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शुक्रवार, 20 अप्रैल, 2007 को 08:50 GMT तक के समाचार
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मुँह खोलने की आदत ज़रूरी

कचरे को साफ़ करना होता है, उसके लिए पहले उसे स्वीकार करना होता है कि वह वहाँ है, उसके ऊपर कालीन बिछाने की प्रवृति भारत सहित कई परंपरागत समाजों में पाई जाती है.

कालीन के नीचे की गंदगी जब पूरी तरह सड़ चुकी होती है तब टीवी पर विज्ञापन आने लगते हैं--'बिंदास बोल- कंडोम.'

शर्म, लिहाज और हिचक किसी समाज में ज़्यादा और किसी में कम है, लेकिन जब जीने-मरने का सवाल होता है तब तो सच को स्वीकार करने की हिम्मत जुटानी ही चाहिए.

अब से कुछ समय पहले तक कहा जाता रहा कि एचआईवी और एड्स तो पश्चिमी देशों की समस्या है जहाँ विवाह व्यवस्था टूट के कगार पर है और स्वच्छंद यौन जीवन से उपजी यह समस्या भारत जैसे देश के लिए ख़तरा नहीं है जहाँ सामाजिक मर्यादा के बंधन बड़े मज़बूत हैं.

ज़्यादातर मामले तो ऐसे हैं जब 'वैवाहिक बंधन' में बंधे पति ने अपनी पत्नी को संक्रमित किया.

तक़रीबन साठ लाख लोग इस बात के जीते-जागते गवाह हैं कि भारतीय सामाजिक बंधनों की ताक़त पर भरोसा करते वक़्त हमने उन रेडलाइट बस्तियों के अस्तित्व को ही नज़रअंदाज़ कर दिया था जो बड़े शहरों के व्यस्त इलाक़ों में सबकी आँखों के सामने चलते हैं.

ट्रक चलाने वाले रास्ते में आज से नहीं रुकने लगे हैं बल्कि हमेशा से रुकते थे. रुककर वे जो कुछ करते थे उसे स्वीकार करने में हमें तीस साल लग गए.

इतना समय काफ़ी था भारत को एचआईवी संक्रमण की कुल संख्या के मामले में पहले नंबर पर लाने के लिए.

स्त्री-पुरुष के बीच मेलजोल पर अपनी सख़्ती के लिए जाने जाने वाले भारत के गाँवों में भी एचआईवी के मरीज मौजूद हैं जो इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि गंभीर मु्द्दों से आमने-सामने जूझने से कतराने के नतीजे क्या होते हैं.

एचआईवी संक्रमण का सबसे ज़्यादा ख़तरा समलैंगिक पुरुषों को है यह बात जानने के बावजूद गाँवों-क़स्बों में बसने वाले भारत का रवैया कुछ ऐसा ही है जैसे वे जानते ही नहीं समलैंगिकता क्या होती है.

क़िस्सों की भरमार है समलैंगिकता को लेकर लेकिन ऐसा लगता है कि यह क़िस्सा जीते-जागते लोगों का नहीं काल्पनिक पात्रों का है.

महानगरों में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर यह हँसी-मज़ाक का, महिला सहकर्मियों की ग़ैर-मौजूदगी देखकर दो-एक लतीफ़े सुनाने का विषय है, गंभीर चर्चा का नहीं.

कामसूत्र और खजुराहो के देश में यौन जीवन से जुड़े गंभीर सवालों पर चर्चा का अभाव ही नहीं है, उसे लेकर कथित भारतीय संस्कृति के नाम पर उसका निषेध दिखता है.

इसका ताज़ा उदाहरण आपके सामने है जब स्कूलों में बच्चों को यौन शिक्षा देने की कोशिश इसी तरह के शोर के कारण नाकाम रही.

लोग भूल गए कि ये वही बच्चे हैं जब दसवीं तक जाते-जाते हर तरह के एमएमएस न सिर्फ़ देखने लगते हैं बल्कि ख़ुद ही बना भी देते हैं.

यह मामला सिर्फ़ एड्स या एचआईवी का नहीं है, चाहे वह घरों के अंदर महिलाओं और बच्चियों के साथ होने वाला अमानवीय व्यवहार हो या फिर यौन शोषण, हम सब जानते-बूझते हैं लेकिन उसके बारे में कुछ करना तो दूर की बात है कुछ कहते तक नहीं.

इंटरनेट और संचार क्रांति के इस ज़माने में मंचों की, मार्गदर्शकों की और मददगारों की कमी नहीं है, स्वयंसेवी संगठनों ने इस दिशा में काम किया है.

एचआईवी के मामले में देर से जागने का नतीजा सामने है अब दूसरे मुद्दों पर मुँह खोलने की आदत डालनी चाहिए.

शुरूआत सड़कों पर महिलाओं के साथ होने वाली बदतमीज़ी से हो या फिर घरों के भीतर होने वाले बच्चों के यौन शोषण से, शुरूआत तो हो.

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