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लंदन में बिखरता हिंदी-उर्दू तर्जुमे का रंग | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तर्जुमा या अनुवाद एक ऐसा माध्यम रहा है जिसके जरिए किसी लेखक की रचना अपनी भाषिक सीमाओं से मुक्त हो जाता है और पहुँचता है उन पाठकों तक भी जो रचना की मूल भाषा में उसे नहीं पढ़-समझ सकते. मार्क्स की किताबों ने यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी क्रांतियाँ लाईं क्योंकि वह अनूदित होकर उन तक पहुँची. जाहिर है ऐसा केवल साहित्यिक कृतियों के साथ ही नहीं हुआ. लेकिन पाठकों के बीच चूँकि साहित्यिक कृतियों को अपनी भाषा में पढ़ पाने की बेचैनी ज्यादा होती है इसलिए अनुवाद अपनी विशेषताओं और सीमाओं के बावजूद एक लोकप्रिय और कारगर तरीका रहा है एक रचनाकार और रचना का एक विस्तृत पाठक संसार में पहुँचने का. प्रसिद्ध कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा लंदन में रहते हैं. कहानियाँ हिंदी में लिखते हैं. उनकी कहानियाँ प्राय: उन प्रवासियों की संवेदनाओं के ताने-बाने में बुना गया होता है जो भारत या पाकिस्तान की अपनी मातृभूमि को छोड़ ब्रिटेन या खाड़ी देशों में जाकर बस गए हैं या वहाँ अपनी एक जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे है. हिंदी में लिखी गयी तेजेन्द्र की कहानियाँ अब उर्दू में अनूदित होकर 'ईंटों का जंगल' नाम के कहानी संग्रह के रूप में पाठकों के बीच आ गई हैं. दायरा व्यापक होगा अब ये उन पाकिस्तानी प्रवासियों तक भी पहुँच पाएँगी जो हिंदी समझ और बोल तो सकते हैं लेकिन लिख-पढ़ नहीं सकते. अब यहाँ उर्दू की कहानियों का भी हिंदी में अनूदित किए जाने के प्रयास हो रहे हैं. तेजेन्द्र की किताबों की सीडी बनाए जाने की भी योजना है. किताब के विमोचन के अवसर पर स्कूल ऑफ़ ओरियेन्टल एण्ड अफ़्रीकन स्ट्डीज़ की प्रोफ़ेसर फ़्रेंचेस्का ऑर्सीनी भी मौजूद थीं. उनका कहना था, "कई दुनियाओं के बीच जीने वाले और लम्बी यात्रा करने वाले लोग इन कहानियों में अपने आप को पहचान लेंगे.
बल्कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में बैठे हुए लोग, जिनके लिये लंदन ख्याली दुनिया का हिस्सा बन तो गया है मगर कहीं बढ़ा-चढ़ा कर. वे पाएँगे कि वहाँ की परेशानियाँ यहाँ आकर भी शायद पीछा नहीं छोड़तीं." उन्होंने आगे कहा- "इन कहानियों की दूसरी विशेषता ये है कि इनके अधिकतर किरदार इतिहास और अर्थशास्त्र के बलवान झोंके से हिन्दुस्तान से गल्फ़ या इंगलैण्ड तो पहुंच गये हैं लेकिन उनकी दुनिया जैसे सिकुड़ गई है." कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे भारतीय उच्चायोग के मंत्री समन्वय श्री रजत बागची का कहना था कि इस तरह के और प्रयास भी होते रहने चाहिए. उनका कहना था कि भारतीय उप-महाद्वीप की भाषाओं के साहित्य का आपस में अनुवाद होना बहुत आवश्यक है. कार्यक्रम की शुरूआत में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी ने सभी मेहमानों का स्वागत करते हुए कहा, "अदब इन्सानों के दिलों की दूरी को पाट सकता है." भारतीय उच्चायोग में हिंदी और संस्कृति अधिकारी राकेश दुबे ने कहा, "तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां यदि सीडी पर सुनी जाएं तो हिन्दी वाले उन्हें हिंदी की कहानी कहेंगे और उर्दू वाले उर्दू की. दिलों की भाषा हिंगलिश नहीं हो सकती, हिंदी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती कुछ भी हो सकती है". | इससे जुड़ी ख़बरें 'ट्रेन टू पाकिस्तान' ने तय की आधी सदी 22 अगस्त, 2006 | पत्रिका एक छोटे सुराख़ से दिखती बड़ी दुनिया08 फ़रवरी, 2006 | पत्रिका ब्रिटेन में हिंदी के लिए संघर्ष की दास्तां11 अगस्त, 2006 | पत्रिका एक इतिहास आम भारतीयों के लिए15 नवंबर, 2006 | पत्रिका शायरी का अनुवाद कितना जायज़?31 जुलाई, 2006 | पत्रिका जेल में कटे वो दिन01 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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