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सोमवार, 31 जुलाई, 2006 को 12:52 GMT तक के समाचार
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शायरी का अनुवाद कितना जायज़?

फ़ैज़ के रोशनियों के शहर का अनुवाद
शायरी या कविता क्या है? यह प्रश्न आज भी उतना ही रहस्यमय है जितना हज़ारों साल पहले था. अतीत में शायरी को कई बार परिभाषित करने की कोशिश की गई और आलोचकों ने शायरी की सीमा अपने अपने अंदाज़ में स्थापित करने की कोशिशें कीं.

इन परिभाषाओं में से एक यह भी है कि शायरी साहित्य की वह शैली है जिसका अनुवाद न हो.
अन्य भाषा तो दूर की बात ख़ुद उसी भाषा में अगर शेर के शब्द आगे-पीछे कर दिए जाएँ तो सारी सुंदरता नष्ट हो जाती है.

लेकिन उसके बावजूद हर भाषा में कविता का अनुवाद होता रहा है और आजकल भी हो रहा है.

शायरी का अनुवाद न होने का विचार जितना पुराना है उतना ही पुराना इस विचारधारा के विरोध का इतिहास भी है. लाहौर के साहित्यिक क्षेत्रों में यह पुरानी बहस एक करवट लेकर उठ खड़ी हुई है.

संकलन

उसकी वजह यह है कि वॉशिंगटन में अंग्रेज़ी भाषा के जाने-माने लेखक ख़ालिद हसन ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी के संग्रह को अंग्रेज़ी में संकलित किया है, कुछ अनुवाद उन्होंने ख़ुद किए हैं कुछ दाऊद कमाल के हैं.

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने इसे प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है 'ओ सिटी ऑफ़ लाइट्स'. ज़ाहिर है कि यह फ़ैज़ की मशहूर नज़्म 'ऐ रोशनियों के शहर' से लिया गया है. नमूने के तौर पर अनुवाद कि कुछ पंक्तियाँ देखें.

ऐ रोशनियों के शहर
सब्ज़ा, सब्ज़ा सूख रही है फीकी, ज़र्द दोपहर
दीवारों को चाट रहा है तनहाई का ज़हर
दूर उफ़ुक़ तक घटती, बढ़ती, उठती, गिरती रहती है
कुहर की सूरत बे रौनक़ दर्दों की गदली लहर
बसता है इस कुहर के पीछे रोशनियों का शहर
ऐ रोशनियों के शहर!

O City of Lights
The vapid yellow afternoon rubs itself on the green grass;
The venom of loneliness eats through the walls;
And far in the distance, where the sky meets the earth,
Pain like a desolate wave,
Or a fog that will not lift,
Waxes and wanes, rises and falls.
Behind this fog lies the city of lights,
O city of lights!

लाहौर के अलहमरा हॉल में क़िताब के विमोचन समारोह के दौरान मशहूर लेखक आईए रहमान ने कहा कि शेर और साहित्य किसी और भाषा के सांचे में ढल कर अपनी असली आत्मा गंवा बैठते हैं.

लेकिन ख़ालिद हसन के अंग्रेज़ी अनुवादों में यह कमाल है कि वह असल रूह को ख़त्म नहीं होने देते और पश्चिमी देश के पाठकों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को सामने रखते हुए उसे उनकी समझ से परे जाने नहीं देते.

ख़ुद ख़ालिद हसन का कहना था कि अनुवाद फ़ैज़ का हो या मंटो का यह एक बड़ी परीक्षा की घड़ी होती है क्योंकि एक भाषा का वैसा ही पर्याय दूसरी भाषा में मौजूद नहीं होता है और अगर काट-छांट की गुंजाइश निकाल ली जाए तो अनुवाद मूल पाठ से कोसों दूर निकल जाए.

यानी कविता का अनुवादक हमेशा एक ऐसी तनी हुई रस्सी पर चलता है जिसके एक ओर बेमज़ा शाब्दिक अनुवाद की खाई होती है.

दूसरी ओर सुंदर बयान की वह ख़ूबसूरत बला मुँह खोले बैठी है जो सारे पाठ को एक ही निवाले में हड़प कर जाने के लिए बेचैन है.... लेकिन यही पाठ जब भाप बन कर उसके नथुनों से निकलेगा तो उसकी बदली हुई सूरत में उसे भी कोई न पहचान सकेगा.

संतुलन

अनुवादक को शाब्दिक अनुवाद और मूल पाठ की पूरी काया पलट की दो सीमाओं में एक संतुलन तलाश करना होता है.

ख़ालिद हसन ने किया है अनुवाद

ताहिर मज़हर अली ख़ान ने इस मौक़े पर पंजाबी भाषा में संबोधित किया और उन लोगों की अच्छी तरह ख़बर ली जो फ़ैज़ को महज़ फ़ैशनी समाजवादी या ‘बैठक का बातूनी’ बताते हैं.

क़िताब के विमोचन में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की सुपुत्री सलीमा हाशमी मुख्य अतिथि थीं. उन्होंने अपने बचपन और नौजवानी के कुछ क़िस्से सुनाए जिनसे फ़ैज़ साहब के व्यक्तित्व पर नए आयाम से रोशनी पड़ती है.

समारोह के अंत में फ़ैज़ घराने की तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले अदील हाशमी स्टेज पर आए और अपने नाना जान के बारे में अपने विचार रखे.

क़िताब की प्रकाशक अमीना सैयद भी उस समारोह में मौजूद थीं और उन्होंने अपनी संस्था की ओर से प्रकाशित होने वाली दूसरी किताबों के बारे में भी बताया.

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित होने वाली 290 पृष्ठ की इस क़िताब में दाऊद कमाल और ख़ालिद हसन के फ़ैज़ की 90 कविताओं के अनुवादों के अलावा फ़ैज़ के कुछ गद्य और फ़ैज़ के बारे में साहित्यकारों के विचारों का अनुवाद भी मौजूद है.

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