मुझे कई ऐसे लोगों से मिलने का मौक़ा मिला जिनके जूते अदालत के चक्कर लगा-लगा कर घिस चुके हैं. आज़मगढ़ का मृतक संघ 'इंसाफ़' श्रंखला की एक कड़ी था आज़मगढ़ में जीवित लोगों को मृतक मान लिए जाने का मामला. ठहरिए, समझाती हूँ. आज़मगढ़ के कई लोग ऐसे हैं जो रोज़ी-रोटी की तलाश में विदेश गए और उनके रिश्तेदारों ने तहसील के रिकॉर्डों में उन्हें मरा हुआ दिखा कर उनकी संपत्ति हथिया ली.
ये लोग जब लौट कर आए तो यह प्रमाण जुटाने में ही उनके कई वर्ष लग गए कि वे मरे नहीं ज़िंदा हैं. इस मामले की जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने एक मृतक संघ की स्थापना करली और अपने नाम के आगे मृतक लगाने लगे. इस संगठन के अध्यक्ष लालबिहारी मृतक की व्यथा सुन कर मैंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से संपर्क साधा और फिर यह ख़बर कुछ अख़बारों में छपी. बाद में यह जान कर अच्छा लगा कि उन प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर राज्य सरकार हरकत में आई और उसने यह मामला अपने हाथ में ले लिया. इसी तरह का एक मामला है राजस्थान के हबीब मियाँ का जिनकी हज की ख़्वाहिश के बारे में बीबीसी में पढ़ कर अनगिनत पाठक सामने आए और उनका यह अरमान पूरा करने का बीड़ा उठाया. यहाँ यह सब लिखने का उद्देश्य यह है कि मीडिया में वाक़ई ताक़त है. वह सोते हुओं को जगाने की क्षमता रखता है. मीडिया चाहे तो समाज के चौथे स्तंभ की ज़ि्म्मेदारी बख़ूबी निभा सकता है और चाहे परोक्ष रूप से ही हो, न्याय दिलाने की दिशा में अपना योगदान दे सकता है. बस और क्या लिखूँ. पत्रिका के बारे में आपके पत्र लगातार मिल ही रहे हैं. इसके पिछले स्वरूप मनोरंजन के कुछ चाहने वालों को शिकायत थी कि इसमें उनकी रुचि का बहुत कुछ नहीं है. इस अंक से उनकी शिकायत भी दूर करने का प्रयास किया है. अपनी प्रतिक्रियाएँ भेजिएगा ज़रूर. (ईमेल भेजने के लिए पता हैः hindi.letters@bbc.co.uk) | इससे जुड़ी ख़बरें कैनवास बड़ा करने की कोशिश07 सितंबर, 2006 | पत्रिका पत्रिका से बेहतर साथी और कौन..?14 सितंबर, 2006 | पत्रिका कितना सहज और सरल हो गया है संवाद21 सितंबर, 2006 | पत्रिका क्यूँ अलग होती है इंटरनेट पत्रिका..?28 सितंबर, 2006 | पत्रिका कुछ नया ला रही है बीबीसी पत्रिका...05 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका बीबीसी पत्रिका पर आपकी राय12 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||