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एक सवाल का सवाल है | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभी बहुत समय नहीं बीते जब भारतीय समाज में सवाल पूछना अवमानना का प्रतीक हुआ करता था. सवाल उठाने का मतलब कभी बगावत करना माना जाता रहा तो कभी उद्दंडता के दायरे में आ गया. बल्कि समाज के एक बड़े हिस्से में अभी भी यही अवधारणा है. बेटा अपने पिता से सवाल नहीं पूछ सकता. छोटा भाई बड़े भाई से सवाल नहीं पूछ सकता. पत्नी अपने पति के कहे को इसलिए चुपचाप मान लेती है क्योंकि निर्णय लेने के पति के अधिकार पर सवाल उठाने का हक़ उसे नहीं. यहाँ तक कि कक्षा में छात्र अपने शिक्षक से सवाल नहीं पूछ सकते. इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ना अपने आपमें चुनौतीपूर्ण हो सकता है कि यह अवधारणा भारतीय समाज में पनपी कैसे और क्यों पनपी. जिस भारतीय समाज में सवाल पूछना एक परंपरा की तरह रहा है. इस समाज ने सवाल पूछे और उसके जवाब भी ढूँढ़े. शास्त्रार्थ इसी समाज की परंपरा का हिस्सा रहा है, जिसमें चुनौती यही होती थी कि किसके सवाल बड़े होंगे. जीतता वह नहीं था जो जवाब बड़े देता था बल्कि जीतता वह था जो अपने बड़े प्रश्नों से निरुत्तर कर देता था. और ऐसा नहीं है कि सवाल पूछना ही ज़रुरी था. इसके जवाब की तलाश भी अहम थी. मिथक कथा ही सही. लेकिन अगर अर्जुन के मन में सवाल न उठे होते तो गीता की रचना कैसे होती? यक्ष के पास सवाल थे और जवाब न देने पर वह अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव को मृत्युदंड दे सकता था. युधिष्ठिर को यक्ष के सवालों के जवाब देने पड़े थे. अगर सवाल पूछने की परंपरा न होती तो न शून्य का अविष्कार हुआ होता और न भारत में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का पुख़्ता ज्ञान होता. लेकिन इतिहास गवाह है कि इसी भारतीय समाज ने धीरे-धीरे सवाल पूछना बंद कर दिया. अगर ऐसा न हुआ होता तो बीसवीं सदी, जो आविष्कारों की सदी थी, वह पश्चिमी देशों की सदी न रही होती. अकारण नहीं था कि जो समाज अपनी राम कथा में पुष्पक विमान की कहानियाँ सुनाता रहा वह विमान बनाने के बारे में सोच नहीं रहा था. कबीर जैसे सवाल उठाने वाले लोग इस बीच हुए लेकिन सवाल उठाने की यह परंपरा नेपथ्य में ही रही. लेकिन अब जाकर लगता है कि स्थिति थोड़ी बदल रही है. हो सकता है कि पश्चिम से बारास्ता बाज़ार जो हवा आ रही है वह एक बार फिर भारतीय समाज को यह चेतना फिर से दे रही हो. लेकिन यह चेतना एक बार फिर जागती दिखती है. अब जो पीढ़ी आ रही है वह सवाल पूछने लगी है. वह न केवल अपने अग्रजों से सवाल पूछती है बल्कि अपने आपसे भी सवाल पूछ रही है. अब युवा न केवल सांप्रदायिकता के सवाल से दो चार हो रहा है बल्कि वह उस रुढ़िवादी सामाजिक ढाँचे पर भी सवाल खड़े कर रहा है जिसे अब तक समाज ढोता रहा है. इसमें जाति व्यवस्था भी है और यौन शिक्षा भी. अब पीढ़ियों का अंतराल कम हो गया है और संचार प्रणाली ने हर पीढ़ी को एक इकाई के रुप में खड़ा कर दिया है. अब देश के दो कोनों के युवा दो अलग-अलग दिशाओं में नहीं सोचते. वे एक साथ सवाल उठाते हैं और एक साथ उसका जवाब ढूँढ़ते हैं. हालांकि परिवर्तन की यह बयार धीरे-धीरे ही बह रही है. वह दिन अभी दूर है जब पूरे समाज में यह चेतना आ जाएगी. लेकिन इसके विस्तार में ज़्यादा दिन नहीं लगेंगे यह तय है. उनके सवालों में हो सकता है कि सृजन की नई परंपरा शुरु हो और उस रूढ़ि का खात्मा हो जिसमें सवाल उठाना ही वर्जित हो. हो सकता है कि सवाल पूछने वाला यह नागरिक समाज भी धीरे-धीरे इतना बड़ा हो जाए कि राजनीतिक समाज की मनमानी और एकाधिकार को चुनौती देने लगे. उम्मीद की जानी चाहिए कि एक दिन सवाल उठाने वाली यह युवा पीढ़ी भ्रष्टाचार से लेकर भेदभाव और अवसरवादिता की राजनीति पर सीधे दखल के लिए भी खड़ी होगी. सवाल पूछने वाली इस पीढ़ी का दायरा यदि बड़ा हुआ तो ही इक्कीसवीं सदी भारत की पीढ़ी बन पाएगी. शाहरुख़ ख़ान भले ही अपने करोड़पति वाले कार्यक्रम के लिए गा रहे हों कि 'एक सवाल का सवाल है' लेकिन सही मायनों भारत के लिए यह एक सवाल का ही सवाल है. | इससे जुड़ी ख़बरें आख़िर यह किसकी दुनिया है?06 अप्रैल, 2007 | पत्रिका अतिथियों का विदा हो जाना...22 मार्च, 2007 | पत्रिका विदा लेने से पहले...16 मार्च, 2007 | पत्रिका हम और ट्रैफिक08 मार्च, 2007 | पत्रिका मीडिया और अभिशासन02 मार्च, 2007 | पत्रिका कमलेश्वर का न रहना01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका चकाचौंध में एक किरण23 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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