|
नए अतिथि संपादक से आपकी मुलाक़ात | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी पत्रिका के अतिथि संपादक देवानंद ने जब अपने अंतिम संपादकीय में पाठकों से विदा ली तो अचानक अहसास हुआ कि पत्रिका तीन महीने की हो गई है. यह समय इतनी तेज़ी से बीता कि वक़्त का अंदाज़ा ही नहीं हुआ. मेरे सहयोगी विनोद वर्मा और मैं पत्रिका से भावनात्मक रूप से इतना जुड़ गए हैं कि वह हमारे लिए आज भी उतनी ही नई नवेली है जितनी पहले थी. इस दौरान लगातार आपकी प्रतिक्रियाएँ मिलती रहीं और पत्रिका को निखारने में हमारा मार्गदर्शन करती रहीं. इस अंक से एक नए अतिथि संपादक आपके रूबरू हैं. अगले तीन महीने तक हर शुक्रवार वह आपको संबोधित करेंगे. असग़र वजाहत हिंदी के पाठकों के लिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. प्रख्यात उपन्यासकार, नाटककार और शिक्षाविद् असग़र वजाहत की उपलब्धियों की सूची लंबी है.
जिस लाहौर नहीं देख्या...जैसे नाटक के रचयिता असग़र वजाहत की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. कई फ़िल्मों और वृत्तचित्रों के लिए स्क्रिप्ट लेखन के अलावा उन्होंने नुक्कड़ नाटकों के क्षेत्र में भी शोहरत हासिल की. दिल्ली हिंदी अकादमी के साहित्यकार सम्मान, उत्तर प्रदेश में कथाकार सम्मान और संस्कृति सम्मान हासिल कर चुके असग़र जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं. अनेक देशों की यात्रा कर चुके असग़र वजाहत ने एक लंबा समय हंगरी में गुज़ारा और वहाँ की जीवनशैली पर विस्तार से लिखा. इस समय वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं. बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की टीम पत्रिका के नए अतिथि संपादक असग़र वजाहत का स्वागत करती है. अपनी प्रतिक्रियाएँ भेजते रहिए. पता है hindi.letters@bbc.co.uk |
इससे जुड़ी ख़बरें एक बाल कविता08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका बादल का छाताः एक बाल कथा08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका केरल फ़िल्म महोत्सव में 'क्या तुम हो' 10 दिसंबर, 2006 | पत्रिका विवाह के दूल्हे के पास फ़िल्म नहीं09 दिसंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||