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शुक्रवार, 17 नवंबर, 2006 को 01:29 GMT तक के समाचार
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कृष्णा सोबती से एक बातचीत
कृष्णा सोबती
कृष्णा सोबती महज एक नाम नहीं एक पहचान है. जिन्होंने अपने अनेकों उपन्यासों, कहानियों और सोच के माध्यम से हिंदी कथा साहित्य को पिछले 50 वर्षों में नए आयाम दिए हैं.

वे मानती हैं कि धर्मग्रंथ और साहित्यिक रचनाओं में अंतर होता है और दोनों को एक करके नहीं देखना चाहिए. उनका कहना है कि साहित्य और कला के अपने-अपने अनुशासन होते हैं और उनके लिए श्लील-अश्लील के सवाल नहीं उठाने चाहिए.

कृष्णा सोबती से रत्ना कौशिक ने बातचीत की. प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश -

1950 के दशक में आपके नाम ने जो पहचान बनाई वह आज तक बनी हुई है. इस सतत् सृजनशीलता का क्या रहस्य है?

किसी भी लेखक के रचनात्मक व्यक्ति को सघन और सजग रखने वाला, उनकी लेखकीय आत्मनिष्ठा को परिभाषित और प्रतिबिंबित करने वाला समय, समाज और देशकाल से उभरा पाठक वर्ग होता है. इसी की सकारात्मक और कलात्मक ऊर्जा लेखक के आंतरिक विवेक को बनाए रखती है. मैं अपने प्रबुद्ध आलोचकों, संपादकों और पाठकों के प्रति कृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे मेरी लेखकीय गंभीरता की सततशीलता को सतत् रहने को आश्वस्त किया. मेरी बौद्धिक और मानसिक उष्मा को अनुशासित किया. जिस पहचान की बात आप कर रही हैं, वह लेखक के रख-रखाव में नहीं, वक्त के साथ बदलने और ‘थ्रो’ करने से जुड़ी है.

आपकी रचनाओं में विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक दंगों की गहरी पीड़ा है. क्या कुछ व्यक्तिगत सरोकार और घटनाएं भी इस दर्द से जुड़ी हैं?

सिर्फ मैं ही नहीं स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन के ऐन बीचों-बीच से होकर निकली पीढ़ियाँ भी जो आज तक दशकों-दशकों लम्बा सफर तय कर चुकी हैं. वह न उस त्रासदी को भूली हैं और न ही विभाजन से जुड़े देश के स्वाधीनता पर्व को. विभाजन को भूलना भी मुश्किल और उसे याद करते चले जाना भी खतरनाक. लाखों-लाखों लोग जड़ों से कट गए. कुनबों के पुराने छांहदार पेड़ उखड़ कर ठंडे हो गए. इतिहास और भूगोल बदल गए. ऐसे में अपने को जीवित पाकर हर विस्थापित की इस त्रासदी से उबर कर खड़े हो जाने की कोशिश कम महत्वपूर्ण नहीं थी. व्यक्तिगत आतंक, पीड़ा, ज़ख्म सब हक़ीक़त को चुनौती दे रहे थे. अपने-अपने ढंग से दोनों ओर से समय का आख्यान प्रस्तुत किया गया.
मैंने 1948-49 में कहानी लिखी-‘सिक्का बदल गया’. हाल ही में उस कहानी को पढ़ा तो मुझे अचरज हुआ. उन दिनों के गहरे तनावों में मैं इतने ठंडेपन से यह कहानी कैसे लिख सकी? क्या यह अवसाद से उभरने की तैयारी थी? दुख-शोक बहुत हो चुका अब जीवित रहने की शर्त संघर्ष है. पर कोई नागरिक व्यक्तिगत घावों से बरी नहीं था.

