BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 09 फ़रवरी, 2007 को 07:34 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
हिंदी के अख़बारों की दुनिया

हिंदी के अख़बारों की दुनिया तेज़ी से बदल रही है.

यह बदलाव सिर्फ़ उन अख़बारों की भाषा में नहीं आ रहा है. यही नहीं कि आज के हिंदी अख़बार अंग्रेज़ी के शब्दों का समझबूझ कर या नासमझी के साथ प्रयोग कर रहे हैं, बल्कि उनकी विषयवस्तु में भी बदलाव आ रहा है.

सबसे पहली बात तो यह है कि हिंदी साहित्य हिंदी अख़बारों से ग़ायब हो गया है. कारण यही हो सकता है कि अब अख़बारों की नज़र में हिंदी साहित्य के पाठक कम बचे हैं या साहित्य उबाऊ है और पुराना पड़ गया है.

हिंदी अख़बार मनोरंजन पर पूरा ज़ोर दे रहे हैं. खेलकूद के पन्ने बढ़ रहे हैं और फ़िल्म, टीवी की ‘कवरेज’ भी खूब हो रही है. लेकिन इसके साथ-साथ यह भी लग रहा है कि हिंदी के अख़बार फैशन और औरतों की सुंदरता को परोसने में एक दूसरे से बाज़ी मार ले जाने के लिए जान जोखिम में डाले हुए हैं.

उनमें होड़ ये लगी है कि कौन कितनी कामुक और उत्तेजित करने वाले स्त्री शरीर छाप सकता है. ये सच है कि सेक्स बिकता है और हिंदी के अख़बार इससे वंचित नहीं होना चाहते. सेक्स के साथ-साथ धर्म भी बिकता है. इसलिए हिंदी के अख़बार धर्म को भी थामे हुए हैं.

हिंदी अख़बार आधुनिक होने की होड़ में भी लगे हुए हैं. इस सिलसिले में अंग्रेज़ी में प्रकाशित पुस्तकों पर तो 'स्टोरी' कर लेते हैं. लेकिन हिंदी की कोई पुस्तक उन्हें इस लायक नहीं लगती कि उस पर स्टोरी की जा सके. हिंदी के अख़बारों में ‘बुकर प्राइज़’ पर जितना छपता है उतना साहित्य अकादमी के पुरस्कारों पर नहीं छपता.

अनीता देसाई को जितनी कवरेज मिलती है उतनी कृष्णा सोबती को नहीं मिलती. इसी तरह ‘वेलनटाइन डे’ हिंदी अख़बारों को पूरी तरह आकर्षित करता है लेकिन ‘फूलवालों की सैर’ में उनकी रुचि ख़त्म हो गई है. समझा जाता है कि विदेश और वह भी पश्चिमी संस्कृति ने भारत को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है. ज़ाहिर है कि अख़बार वही छापेंगे जो लोग चाहेंगे.

अलग-अलग दुनिया

हिंदी के अख़बारों की दुनिया लेकिन एक नहीं है.

अपने देश की विविधताओं की तरह हिंदी अख़बारों में भी विविधता देखी जा सकती है. चंद बड़े अख़बारों की बात छोड़ दें तो हिंदी के क्षेत्रीय अख़बार अपनी अलग पहचान बनाने में जुटे हुए हैं. इन अख़बारों ने अपने-अपने क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है. ये जानते हैं कि दिल्ली से निकलने वाले अख़बारों के पाठकों और इनके पाठकों में बड़ा फर्क है. शायद यही वजह है कि राँची से निकलने वाला प्रभात ख़बर अपने को अख़बार नहीं आंदोलन मानता है.

अन्य भारतीय भाषाओं के अख़बारों को अगर छोड़ दिया जाए तो हिंदी में प्रभात ख़बर ही ऐसा अख़बार है जो अपने इलाके के लिए समर्पित लगता है. झारखंड के स्थापना दिवस 15 नवंबर के मौक़े पर प्रभात ख़बर हर साल विशेषांक निकालता है. इस साल यह विशेषांक कुछ अलग किस्म का है.

चूंकि अख़बार अपने को आंदोलन मानता है इसलिए विशेषांक के साथ इलाके की शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सुरक्षा, ग़रीबी, अपराध और शहरीकरण के बारे में बहुत व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से रपट पेश की गई है.

अख़बार के संपादक का कहना है कि यह सब एक ‘बहस’ की शुरुआत करने के लिए किया गया है. और जब तक ये मुद्दे बहस का विषय नहीं बनते तब तक विकास संभव नहीं है.

आज हमारे समय में ख़ासतौर पर भारत में जाति, धर्म, संप्रदाय, अपराध और ब्लैकमनी के स्थान पर सही और सार्थक मुद्दों को बहस का विषय बनाना सुखद है. प्रभात ख़बर ने वैज्ञानिक ढंग से प्रदेश की स्थिति का आकलन किया है और मुद्दे बहस के लिए खुले छोड़ दिए हैं.

यह हिंदी समाचारपत्रों की दुनिया का एक अलग क़िस्म का और स्वागत योग्य अध्याय है.

इससे जुड़ी ख़बरें
कमलेश्वर का न रहना
01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका
ज़िलाधिकारी का धरना
19 जनवरी, 2007 | पत्रिका
लघु पत्रिकाएँ और नया संसार
05 जनवरी, 2007 | पत्रिका
साहित्य से दोस्ती
29 दिसंबर, 2006 | पत्रिका
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>