|
चकाचौंध में एक किरण | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दूसरी पूर्वी देशों की संस्कृति की तरह भारतीय संस्कृति भी विनम्रता, सादगी, मेलजोल की भावना को उत्तम समझती है. आत्मप्रशंसा, दिखावा और प्रशस्तिगान को अच्छा नहीं माना जाता. लेकिन बाज़ार के इस युग में प्रचार का महत्त्व बहुत बढ़ गया है. इसके कारण प्रदर्शन और प्रशस्तिगान का रिवाज भी ज़ोरो पर है. एक मित्र कहते हैं कि स्वयं अपनी प्रशंसा इसलिए करते हैं कि दूसरों को इसके लिए तकलीफ़ नहीं देना चाहते. व्यापार और मनोरंजन जगत से दूर रहने वाले बुद्धिजीवी और लेखक तक बाज़ारवाद का शिकार हो रहे हैं. हमारे समाज में 60 वर्ष पूरे होने, 75 वर्ष पूरे होने या 80 वर्ष पूरे होने के बाद सम्मान समारोह हुआ करते थे, आज भी होते हैं. पर कुछ लेखकों ने अपने आपको इससे भी मुक्त कर लिया है.वे 60 का होने की प्रतीक्षा करने को भी बेकार समझते हैं. यही वजह है कि कुछ लेखक/कवि तो हर साल अपने जन्मदिन को जश्न की तरह मनाते हैं और ख़ुश होते हैं. इन जश्नों में पैसा पानी की तरह बहता है लेकिन मज़ेदार बात यह है कि पैसा उसका नहीं होता जिसका जन्म दिन या सष्ठिपूर्ति मनाई जाती है. पैसा कहीं और से आता है, प्रचार किसी और का होता है. यह है आज के यथार्थ की जटिलता का एक छोटा-सा उदाहरण. चकाचौंध और प्रायोजित कार्यक्रमों की भीड़ में वे प्रयास ओझल हो जाते हैं जो मन से किए जाते हैं. जिनके पीछे सिर्फ़ श्रद्धा और प्रेम होता है. जो सीमित साधनों और छोटे स्तर पर संपन्न होते हैं. इसी तरह का एक प्रयास इन दिनों देखने को मिला. कांकरोली राजस्थान से ‘संबोधन’ नाम की एक लघु पत्रिका क़मर मेवाड़ी निकालते हैं. उन्होंने हिंदी के प्रतिष्ठित कहानीकार स्वयं प्रकाश के साठ वर्ष पूरे हो जाने के मौक़े पर एक पत्रिका (जन-मार्च 2007) अंक निकाला है. पत्रिका में सौ से कम पृष्ठ है. उसमें भव्यता और दिखावा भी नहीं है. स्वयं प्रकाश की कुछ रचनाएँ और उनको लिखे कुछ पत्र ही पत्रिका में छपे हैं. लेकिन इस सबके बावजूद पत्रिका को देखकर लगता है कि दिल से निकाली गई है और किसी का पैसा नहीं बहा है बल्कि बहुतों ने अपना पसीना बहाया है. हो सकता है ‘संबोधन’ का यह अंक आज के माहौल में किसी को आकर्षित न कर सके और ‘अननोटिस्ड’ चला जाए. लोगों को यह भी पता न चल पाए कि स्वयं प्रकाश 60 वर्ष के हो गए हैं. यह भी रेखांकित न हो पाए कि उन्होंने हिंदी साहित्य को कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ दी हैं. लेकिन यह नहीं हो सकता कि कोई यह कह सके कि ‘संबोधन’ ने यह काम मन से नहीं किया है. स्वयं प्रकाश पूरे जीवन राजस्थान के बीहड़ इलाक़ों में रहे हैं. बड़े नगरों और राजधानी से अनुपिस्थत स्वयं प्रकाश के रचनाओं ने ही उनके लिए हिंदी कहानी साहित्य में जगह बनाई है. उनके 60 वर्ष पूरे होने पर उन्हें बधाई देने के साथ-साथ क़मर मेवाड़ी को भी बधाई दी जानी चाहिए जो अपनी जगर पर, अपनी तरह, अपने बलबूते पर चल रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें हिंदी के अख़बारों की दुनिया09 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका कमलेश्वर का न रहना01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका रॉयल्टी के मुद्दे पर पहल की ज़रूरत25 जनवरी, 2007 | पत्रिका ज़िलाधिकारी का धरना19 जनवरी, 2007 | पत्रिका सांस्कृतिक धरोहरः संरक्षण की नीति11 जनवरी, 2007 | पत्रिका लघु पत्रिकाएँ और नया संसार05 जनवरी, 2007 | पत्रिका साहित्य से दोस्ती29 दिसंबर, 2006 | पत्रिका अख़बार की महत्ता अब भी बरक़रार21 दिसंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||