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केरल फ़िल्म महोत्सव में 'क्या तुम हो' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या होता है जब असल ज़िंदगी में अकेलेपन से जूझ रहे और 'आम आदमी' की पहचान से तंग आ चुके तीन इंसान भीड़ में ख़ुद को अकेला पाते हैं. क्या होता है जब ये लोग अपना अकेलापन मिटाने के लिए वास्तविक जीवन से काफ़ी दूर निकल अपने चारों ओर मिथकों का तानाबाना बुन लेते हैं और उसे ही सच मान बैठते हैं. इक्कीसवीं सदी की भागती-दौड़ती जिंदगी में बेगाने होते इंसानी रिश्तों के कुछ ऐसे ही सवालों को बड़े ही कलात्मक ढंग से उठाती है बीबीसी संवाददाता अनीश अहलूवालिया की फ़िल्म क्या तुम हो. इस फ़िल्म को आठ से 15 दिसंबर के बीच केरल के तिरूअंतपुरम् में हो रहे अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में दिखाया जा रहा है. फ़िल्म की कहानी तीन अकेले और एक दूसरे से अनजान लोगों के बीच घूमती है. जहाँ शिक्षाविद् डॉ पांडे अपनी पत्नी की दुर्घटना में हुई में मौत से उबरना चाहते हैं वहीं प्यार में धोखा खाई और लड़ाई-झगड़ों भरी शादी के बाद पति की मौत से अनीता भी बहुत परेशान है. अमृत एक कंप्यूटर इंजीनियर है जो ठीक से प्रशिक्षित नहीं है. वो एक साइबर कैफ़े खोलता है और एक ऐसी लड़की के प्यार में पड़ जाता है जो मानसिक रूप से बीमार है. वास्तविक जीवन में सम्मानजनक स्थान न मिलने पर ये तीनों इंटरनेट का सहारा लेते हैं और आपस में चैटिंग करने लगते हैं. इस स्वयं के गढ़े ख़्याली जीवन में ये तीनों वह सब कुछ करने की कोशिश करते हैं जो असल ज़िंदगी में नहीं कर पाते. इंटरनेट के इस मिथक भरे जीवन में एक-दूसरे से मज़ाक करते और बेवकूफ़ बनाते हुए डॉ. पांडे, अनीता और अमृत के आपसी संबंध गंभीर मोड़ पर पहुँच जाते हैं. जीवन की भागमभाग चैट के माध्यम से बने इन ख़्याली रिश्तों को हक़ीकत का ज़ामा पहनाने की कोशिश करते हुए फ़िल्म आगे बढ़ती है और बहुत ही नाटकीय मोड़ पर आकर ख़त्म होती है.
अनीश अहलूवालिया ने इस फ़िल्म में बड़ी ख़ूबसूरती से दिखाया है कि परिवार, समाज और व्यवसायिक जीवन की भागमभाग में आम आदमी को एक अदद बातचीत के लिए किस तरह इंटरनेट चैट का सहारा लेना पड़ता है और वो इसमें किस कदर डूब जाते हैं. अनीश कहते हैं," मेरे लिए 'क्या तुम हो' आधुनिक मूल्यों और भारतीय निम्न मध्यम वर्ग का रहन-सहन दिखाने की एक कोशिश है." इस फ़िल्म में रजित कपूर, ज्योति डोगरा और हेमंत खेर मुख्य भूमिका में हैं. फ़िल्म में पटकथा, संवाद और निर्देशन अनीश अहलूवालिया का है. अनीश लंबे समय से हिंदी और अंग्रेज़ी में नाटक लिखते और निर्देशित करते रहे हैं. इस फ़िल्म के निर्माता वसीम अहमद देहलवी हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें रिश्तों की कहानी 'कभी अलविदा...'13 जून, 2006 | पत्रिका 'कॉमेडी फ़िल्में भी करना चाहता हूँ'07 नवंबर, 2006 | पत्रिका बिग बी को एक और उपाधि04 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'अब प्यार अफ़ोर्ड नहीं कर पाता'14 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'राजकपूर में कुछ ख़ास बात थी. और शम्मी....'03 दिसंबर, 2006 | पत्रिका विवाह के दूल्हे के पास फ़िल्म नहीं09 दिसंबर, 2006 | पत्रिका इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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