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रविवार, 04 दिसंबर, 2005 को 21:41 GMT तक के समाचार
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'मजाज़ रूमानी और प्रगतिशील दोनों थे'
मजाज़
मजाज़ एक संवेदनशील और रूमानी शायर के तौर पर जाने जाते हैं.
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, गोपीचंद नारंग भारत के मशहूर उर्दू शायर असरारुल हक़ मजाज़ के बारे में बताते हैं कि वह एक रूमानी शायर तो थे ही, प्रगतिशील भी थे. प्रगतिशीलता और रूमानियत की यह खेमेबंदी तो बाद के दौर की देन है.

मजाज़ को शामिल किए बग़ैर पिछले 60 सालों का उर्दू शायरी का कोई भी संचयन पूरा नहीं हो सकता.

नारंग बताते हैं कि उर्दू साहित्य में योगदान के लिए 20वीं सदी में जिन दो शायरों को सबसे ज़्यादा शोहरत मिली उनमें भारत से मजाज़ हैं और पाकिस्तान से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ हैं.

मजाज़ की 50वीं पुण्यतिथि पर उनके योगदान और प्रासंगिकता जैसे तमाम पहलुओं पर पाणिनी आनंद ने गोपीचंद नारंग से ख़ास बातचीत की.

पढ़िए, बातचीत के ख़ास अंश-

मजाज़ साहब का उर्दू साहित्य को जो योगदान है, उसे आप किस रूप में देखते हैं.

मज़ाज प्रगतिशील साहित्य के इतिहास में एक रौशन सितारे की तरह उभरते हैं. चौथे से छठे दशक तक जिन तीन शायरों का नाम उनके ख़ास योगदान के लिए याद किया जा सकता है वे मजाज़, जज़्बी और मख़दूम हैं लेकिन जो शोहरत मजाज़ तो हासिल हुई, वह फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के अलावा किसी और शायर को हासिल नहीं हुई है.

जब मजाज़ शायरी की दुनिया में दाखिल हुए, उन दिनों भारत में जोश मलीहाबादी का बड़ा डंका बज रहा था, बड़ा तनतना था और पाकिस्तान में फ़ैज़ को लोग काफ़ी पसंद कर रहे थे. उन दिनों मजाज़ युवाओं के चहेते शायर थे और आलम यह था कि उन दिनों मजाज़ की शायरी को छात्रावासों में रहनेवाली लड़कियाँ अपने तकियों के नीचे रखती थीं.

मैं भी उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था. मैंने इतनी प्रसिद्धि किसी और शायर को मिलती नहीं देखी.

मजाज़ का कविता संग्रह, 'आहंग' हाथों हाथ बिकता था. जैसे साहिर लुधियानवी की तल्ख़ियां बिका करती थीं.

कैफ़ी आज़मी, अली सरदार जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी और जांनिसार अख़्तर भी कहीं पीछे थे.

पर बहुत जल्दी ही मजाज़ एक शोले की तरह भड़के और भड़ककर ख़त्म हो गए.

आज नई सदी के बदलते दौर में मजाज़ कितने प्रासंगिक हैं.

समय का पहिया बहुत-सी चीज़ों को धोकर रख देता है. आज शायरी के तकाज़े और मिजाज़ बदल गए हैं पर आज भी मजाज़ की शायरी प्रासंगिक है. उर्दू शायरी के सख़्त से सख़्त दस्तावेज़ में भी मजाज़ के 'आवारा' और 'रेल' को जगह मिलेगी.

मजाज़ के ज़िक्र के बग़ैर पिछले 60 सालों की उर्दू शायरी और ख़ासकर प्रगतिशील लेखन के संचयन को पूरा नहीं कहा जा सकता है.

एक सवाल बार-बार उठता है कि मजाज़ को एक प्रगतिशील शायर के तौर पर देखा जाए या फिर एक रूमानी शायर के तौर पर. मजाज़ के काम के बारे में इस बहस को आप किस तरह से देखते हैं.

असल में यह ख़ानाबंदी प्रगतिशील कवियों में बहुत बाद में हुई है. ख़ुद फ़ैज़ के यहाँ इसके दोनों रूप देखने को मिलते हैं.

गोपीचंद नारंग
नारंग मानते हैं कि भारत में 20वीं सदी में सबसे ज़्यादा शोहरत पानेवाले शायर थे मजाज़

मजाज़ भी एक तरफ़ कहते हैं कि 'तू अपने आंचल से परचम बना लेती तो अच्छा था...' पर यह ध्यान रखना चाहिए कि मजाज़ युवाओं के शायर हैं. ऐसे में उनके काम में एक रूमानियत, मोहब्बत तो होगी ही.

इस तरह की खेमेबंदी कि जो इंकलाबी कवि हैं, वो अपनी मोहब्बत का इज़हार नहीं कर सकते, सियासी वजहों के चलते की गई.

अली सरदार जाफ़री ने मजाज़ जैसे रूमानी शायरों के लिए एक शब्द, 'रिवोल्यूशनरी रोमंटिसिज़म' इस्तेमाल किया है.

अगर 'रिवोल्यूशनरी रोमंटिसिज़म' नाम का कोई रुझान हो सकता है तो पाकिस्तान में फ़ैज़ के बाद भारत में अगर किसी का नाम लिया जा सकता है तो वह नाम मजाज़ का है.

मजाज़ की 'रेल' जिन पटरियों से होकर गुज़री या इसे इस तरह कहें कि उस दौर में मजाज़ सरीखे शायरों ने उर्दू शायरी को जो दिशा दी, आज की उर्दू शायरी उस रास्ते पर कहाँ तक पहुंची है या फिर किसी दूसरे रास्ते पर बढ़ रही है आज की शायरी.

नहीं, उर्दू शायरी अपने रास्ते से अलग नहीं हुई पर ज़माना बदल गया, ज़माने के तकाज़े बदल गए. उस प्रगतिशील दौर में डॉ आबिद हुसैन, रवींद्रनाथ टैगोर, मौलाना अब्दुल्लाह जैसे लोग उस दौर में हुए और तब एक तरह का खुलापन था जो बाद में राजनीतिकरण का शिकार होने लगता है.

राजनीतिक घोषणापत्रों के मार्फ़त एक दबाव बनता है औऱ हुक्मनामे जारी होते हैं पर शायरी तो हुक्मनामों पर नहीं होती. आधुनिककाल के आने तक आज़ाद रचनात्मकता के लिए जगह कम हो चुकी थी.

प्रगतिशील रचनाओं के सामाजिक न्याय वाले रुझान की गुंजाइश को आधुनिककाल ने ख़त्म कर दिया और इसी वजह से वह भी ख़त्म हो गया.

अब मुझे लग रहा है कि उर्दू शायरी में एक नई होशमंदी पनप रही है और वह यह है कि सच्ची शायरी और सच्चा अदब समाज के प्रति ज़िम्मेदार होता है. उसकी आवाज़ और चेतना होता है.

मुझे लगता है कि इस तरह की चेतना के साथ सामाजिक जागरण की रेल को पटरियों पर फिर से दौड़ना चाहिए.

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