BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
गुरुवार, 11 जनवरी, 2007 को 19:19 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
सांस्कृतिक धरोहरः संरक्षण की नीति

नवाब जैनुल आब्दीन खाँ का मक़बरा
जहानाबाद, फतेहपुर में उपेक्षित पड़ा 18वीं शताब्दी में निर्मित नवाब जैनुल आब्दीन खाँ का मक़बरा
बहुत बड़े और बहुत पुराने देशों की कुछ पुरानी और बड़ी समस्याएँ भी होती हैं.

हमारी एक बहुत बड़ी समस्या प्राचीन धरोहर को सुरक्षित रखने की भी है. पूरे देश में ऐसी अनगिनत प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व की इमारतें हैं जिनकी देखभाल ठीक से नहीं हो रही हैं.

कुछ इमारतें तो पूरी तरह उपेक्षित हैं और अगर उन पर ध्यान न दिया गया तो वे गिर जाएँगी. सरकारी विभाग अपनी सीमा और साधनों की कमी के कारण केवल उन्हीं इमारतों की देखभाल करते हैं जो उनकी सूची में शामिल हैं. पर यह काफ़ी नहीं है.

पिछले एक दशक से भारत में बदलाव की जो हवा चल रही है उसके अंतर्गत अब यह माना जा रहा है कि देश की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की ज़िम्मेदारी केवल सरकार की ही नहीं है. सार्वजनिक क्षेत्र की दो बड़ी कंपनियों ने भी इस ज़िम्मेदारी को स्वीकार किया है.

‘सेल’ ने दिल्ली के लोदी गार्डेन की इमारतों की मरम्मत तथा साज सज्जा के लिए बनाई गई एक योजना में 10 करोड़ रुपए लगाए हैं. इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने कन्हेरी की गुफाओं तथा कोणार्क मंदिर के ‘रिनोवेशन’ के लिए 25 करोड़ रुपए खर्च करने का निर्णय लिया है. इन दोनों प्रयासों से उत्साहित होकर भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय अब व्यापक स्तर पर बड़े औद्योगिक घरानों तथा व्यापार संगठनों को इस काम में शामिल करना चाहता है.

अभी हाल में ही मंत्रालय ने ‘रिलायंस’, ‘हीरो होंडा’, ‘सैमसंग’, ‘एमआरएफ’, ‘एवीवा’, ‘विप्रो’,‘एलजी’ जैसी कंपनियों को एक पत्र लिख कर देश की विलक्षण सांस्कृतिक धरोहर में संरक्षण और संवर्द्धन में सहयोग देने की अपील की है. यह निश्चित रूप से एक सार्थक प्रयास है और आशा की जाती है कि बड़े औद्योगिक और व्यापार घराने अपनी ‘पब्लिक इमेज’ बनाने के लिए इस दिशा में आगे बढ़ेंगे.

मक़बरा स्थापत्य कला का एक अच्छा उदाहरण है

देश की सांस्कृतिक धरोहर को बनाए रखने के लिए मंत्रालय ने ‘नेशनल कल्चरल फंड’ की स्थापना की है जिसके अंतर्गत औद्योगिक घरानों से यह कहा गया है कि वे उन ऐतिहासिक इमारतों को ‘एडाप्ट’ कर सकते हैं जो भारतीय पुरात्व सर्वेक्षण के अंतर्गत नहीं आती हैं. यह पत्र ‘रेमंड्स’, ‘ग्रासिम इंडिया’, ‘मारुति उद्योग’, ‘अरविंद मिल्स’ को भेजा गया है. ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सरकार ने घरानों द्वारा ऐतिहासिक इमारतों को गोद लिए जाने की प्रक्रिया को न केवल सरल बनाया है बल्कि औद्योगिक घरानों के हितों का ध्यान रखते हुए उन्हें यह छूट दी गई है कि वे ऐतिहासिक इमारतों के इर्द-गिर्द संभव व्यापारिक गतिविधियाँ भी चला सकते हैं. निश्चित रूप से यह प्रावधान औद्योगिक घरानों को प्रेरित करेगा.

संस्कृति मंत्रालय द्वारा उठाए गए इस क़दम से बड़े ऐतिहासिक स्थलों के विकास में तो औद्योगिक व्यापारिक घराने रुचि लेंगे लेकिन छोटे पर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल उपेक्षित रह जाएँगे. इसलिए ज़रूरी यह है कि ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए सरकार एक बड़ी व्यापक और कारगर नीति बनाए. छोटे शहरों में ऐसी तमाम इमारतें हैं जो उपेक्षित पड़ी हैं. इन इमारतों पर अवैध कब्ज़े हैं तथा कुछ लोगों ने उन्हें अपनी निजी संपत्ति के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. ऐसी इमारतों की एक बड़ी सूची बनाना ज़रूरी है ताकि यह पता चल सके कि वे कहाँ है, किस स्थिति में हैं और उनका संरक्षण कैसे किया जा सकता है.

एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि मध्यकाल में या उससे भी पहले जो महत्वपूर्ण शहर रहे हैं उनमें से कुछ अब विशेष कारणों से अपना महत्व खो बैठे हैं और उपेक्षित हैं. उदाहरण के लिए उत्तरप्रदेश के फतेहपुर ज़िले के कोड़ा जहानाबाद कस्बे को लिया जा सकता है. यह कस्बा मध्यकाल में बहुत प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण केंद्र था. यहाँ मुग़ल सम्राटों तथा अन्य के द्वारा निर्मित भव्य ऐतिहासिक इमारतें हैं. यहाँ की ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण कैसे होगा?

छोटे-उपेक्षित तथा अनजान किस्म के ज़िलों कस्बो में फैली ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के संरक्षण की ज़िम्मेदारी स्थानीय निकाय जैसे नगर पालिका, ज़िला पंचायत ले सकती हैं और स्थानीय लोगों की सहायता से छोटी पर कारगर योजनाएँ लागू की जा सकती हैं.

जिस तरह ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण में आम आदमी की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है उसी तरह इस तथ्य को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि ऐतिहासिक घरोहर के संरक्षण में आम आदमी की भागीदारी बहुत आवश्यक है. इसलिए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का सिद्धांत सहभागिता के आधार पर ही बनना चाहिए. औद्योगिक और व्यापारिक घरानों के साथ-साथ लोगों की सहभागिता भी महत्वपूर्ण मानी जानी चाहिए.

इससे जुड़ी ख़बरें
लघु पत्रिकाएँ और नया संसार
05 जनवरी, 2007 | पत्रिका
साहित्य से दोस्ती
29 दिसंबर, 2006 | पत्रिका
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>