 अगर आप ‘यारों के यार’ की बात कर रही हैं, जहाँ कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ है, जिन्हें कुछ लोग बोल्ड और कुछ लोग अश्लील कहते हैं. वह कहानी दफ्तर के रोजमर्रा के कार्य-कलापों और काम करने वालों के वाचन के इर्द-गिर्द घूमती है. फाइलों की एकरसता से उबरने के लिए कुछ मर्दानी गालियाँ कमजोरों के आक्रोश को ही प्रकट करती हैं. वह शायद समाज में इसीलिए ईज़ाद भी की गई होंगी

व्यक्तिगत जीवन के अकेलेपन और उतार-चढ़ाव ने आपकी रचनाओं को कितना प्रभावित किया है? अगर नहीं तो क्या व्यक्तिगत जीवन से हट कर, रचना में डूबा जा सकता है?

किसी भी व्यक्ति की अपनी नितांत निज की ‘स्पेस’ को अगर आप अकेलेपन से जोड़ेंगी तो रचना और रचनाकार का बहुत कुछ गड़बड़ा जाएगा. इतना तो हम सभी जानते हैं कि रचनाएँ अकेले में ही लिखी जाती हैं लेकिन रचना जब लिखी नहीं जा रही होती तो वह एक बड़ी दुनिया से जुड़ी होती है. जिसे लेखक एक साथ अपने आंतरिक और बाह्य में जी रहा होता है. इस प्रक्रिया को मेज तक आते-आते काफी देर से अपना अंतिम स्वरूप मिलता है. आपका लेखक संबंधों, समाज और समय से दूर सिर्फ अपने से ‘एकालाप’ करता रहे तो वह बात दूसरी है. अकेलापन ‘भरेपूरे’ का ही विपरीत नहीं-अकेलापन व्यक्ति के आंतरिक वैभव का भी प्रतीक है.

आपकी रचनाओं की भाषा काफी बोल्ड है इसलिए चर्चा का विषय रही है. आपके महिला पात्र भी दबा कर गाली-गलौच करते हैं. क्या यह पात्रों के व्यक्तित्व की जरूरत है या फिर कोई दूसरा ‘अंडर करंट’ इसके पीछे क्या है?

भाषिक रचनात्मकता तो हम मात्र ‘बोल्ड’ के दृष्टिकोण से देखेंगे तो लेखक और भाषा दोनों के साथ अन्याय करेंगे. भाषा लेखक के बाहर और ‘अंदर’ को एकसम करती है. उसकी अंतर दृष्टि और समाज के शोर को एक लय में गूंथती है. उसका ताना-बाना मात्र शब्द कोशी भाषा के बल पर ही नहीं होता. जब लेखक अपने कथ्य के अनुरूप उसे रुपांतरित करता है तो कुछ ‘नया’ घटित होता है. मेरी हर कृति के साथ भाषा बदलती है. मैं नहीं-वह पात्र है जो रचना में अपना दबाव बनाए रहते हैं. ‘ज़िंदगी नामा’ की भाषा खेतिहर समाज में उभरी है. ‘दिलोदानिश’ की भाषा राजधानी के पुराने शहर से है, नई दिल्ली से नहीं. उसमें उर्दू का शहरातीपन है. ‘ए लड़की’ में भाषा का मुखड़ा कुछ और ही है. उसकी गहराई की ओर संकेत कर रही हूँ. ‘मित्रोमरजानी’ में मित्रों का भाषाई तेवर बिल्कुल अलग है. वह न बोल्ड है न अटपट. उसे पढ़ते हुए अनोखी ज़रूर लगती है. स्वयं लेखक को अचंभित कर देने वाली. लेखक की नहीं वह उपन्यास की मित्रों की देन है.
अगर आप ‘यारों के यार’ की बात कर रही हैं, जहाँ कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ है, जिन्हें कुछ लोग बोल्ड और कुछ लोग अश्लील कहते हैं. वह कहानी दफ्तर के रोजमर्रा के कार्य-कलापों और काम करने वालों के वाचन के इर्द-गिर्द घूमती है. फाइलों की एकरसता से उबरने के लिए कुछ मर्दानी गालियाँ कमजोरों के आक्रोश को ही प्रकट करती हैं. वह शायद समाज में इसीलिए ईज़ाद भी की गई होंगी.

