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गुरुवार, 01 फ़रवरी, 2007 को 23:01 GMT तक के समाचार
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कमलेश्वर का न रहना

कमलेश्वर का हमारे बीच से उठ जाना एक बहुत बड़ा नुक़सान है.

यही नहीं कि एक बड़ा लेखक चला गया; यही नहीं कि एक बहुत प्यारा, संवेदनशील बुज़ुर्ग नहीं रहा बल्कि यह भी बहुत बड़ा नुक़सान है कि देश, समाज और समय में पूरी ईमानदारी के साथ हस्तक्षेप करने वाला एक बड़ा लेखक अब नहीं है.

बड़े लेखक अपने लेखन की वजह से बड़े माने जाते हैं. पाठक लेखक के रहने या न रहने पर भी उनका साहित्य पढ़ते हैं.

लेकिन कमलेश्वर का एक और पक्ष रहा है.

मैं व्यक्तिगत तौर पर उन्हें 1964-65 से जानता हूँ. यह वह ज़माना था जब कमलेश्वर और नई कहानी एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे. कमलेश्वर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आमंत्रित किए जाते थे और वहाँ हम छात्रों की उनसे मुलाक़ाते होती थीं. उसके बाद दिल्ली, मुंबई और फिर दिल्ली में कमलेश्वर से लगातार संपर्क बना रहा और श्रेष्ठ लेखक होने के अलावा उनकी एक बहुत बड़ी ख़ूबी मुझे यह लगी कि कमलेश्वर किसी भी सामाजिक मुद्दे पर हमेशा कंधे से कंधा मिला कर चलने के लिए तैयार रहते थे.

हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक विभूतिनारायण राय ने अपने गाँव जोकरहा में एक पुस्तकालय बनाया है जहाँ अक्सर गोष्ठियाँ होती रहती है और देश के दूसरे शहरों से लेखक जाते रहते हैं. एक बार मुझे कमलेश्वर के साथ वहाँ जाने का मौक़ा मिला था.

शहर से गाँव तक जाने वाली सड़क का यह हाल था कि गाड़ी दो-दो फुट उछल रही थी. तीन-चार घंटे की यात्रा एक मुसीबत लग रही थी. लगता था रीढ़ की हड्डी टूट ही जाएगी. लेकिन अचानक ख़्याल आया कि हमारे साथ कमलेश्वर भी हैं जिनकी उम्र उस वक़्त सत्तर से ऊपर थी. कमलेश्वर को भी धक्के लग रहे थे. सोचा हमारी तरह उनकी भी रीढ़ की हड्डी है लेकिन कमलेश्वर के चेहरे पर शिकन नहीं थी. न उन्होंने एक बार सड़क के खराब होने की शिकायत की और ये कहा कि देखों रीड़ की हड्डी बचती है या नहीं.

उन्हें यह सब सहते देख कर हम लोगों की हिम्मत बंधी और हम आराम से यात्रा करने लगे. बाद में कमलेश्वर से इस बात का ज़िक्र किया तो मुस्कुराए और बोले,‘‘भई हम इस देश के लेखक हैं. यह अच्छा है या बुरा; इसकी ज़िम्मेदारी हमारे ऊपर आती है. शिकायत क्या करें.’’

साहस की मीनार

अटूट साहस था कमलेश्वर में.

एक बार भारत-पाक दोस्ती के संदर्भ में बात चल रही थी और कहा जा रहा था कि दोनों देशों की सरकारें अगर जनता को आपस में मिलने नहीं देतीं तो सबसे पहले इसका विरोध लेखकों को करना चाहिए. ‘‘लेखकों यदि वीज़ा नहीं दिया जाता तो उन्हें बिना वीज़ा के ही सीमा पार करने की कोशिश करनी चाहिए, चाहे वे गिरफ्तार ही क्यों न कर लिए जाएँ. कमलेश्वर ने कहा था अगर आप लोग ऐसा करते हैं तो मैं पहला आदमी होउँगा जो सीमा पार करने की कोशिश करूँगा.’’

सचमुच कमलेश्वर हिम्मत और साहस की मीनार थे.

बांग्लादेश युद्ध के दौरान जिस तरह वे सीमा पार करके, अपनी जान को ख़तरे में डाल के वर्जित इलाके में पहुँचे थे वो अपनी मिसाल आप है. बहुत कम लेखकों या पत्रकारों में इतना साहस होता है जितना कमलेश्वर में था.

देश और समाज से जुड़े कई मुद्दों पर जारी होने वाले बयानों के सिलसिले में मैं कमलेश्वर के पास जाया करता था और हमेशा वे न सिर्फ़ दस्तख़त करने के लिए तैयार रहते थे बल्कि आगे बढ़कर उस काम में शामिल होने का साहस भी झलकता था.

हिंदी साहित्य, रचनात्मकता, सांप्रदायिक सदभाव, इंसानों की बराबरी, लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना, साम्राज्यवाद का विरोध जैसे मुद्दों पर वे मुखर रहते थे.

इसलिए कमलेश्वर का जाना केवल एक बड़े रचनाकार का जाना नहीं है बल्कि इससे भी अधिक ‘बहुत कुछ’ है जो लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा.

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