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शुक्रवार, 05 जनवरी, 2007 को 10:43 GMT तक के समाचार
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लघु पत्रिकाएँ और नया संसार

आज हिंदी में दौ सौ से अधिक लघु-साहित्यिक पत्रिकाएँ निकल रही हैं. इनमें से कुछ नियमित हैं, कुछ नहीं हैं. कुछ ऐसी हैं जो निर्धारित समय पर निकलती हैं और कुछ अनियतकालिक हैं.

इनमें से कुछ अपने प्रकाशन क्षेत्र के लेखकों की रचनाओं पर अधिक ध्यान देती हैं तो कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करती हैं. लेकिन इतना तय है कि लघु-साहित्यिक पत्रिकाएँ अधिक प्रयोगधर्मी, निर्भीक और जनोन्मुखी होती हैं. बड़ी व्यवसायिक पत्रिकाएँ जो नहीं कर सकतीं या नहीं करना चाहती वह सब ये पत्रिकाएँ कर सकती हैं.

हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन आज़ादी के बाद उस समय शुरु हुआ था जब साहित्यकारों के समूहों ने महसूस किया था कि बड़ी पत्रिकाएँ अपने व्यवसायिक या वैचारिक दबावों के कारण केवल एक ही प्रकार की रचनाएँ छापती हैं. इसलिए अपनी बात कहने और लोगों तक पहुँचाने के लिए लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत हुई जिसका एक बड़ा आधार वैचारिक भी था. वामपंथी रुझानों से लैस पत्रिकाओं के अलावा कुछ पत्रिकाएँ विभिन्न साहित्यिक आंदोलनों जैसे अकविता/अकहानी आदि पर भी केंद्रित थीं. साठोत्तरी कहानी के दौर में ऐसी कई महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ निकली थीं जिन्होंने आंदोलन को स्थापित करने का काम किया था क्योंकि उन दिनों नई कहानी की तूती बोलती थी और उससे अलग या विरोधी स्वर के लिए बड़ी पत्रिकाओं में कोई जगह न थी.

 लघु-साहित्यिक पत्रिकाओं को अपने ‘क्षेत्र विशेष’ पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है या उनका स्वरूप अखिल भारतीय स्तर का होना चाहिए? प्रायः साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने स्तर को उठाने की कोशिश में राष्ट्रीय स्तर की बनना चाहती है अर्थात वे भी उन्हीं लेखकों की रचनाएँ छापने में विशेष रुचि लेती हैं जो ‘स्थापित’ लेखक हैं. सवाल यह है क्या लघु पत्रिकाओँ की पहली प्रतिबद्धता अपने क्षेत्र के लेखकों के प्रति नहीं है?

इतना तय है कि लघु-साहित्यिक पत्रिकाओं का अपना महत्व और भूमिका है. नए विचार, विधागत प्रयोग, नए लेखकों को जगह देना और साहित्य को जड़ों से जोड़ने का काम लघु पत्रिकाएँ करती हैं. आज हिंदी के लगभग सभी स्थापित लेखक हैं वे दसियों साल तक बराबर लघु पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं और आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास दरअसल लघु पत्रिकाओं का इतिहास ही है. अपनी इस शक्ति को पहचानते हुए हिंदी में लघु पत्रिकाओं के सम्मेलन और मंच भी बने हैं. इन सम्मेलनों और मंचों से जो अपेक्षाएँ थीं वे बड़ी सीमा तक पूरी नहीं हो रही हैं लेकिन इतना अवश्य हो रहा है कि लघु पत्रिकाएँ केंद्र में आ रही हैं और हिंदी की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में उनमें से कुछ की गिनती होती है.