कृष्णा सोबती

साहित्य और कला के क्षेत्र में शील और अश्लील को कितना तूल देना चाहिए?

साहित्य मानवीय परिवार की सांझी संपदा है. इस लोक में व्यक्ति की जीवंतता का आख्यान है. साहित्य और कलाओं के अपने-अपने अनुशासन हैं. उन्हें लेकर शील और अश्लील के प्रश्न और विवाद उठाने उचित नहीं. नैतिकता और तथाकथित पवित्रता के आग्रह मानवीय मन की उन्मुक्तता और कलात्मक स्वतंत्रता को संकीर्णता की ओर धकेल सकते हैं. साहित्यिक विधाओं और धर्मगाथाओं में अंतर है. जब इन दोनों को एक कर डालने की तानाशाही प्रवृत्ति सिर उठाती वहाँ न मात्र मानवीय सृजनशीलता छीजती है बल्कि मूल्यों का भी हनन होता है.

क्या आज का स्त्री-लेखन पुरुष लेखन के दबाव में है?

हमारा स्त्री लेखन, पुरुष प्रधान लेखक के नियंत्रण में नहीं, वह अपनी पुरानी पारिवारिक चौखट के दबाव में से निकलने की प्रक्रिया की अभिव्यक्ति कर रहा है. स्त्री अपनी दैहिक सीमाओं से उभर कर अपने व्यक्तित्व की खोज में है. आर्थिक स्वतंत्रता के साथ उसका आत्मविश्वास बढ़ा है और गृहस्थी के बाहर का बड़ा आकाश भी ज़्यादा निखरा है, जो उसे नई संज्ञा, नई भाषा दे रहा है.

क्या आप मानती हैं स्त्री-लेखन संवेदना की दृष्टि से पुरुष लेखन से ज़्यादा घनीभूत है?

लेखकीय अनुशासन मात्र भाषाई कौशल नहीं. किसी भी लेखक का विचार विशेष, कथ्य, शैली, अनुभव और एकाग्रता उसके साधारण को असाधारण बना देती है. स्त्री की अंतर्दृष्टि छोटी-छोटी बातों को पकड़ने की आदी है. उसे अपने में बड़े पक्ष को ग्रहण कर सकने की समझ जगानी होगी.

उम्र के इस पड़ाव पर किसी चीज़ का कोई अफसोस है आपको?

जहाँ तक बन पड़ा अपनी आंतरिक जुर्रत और जीवट के बल पर अपने चुनावों को जी सकी. आपके कहे अनुसार अपने को दूर तक टटोलूं तो कह सकती हूँ कि बहुत सी कठिनाइयों के होते हुए भी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर अपनी क्षमताओं को सार्थक कर सकी. मेरा उपन्यास ‘समय सरगम’ ज़रूर पढ़कर देखिए. स्थितियाँ, टकराहटें, संघर्ष और उत्पीड़न को परे फेंक देने की हिम्मत-यह सभी रंग हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है. इन्हीं से ज़िंदगी लहकती महकती है. इन्हीं से तन मन के भाव, संवेदन, शब्द और अर्थ ग्रहण करते हैं. इसी से हम अपने समय की धूप-छाँह को अर्जित करते हैं.

आज के साहित्यिक माहौल या दूसरे शब्दों में आपकी इंटलेक्चुअल बिरादरी की लेखकीय राजनीति के बारे में आपकी क्या राय?

भूमंडलीकरण ने हमारी मानसिकता, हमारे सामाजिक स्तर में बहुत से बदलाव किए हैं. उनमें से एक बदलाव हमारे लेखक समाज में प्रत्यक्ष हो रहा है. इन जटिलताओं और पेचों को पुरानी आँखों और पुराने मापदंडों से देखना संभव नहीं होगा. हम जिन्हें साहित्यिक मूल्यों का अवमूल्यन कह रहे हैं वह दरअसल नई स्थितियों-परिस्थितियों का नया उभार है.

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