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ज़िलाधिकारी का धरना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में विकास की चकाचौंध में प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे पीछे हटते जा रहे हैं. किसी भी देश के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है कि जनता अमीर और ग़रीब लोगों में बुरी तरह बँट जाए. भारत में यह बड़ी तेज़ी से हो रहा है और इसका असर किसी एक वर्ग या समूह पर नहीं बल्कि पूरे देश पर पड़ रहा है. जनता के हित और कल्याण की बात करने वाली सरकार और समाज व्यवस्था ने शिक्षा और स्वास्थ्य की तरफ कितना ध्यान दिया है यह कोई छिपी हुई बात नहीं है. कभी-कभी समाचार पत्रों में ऐसी ख़बरे मिल जाती हैं जो विचलित कर देती हैं. राजस्थान के श्रीगंगापुर सिटी से निकलने वाले समाचार पत्र, 30 दिसंबर 2006 के अनुसार श्रीगंगापुर में ज़िला प्रमुख अर्थात ज़िलाधिकारी और उसी के साथ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के ज़िलाध्यक्ष को शहर के अस्पताल के सामने धरने पर बैठना पड़ा क्योंकि अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएँ ठप्प पड़ी थीं. समाचार यह है कि श्रीगंगापुर सिटी के जिलाधिकारी सड़क हादसे में मारे गए लोगों के पोस्टमार्टम और घायल के उपचार की जानकारी लेने जब 10 बजे सुबह अस्पताल पहुँचे तो उन्हें पूरे अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं मिला. पता चला कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर अभी तक नहीं आए हैं. हादसे में घायल का सिटी स्कैन इसलिए नहीं हुआ है प्रशिक्षित डॉक्टर नदारद हैं. यह भी जानकारी मिली कि अस्पताल के प्रमुख भी अस्पताल में नहीं हैं. ज़िलाधिकारी ने अस्पताल के प्रमुख से संपर्क करने की कोशिश की जो संभव न हुआ. ऐसी स्थिति में तंग आकर ज़िलाधिकारी अस्पताल के बाहर धरने पर बैठ गए. ज़िलाधिकारी के धरने की ख़बर मिलने के बाद अस्पताल प्रमुख और डॉक्टर अस्पताल आए. मरीज का इलाज शुरू हुआ. जिलाधिकारी ने पाया कि अस्पताल को मुहैया की जाने वाली सुविधाएँ भी नहीं है. दवाओं का अभाव है. श्रीगंगापुर सिटी के ज़िलाधिकारी ने तो धरना देकर डॉक्टरों से उनकी डियूटी पूरी करा ली लेकिन सवाल यह है कि आम आदमी अगर धरने पर बैठ भी जाए तो उसका इलाज नहीं होगा. यह सब देखने के श्रीगंगापुर जाने की ज़रूरत नहीं है. दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के बाहर कँपकँपा देने वाली सर्दी और जानसोख गर्मी के दिनों में मरीज खुले आसमान के नीचे अपना इलाज किए जाने का इंतज़ार करते रहते हैं. बताया जाता है कि अस्पतालों में जगह नहीं है. दवाएँ भी कम दी जाती है. इस पर लानत यह कि सरकारी अस्पताल राजनीति का अड्डा बन गए हैं और अस्पताल के डॉक्टर गुटबंदी की राजनीति में सक्रिय होने और मुकदमे लड़ने में लगे हुए हैं. सरकारी अस्पतालों की दयनीय दशा से प्राइवेट अस्पतालों की तुलना की जाए तो ज़मीन आसमान का फ़र्क़ मिलेगा. आज बड़े शहरों में महंगे और अति आधुनिक अस्पतालों की कमी नहीं है लेकिन ये अस्पताल आम आदमी की पहुँच से बाहर हैं, क्योंकि ये बहुत महंगे अस्पताल हैं. कभी-कभी इसकी जानकारी भी मिलती है कि सरकारी अस्पतालों की बदहाली का कारण पैसे का अभाव नहीं है. सरकार से पर्याप्त पैसा और साधन प्राप्त होते हैं. समस्या यह है कि अस्पतालों में राजनीति और निहित स्वार्थों के चलते बड़ी अव्यवस्था है. भ्रष्टाचार का भी इसमें बड़ा हाथ है. सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर प्राइवेट तौर पर इलाज करना ज़्यादा पसंद करते हैं क्योंकि उसमें अधिक और अतिरिक्त आमदनी होती है. सरकारी अस्पतालों की दवाएँ बाज़ार में बिक जाती है और उपकरण उपेक्षा के कारण खराब हो जाते हैं. इस तरह सरकारी अस्पतालों की बढ़ती हुई संख्या भी जनता के स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं दे पाती. अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं को ठीक ढ़ंग से चलाने के लिए क्या किया जा रहा है, इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती. शायद इस मसले पर सत्ताधारी बात भी नहीं करते. लगता है कि विकास की आँधी ने आम आदमी को, जो ग़रीब और असहाय हैं, देश ‘देश निकाला’ दे दिया है. | इससे जुड़ी ख़बरें सांस्कृतिक धरोहरः संरक्षण की नीति11 जनवरी, 2007 | पत्रिका लघु पत्रिकाएँ और नया संसार05 जनवरी, 2007 | पत्रिका साहित्य से दोस्ती29 दिसंबर, 2006 | पत्रिका अख़बार की महत्ता अब भी बरक़रार21 दिसंबर, 2006 | पत्रिका सफलता की कुंजी बेतार के तारों में15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका नए अतिथि संपादक से आपकी मुलाक़ात14 दिसंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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