लघु साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनका जवाब देना ज़रूरी है. पहला सवाल यह है कि क्या सभी पत्रिकाओं का स्वरूप एक-सा होना चाहिए? आज स्थिति यह है कि कुछ लघु पत्रिकाओं को छोड़कर बाकी सभी एक सी निकलती है. पता नहीं क्यों यह माना जाने लगा है कि कुछ लेख, कुछ कहानियाँ, कुछ कविताएँ, कुछ छुट-पुट सामग्री जोड़ दी जाए तो लघु पत्रिका बन जाती है.

इसके इलावा दूसरा सवाल यह है कि क्या लघु-साहित्यिक पत्रिकाओं को अपनी प्रसार संख्या के संदर्भ में लघु रहना आवश्यक है? यदि माँग है और यदि माँग बढ़ाई जा सकती है तो लघु पत्रिकाओं की प्रसार संख्या को क्यों न बढ़ाया जाए? क्या केवल अधिक प्रतियाँ छापने या अधिक लोगों तक पहुँचने से लघु-साहित्यिक पत्रिकाओं का ‘नेचर’ बदल जाएगा?

 कुछ पत्रिकाएँ अपनी ‘बेवसाइट’ या ‘ई-मेल’ का उल्लेख भी नहीं करतीं जो आज की दुनिया में बहुत ही आवश्यक है. ऐसी भी लघु पत्रिकाएँ हैं जो अपना टेलीफ़ोन नम्बर तक प्रकाशित नहीं करतीं. ऐसी स्थिति में, विदेश में रहने वाले हिंदी पाठकों के लिए पत्रिका प्राप्त करना असंभव-सा हो जाता है

तीसरी बात यह है कि लघु-साहित्यिक पत्रिकाओं को अपने ‘क्षेत्र विशेष’ पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है या उनका स्वरूप अखिल भारतीय स्तर का होना चाहिए? प्रायः साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने स्तर को उठाने की कोशिश में राष्ट्रीय स्तर की बनना चाहती है अर्थात वे भी उन्हीं लेखकों की रचनाएँ छापने में विशेष रुचि लेती हैं जो ‘स्थापित’ लेखक हैं. सवाल यह है क्या लघु पत्रिकाओँ की पहली प्रतिबद्धता अपने क्षेत्र के लेखकों के प्रति नहीं है?

अभी हाल में ही लंदन से पंजाबी और हिंदी के लेखक के सी मोहन दिल्ली आए हुए थे. उन्हें जब हिंदी की लघु पत्रिकाओँ के बारे में जानकारी मिली तो बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने माना कि लंदन में रहते हुए उन्हें यह नहीं पता था कि हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन है और इतनी महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ छपती हैं. पत्रिकाओं को देखने के बाद उनकी यह प्रतिक्रिया थी कि इन पत्रिकाओं में वे आवश्यक जानकारियाँ नहीं है जो विदेशों में रहने वाले हिंदी पाठकों के लिए आवश्यक है. उदाहरण के लिए कुछ विदेशी करेंसी यानी डॉलर या पाउंड में अपनी क़ीमत नहीं छापतीं. यह भी पता नहीं चलता कि किस प्रकार की डाक से संसार के किस भाग में पत्रिका भेजने पर क्या ख़र्च आएगा. कुछ पत्रिकाएँ अपनी ‘बेवसाइट’ या ‘ई-मेल’ का उल्लेख भी नहीं करतीं जो आज की दुनिया में बहुत ही आवश्यक है. ऐसी भी लघु पत्रिकाएँ हैं जो अपना टेलीफ़ोन नम्बर तक प्रकाशित नहीं करतीं. ऐसी स्थिति में, विदेश में रहने वाले हिंदी पाठकों के लिए पत्रिका प्राप्त करना असंभव-सा हो जाता है.

लघु पत्रिकाओं को इन सब मुद्दों पर विचार करना ज़रूरी है. ऐसा नहीं है सब लघु पत्रिकाओं की स्थिति एक-सी है. कुछ नए ज़माने के हिसाब से पूरी चौकस हैं पर कुछ को अभी जागना है.

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