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मेरी पहचान सीमित नहीं है | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर कोई मुझसे मेरा परिचय पूछे तो शायद मेरा जवाब होगा, मेरा नाम सलमा ज़ैदी है, मैं बीबीसी हिंदी सेवा में काम करती हूँ और लंदन में रहती हूँ. लेकिन मैं और भी बहुत कुछ हूँ. पत्रकार, भारतीय, मुसलमान, महिला, माँ, बेटी, पत्नी, बहन... और कुछ जोड़ना चाहूँ तो सहयोगी, मित्र इत्यादि. मेरी पहचान असीमित है. मेरी व्याख्या करने वाले जो विशेषण हैं उनमें से एक मुसलमान भी है. मुझे अपने मुसलमान होने पर गर्व नहीं है.
मुस्लिम परिवार में पैदा हुई इसलिए नाम सलमा है. हिंदू परिवार में जन्मी होती तो शायद सरला होती. मुसलमान होना मेरा अपना चयन नहीं था इसलिए गर्व किस बात का. लेकिन... मुसलमान होना मेरे लिए ग्लानि या शर्म से सिर झुकाने की भी वजह नहीं है. इस्लाम या जिहाद के नाम पर इस मज़हब को कलंकित करने वाले मेरे लिए इतने अहम नहीं हैं कि वे इस धर्म से मेरी आस्था डिगा दें. जब भारत के किसी अख़बार में पढ़ती हूँ कि इतने मुसलमानों ने हिंदुओं को मारा या इतने हिंदुओं ने मुसलमानों की जान ली तो मन को बराबर का ही आघात पहुँचता है. मुझे तो यह समझ आता है कि कुछ भारतीयों ने कुछ अन्य भारतीयों को मार डाला. किसी मरने वाले की माँ या बेटी यह नहीं कहेगी कि मेरा हिंदू बेटा या मुसलमान पिता मारा गया. बेटा बेटा है और पिता पिता. उसका धर्म या जाति गौण है. लेकिन फिर ऐसा क्यों हो जाता है कि धर्म या जाति ही सबसे अहम हो जाती है और इंसान गौण? यहाँ ब्रिटेन में बार-बार आवाज़ उठती है कि मध्यमार्गी मुसलमान इस्लामी चरमपंथियों की भर्त्सना करें. मेरी नज़र में हर तरह का चरमपंथ भर्त्सना का पात्र है चाहे वह इराक़ में हो, श्रीलंका में या फिर उत्तरी आयरलैंड में. |
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