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रॉयल्टी के मुद्दे पर पहल की ज़रूरत

हिंदी के ही नहीं लगभग सभी भारतीय भाषाओं के लेखक अक्सर इस बात की चर्चा करते रहते हैं कि उन्हें किताबों की रॉयल्टी नहीं मिलती या कम मिलती है या प्रकाशक रॉयल्टी का पूरा हिसाब उन्हें नहीं दिखाते.

कहने का मतलब यह कि लेखक रॉयल्टी की समस्या का लगातार सामना करते हैं. कभी-कभी किसी विख्यात लेखक के संबंध में यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर भी उठ जाती है और अख़बारों में कई सप्ताह या महीने में यह चर्चा का विषय रहता है. बताया जाता है कि हिंदी के महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को रॉयल्टी के संबंध में तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को दख़ल देना पड़ गया था.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के अधिकतर प्रकाशक रॉयल्टी के संबंध में लेखक को साफ़-साफ़ हिसाब किताब नहीं देते. दरअसल लेखक के लिए यह पता लगाना भी लगभग असंभव होता है कि प्रकाशन ने पुस्तक की कितनी प्रतियाँ छापी है और कितनी बेची हैं.

मान लीजिए लेखक के पास धांधली के सभी प्रमाण हों तब भी लेखक अदालत-कचहरी के चक्कर लगाने का जोखिम नहीं उठाता या उसके पास इतने साधन नहीं होते कि वह मुकदमेबाज़ी कर सके. आमतौर पर रॉयल्टी की राशि भी इतनी बड़ी नहीं होती जिसके लिए मजबूर होकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की ज़रूरत पड़े. इस तरह प्रकाशक प्रायः सुरक्षित रहता है और लेखक असुरक्षित.

लेखक अपनी बौद्धिक सम्पदा प्रकाशक के हवाले करता है और प्रकाशक एक अनुबंध के तहत उसे प्रकाशित करता है लेकिन इस अनुबंध की जानकारी केवल लेखक और प्रकाशक को होती है. और विवाद की स्थिति में ये दोनों आमने-सामने होते हैं. ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि दूसरी जायदाद के बेंचने-खरीदने संबंधी नियमों के अनुसार कुछ नियम लेखक और प्रकाशक के अनुबंध से जोड़ दिए जाए. उदाहरण के लिए यदि लेखक किसी प्रकाशन से अनुबंध करता है तो उसकी न केवल शर्ते तय हो बल्कि रजिस्ट्रार के ऑफिस की तरह एक सरकारी दफ़्तर हो जहाँ अनुबंध का जमा किया जाना और उसका पालन किया जाना क़ानूनी रूप से आवश्यक हो.

हमारे लेखक रॉयल्टी के संबंध में शिकायतें तो बहुत करते हैं लेकिन आजतक इस समस्या पर खुलकर पूरी बातचीत नहीं हुई और न कोई ऐसी योजना बनी है जिसके अंतर्गत इस समस्या का निपटारा किया जा सके.

समाज में लोगों के बीच होने वाले महत्त्वपूर्ण समझौतों को निर्देशित करने तथा उन्हें सही ढंग से लागू करने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है. सरकार से लेखक यह माँग कर सकते हैं लेखक-प्रकाशक के प्रकाशन, रॉयल्टी संबंधों पर क़ानून बनना चाहिए. इसके अंतर्गत ‘रजिस्ट्रार ऑफ रॉयल्टी’ का विभाग खोला जा सकता है. इसके बारे में नियम-क़ानून बनाए जा सकते हैं. इस विभाग को प्रकाशक और लेखक दोनों मान्यता दे सकते हैं तथा यह संस्था दोनों के हितों को देख सकती है.

प्रकाशन जगत तथा पुस्तकों के बेंचने-खरीदने के लिए भी राष्ट्रीय नीति का होना आवश्यक है. आज यह क्षेत्र पूरी तरह असुरिक्षत है और इसका सीधा प्रभाव पाठकों के ऊपर पड़ता है. किताबों के हद से बढ़ते मूल्य तथा दोषपूर्ण वितरण के कारण पुस्तकों तक नहीं पहुँच पाती.

हमारे देश में लेखकों के अनेक संगठन हैं और लगभग सभी संगठन कॉपी राइट और रॉयल्टी के मुद्दे को प्रमुख मुद्दा मानते हैं लेकिन आज तक इन दोनों मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस नहीं चली है और न इसको सुलझाने का कोई रास्ता ही नज़र आया है.

आज लेखकों और प्रकाशकों के हितों में रॉयल्टी के मुद्दे पर सार्थक क़दम उठाने की आवश्यकता है.

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