BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शनिवार, 12 मई, 2007 को 12:50 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
सबसे तेज़, सबसे आगे या....सबसे पीछे

मायावती को बहुमत मिलने की बात मीडिया ने नहीं की
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को 'अप्रत्याशित' रूप से बहुमत मिलने के बाद मायावती ने मीडिया को अपने गिरेबान में झाँकने की सलाह दी और कहा कि उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए.

मीडिया को क्या करना चाहिए, और क्या नहीं, यह सुनने की आदत मीडिया को ज़रा कम ही है.ख़ास तौर पर अगर बात किसी राजनीतिक नेता ने कही हो.

चलिए मायावती के कहने पर नहीं लेकिन यूँ भी आत्ममंथन करते रहना चाहिए, उसमें कोई बुराई नहीं है.

उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे एक बार फिर इस बात के गवाह हैं कि भारत के सबसे बड़े राज्य का मन पढ़ने में मीडिया से ग़लती हुई है, किसी विशेषज्ञ, किसी सर्वेक्षण, किसी रिपोर्ट में इस बात के संकेत नहीं मिले कि बहुजन समाज पार्टी को स्पष्ट बहुमत हासिल हो सकता है.

ग़लती होने में कोई बुराई नहीं है, पहले भी हुई हैं ग़लतियाँ और आगे भी होंगी लेकिन गड़बड़ी इस बात में है कि अपनी ग़लती के कारणों को समझने की कोशिश न की जाए.

मीडिया को मानना-समझना होगा कि दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाक़ों तक उसकी पहुँच हमेशा से कम रही है जिसके जायज़ कारण हैं, लेकिन पिछले कुछ समय में गाँवों की तो छोड़िए, क़स्बे भी मीडिया के फ़ोकस से बाहर हो गए हैं.

यही वजह है कि एनडीए के 'इंडिया शाइनिंग'चुनाव प्रचार की चमक से अभिभूत मीडिया के एक वर्ग ने उसकी जीत की घोषणा कर दी थी, मगर मीडिया के फ़ोकस से बाहर बैठी जनता ने वाजपेयी सरकार को बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया.

ताक़त

हाशिए पर बैठी इस जनता में माल ख़रीदने की ताक़त भले न हो लेकिन सरकारों को हटाने और बनाने की ताक़त ज़रूर है, लोकतंत्र के चौथे पाये को अपनी व्यावसायिक मजबूरियों को बावजूद ऐसे रास्ते निकालने पड़ेंगे जिनकी मदद से उसे लोक का मन-मिज़ाज समझ में आ सके.

आम जनता का मन भाँप नहीं पाया मीडिया

देश के पैंतीस करोड़ मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं के अलावा बाक़ी के 65 करोड़ से अधिक लोग क्या सोचते हैं यह जाने बिना भी मीडिया सार्थक भूमिका निभा सकता है, यह एक बड़ा मुग़ालता है.

ऐसा नही है कि मीडिया कंपनियों को हर क़स्बे में रिपोर्टर और ओबी वैन रखने की ज़रूरत है ताकि वहाँ से ख़बरें आ सकें, मीडिया को शायद सिर्फ़ इतना करने की ज़रूरत है कि वह गाँवों-क़स्बों से संवाद तो स्थापित करे.

गाँव-क़स्बों से संवाद स्थापित करने का मतलब सिर्फ़ उनकी समस्याएँ दिखाने से नहीं लेकिन मीडिया को यह तो दिखाना होगा कि उसे उनकी मौजूदगी का एहसास है.

इस समय मीडिया और ग्राम्य भारत के बीच कोई सीधा संवाद नहीं है. सिवान,शाहजहाँपुर और सिहोर में बैठे लोगों को मुंबई और दिल्ली का परिचय नए कॉकटेल बारों से कराया जाता है जबकि उनके घर पानी-बिजली नहीं आती.

ऐसा नहीं है कि रातोंरात मीडिया अपनी प्राथमिकता बदल ले लेकिन कहीं से कोई शुरूआत तो करनी होगी.

जीवनशैली पर कार्यक्रम बनाने में कोई बुराई नहीं है लेकिन अनुपात के संतुलन को भूल जाने में बुराई है. जब तक चमकदार भारत के सामने अंधेरे भारत के लोग भुलाए जाते रहेंगे तब तक ऐसी ग़लतियाँ होती रहेंगी.

इससे जुड़ी ख़बरें
डिज़ाइनर मेहंदी का रंग...
27 अप्रैल, 2007 | पत्रिका
मुँह खोलने की आदत ज़रूरी
20 अप्रैल, 2007 | पत्रिका
आख़िर यह किसकी दुनिया है?
06 अप्रैल, 2007 | पत्रिका
अतिथियों का विदा हो जाना...
22 मार्च, 2007 | पत्रिका
नई पीढ़ी को सलाम
08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका
मातृभाषा बनाम सपनों की भाषा
01 दिसंबर, 2006 | पत्रिका
मेरी पहचान सीमित नहीं है
24 नवंबर, 2006 | पत्रिका
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>