| 'मंटो पैदाइशी अफ़साना निगार थे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरी नज़र में मंटो एक मास्टर स्टोरीटेलर है. वे विश्वस्तर का कहानीकार हैं. जिसे हम पैदाइशी अफ़साना-निगार भी कह सकते हैं. अदबी दुनिया में मंटो अनुवादों के साथ दाखिल हुए थे. उन्होंने रूसी और फ्रेंच कहानीकारों की कहानियों के अनुवाद से शुरूआत की थी. और वहीं से उनकी नज़र समाज में फैली विकृतियों पर पड़ी. उन्होंने मध्यम वर्ग में औरत और मर्द से रिश्तों पर से नकाब उठाया.और वह सब लिखा जो उस ज़माने में न तो देखा जा सकता था और न ही लिखा जा सकता था. और उनकी आवाज़ एक शॉकवेब की तरह फैल गई. मंटो पर यह इल्ज़ाम भी लगाया गया कि वह वेश्याओं के लेखक हैं और उन्होंने मर्द-औरत के रिश्तों को अश्लीलता के साथ बयान किया. ये तमाम आरोप इसलिए बेबुनियाद हैं क्योंकि मंटो का चरित्र ऐसा था ही नहीं. उन्होंने औरत को उस निगाह से देखा ही नहीं. वह तो जागीरदराना व्यवस्था में औरत-मर्द के रिश्तों को बेनकाब करना चाहते थे. दरअसल, मंटो हर औरत में मुहब्बत तलाश रहे थे क्योंकि उनकी माँ की मौत के वक़्त मंटो की उम्र बहुत कम थी. और वालिद साहिब फौरन दूसरी शादी कर ली थी यानी मंटो माँ की ममता से महरूम हो गए. और उसी खोई ममता को वह ज़िंदगी भर तलाशते रहे. उनकी कहानियाँ 'बाबू गोपीनाथ', 'हतक' और 'काली शलवार' पर अश्लीलता का आरोप हैं, लेकिन इन कहानियों में कहीं अश्लीलता नहीं है. मंटो की कहानियों के महिला पात्र हर जगह अपने आत्म सम्मान की लड़ाई लड़ते देखे जा सकते हैं. वह वेश्या में भी महिला-शक्ति की एक जननी को तलाश रहे थे. उनकी कहानियों में वेश्या के रूप में औरत की रूह, उसकी आत्मा और उसकी तकलीफ़ और कराह है. मंटो सेक्स-राइटर कतई नहीं था, वह तो इंसानियत का फनकार था. इंसानियत, मुहब्बत, दर्द और करूणा से भरा अफसाना निगार. असल में शुरूआत में मंटो को अहमद नदीम काज़मी जैसा एक ज़ौहरी मिल गया, जिसने बिना किसी की परवाह किए अपनी पत्रिका “अदब” और “नुकूश” में मंटो की कहानियाँ प्रकाशित कीं. नतीजे में उनके रिसालों की रजिस्ट्रेशन रद्द हुई, उन रिसालों की ज़मानतें जब्त हुईं और रिसाले बंद हो गए. वह जंग का दौर था और सख्त सेंसरशिप क़ानून लागू थे. जिनसे अदीबो का बचना आसान नहीं था. उन मुकदमों के दौरान मंटों का साथ किसी ने नहीं दिया. कराची में जब मुकदमे चल रहे थे तब मंटो के पास चाय पीने के लिए भी पैसे नहीं थे. लेकिन उनका कोई दोस्त गवाही देने तक नहीं आया. बाबा-ए-उर्दू मौलवी अब्दुल हक और हसन अस्करी तक गवाही देने नहीं आए. मंटो ने अपनी लड़ाई अकेले लड़ी और अपने उसूलों से कोई समझौता नहीं किया. यह भी सच है कि मंटो को कभी कोई सज़ा नहीं दी गई. बस अदालती आदेशों से पत्रिकाएँ बंद होती रही, उनकी कहानियों के प्रकाशन पर पाबंदी लगाई गई. इसके बावजूद हसन अस्करी और मुहम्मद तुफैल जैसे दोस्त उनकी कहानियाँ छापते रहे. (सूफ़िया शानी से बातचीत पर आधारित) |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||