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अख़बार की महत्ता अब भी बरक़रार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश, दुनिया और लोगों को समझने-बूझने में अख़बार काम आते हैं. बड़े ही नहीं, क्षेत्रीय समाचार पत्र भी इस दृष्टि से बहुत उपयोगी हैं. 15 सितंबर 2006 के यूनाइटेड भारत इलाहाबाद ने हाईकोर्ट के एक फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए जो लिखा है वह हिंदी क्षेत्र के ही नहीं बल्कि देश के सामाजिक राजनीतिक जीवन पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी मानी जाएगी. उत्तर प्रदेश प्रशासन उन लोगों को सुरक्षा प्रदान करता है जिनका जीवन ख़तरे में माना जाता है. प्रदेश में प्रशासन द्वारा दिए गए सुरक्षा गार्ड अर्थात ‘गनर’ साथ लेकर चलना इतना सम्मानजनक और आकर्षक हो गया था कि अपराधी छवि के नेता इसे अपने लिए अति-आवश्यक मानने लगे थे और ऐसे ‘महत्वपूर्ण’ लोगों की संख्या बढ़ गई थी जिन्हें प्रशासन ‘गनर’ दिया करता था. अभी हाल में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि अपराधी छवि वाले राजनीतिज्ञों, छात्र नेताओं, ठेकेदारों आदि को गनर (सुरक्षागार्ड) न दिए जाएं. 15 दिसंबर 2006 तक प्रदेश सरकार को आदेश पालन संबंधी रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करनी थी. समाचारपत्र का कहना है कि इस आदेश से प्रांत के राजनीतिक हलको में खलबली मची हुई है. पहली बात तो यह है कि जिन ‘विशिष्ठ’ लोगों के ‘गनर’ हटाए जाएंगे उनका अपराधी छवि होना तय हो जाएगा और दूसरी बात यह कि सारी इज़्ज़त धूल में मिल जाएगी.
लेकिन इसका एक पॉज़ेटिव पहलू यह है कि आम लोगों तथा शहर की सुरक्षा करने के लिए अधिक पुलिसकर्मी उपलब्ध होंगे. अब तक पुलिस हर वक़्त यह मजबूरी जताती थी कि पुलिस कर्मी कम हैं क्योंकि एक बड़ी संख्या(गनर) सुरक्षाकर्मियों के रूप में ‘‘अतिविशिष्ठ’’ लोगों की सुरक्षा पर तैनात हैं. विचार करने लायक बात यह है कि सरकार ने किस तरह नागरिकों की सुरक्षा की कीमत पर अपराधी छवि के लोगों को सुरक्षा प्रदान की थी तथा इसका नागरिक जीवन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ा होगा. अपराध कितने बढ़े होंगे. समाचारपत्र ने इस संबंध में एक और महत्वपूर्ण बात उठाई है. उसका कहना है कि लंबे समय तक अपराधी छवि के आदमी के साथ ‘गनर’ (सुरक्षाकर्मी) रहे पुलिसकर्मी से कुछ सर्तक और सावधान रहने की ज़रूरत पड़ेगी. वजह यह है कि अपराधी के साथ रहने के कारण पुलिसकर्मी के आदर्श बदल गए होंगे. हो सकता है वह अपराध जगत के प्रभावशाली तंत्र को समझ कर उसके आगे नतमस्तक होना सीख गया हो. यह भी हो सकता है कि उसके और अपराध जगत के बीच कुछ ‘लेन-देन’ के रिश्ते बन गए हों या अपराधी छवि के नेता ने पुलिसकर्मी के नैतिक बल को समाप्त कर दिया हो? निश्चित रूप से इस तरह का पुलिसकर्मी जब लौटकर वापस पुलिस में जाएगा तो वह एक अलग प्रकार का पुलिसकर्मी होगा. यूनाइटेड भारत की इस टिप्पणी को अगर पूरे देश के स्तर पर लागू करके देखा जाए तो एक बड़ी राजनीतिक समस्या सामने आती है. राजनीति में अपराध का घालमेल इतना ज़्यादा हो गया है कि सीमाएँ टूट गई हैं. यही पता नहीं चलता कि कौन रक्षक है और कौन भक्षक है. ऐसे हालात में भ्रष्टाचार और दूसरी सामाजिक बुराइयों पर काबू पाने के प्रयास हँसी मज़ाक जैसे लगते हैं. निश्चित रूप से बहुत बड़ा विचारणीय मुद्दा है. ++++++++++++++++++++++++++++++++++++ अतिथि संपादक असग़र वजाहत की इस टिप्पणी पर अपनी सहमति या असहमति लिखिए [email protected] पर | इससे जुड़ी ख़बरें सफलता की कुंजी बेतार के तारों में15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका नए अतिथि संपादक से आपकी मुलाक़ात14 दिसंबर, 2006 | पत्रिका विजयकिशोर मानव की कविताएँ15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका मालेगाँव का सामानांतर सिनेमा उद्योग15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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