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हम और ट्रैफिक | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली ही नहीं भारत के दूसरे महानगरों में भी ‘ट्रैफिक जाम’ की समस्या ख़तरनाक रूप धारण कर चुकी है. कहीं भी आने-जाने में लाखों, करोड़ों लोगों के अनगिनत घंटे बर्बाद होते हैं, गाड़ियों में खरबों रुपए का तेल बेवजह फुंकता है, पता नहीं. कितना धुआँ परिवेश को गंदा कर देता है. ट्रैफिक की समस्या भी उन बड़ी समस्याओं की सूची में आती है जिनकी तरफ हमने आज़ादी के बाद ध्यान नहीं दिया है. समस्याओं को टालना, उनका सामना न करना या फौरी समाधान खोजना शायद हमारी आदत बन गई है. शहरों का अंधाधुंध और बिना समझे-बूझे विस्तार, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अभाव, सड़कों और पुलों का अभाव, यातायात के नियमों का पालन करना आदि कारण हैं जिन पर समग्र रूप से विचार किया जाना चाहिए था. दिल्ली में यातायात पुलिस के किसी उच्च अधिकारी की समझ बनी कि शहर में ट्रैफिक की समस्या और दुर्घटनाओं की वजह यह है कि लाल बत्ती पर ड्राइवर ‘शांत’ नहीं रहते. इसलिए हर लाल बत्ती पर अंग्रेज़ी में ‘रिलैक्स’ लिखवा दिया था. यह माना गया कि जैसे ‘रिलैक्स’ लिख देने से समस्या का समाधान हो जाएगा. कुछ समय बाद यातायाद पुलिस के उच्चाधिकारी का तबादला हो गया. दूसरे अधिकारी आए. उनका मानना था कि दुर्घटनाएँ इसलिए होती है कि लाल बत्ती पर लोग हार्न बजाते हैं. इसलिए हर ट्रैफिक लाइट पर यह लिखवा दिया गया कि सौ मीटर तक हार्न बजाना मना है. दूसरे उच्चाधिकारी का भी तबादला हो गया. अब लाल बत्तियों पर लिखा ‘रिलैक्स’ कहीं-कहीं साफ़ हो गया है कहीं कुछ अक्षर बच गए हैं. हार्न न बजाए वाले बोर्डो पर मर्दानगी और ताक़त बढ़ाने वाले विज्ञापनों ने कब्ज़ा कर लिया है. कुल मिलाकर वही ढाक के तीन पात यानी समस्या के प्रति गंभीर रुझान का अभाव और व्यक्तिगत ढंग से समाधान खोजने की प्रवृति ने मामला चौपट कर रखा है. शहरों और खासतौर पर बड़े शहरों के मास्टर प्लान के साथ मनमाने खिलवाड़ ने भी ट्रैफिक की समस्या को विकराल बना दिया है. जहाँ एक कोठी हुआ करती थी और 10-12 लोग रहा करते थे वहाँ अब ऊँची-ऊँची इमारते बन गई है जिनमें सैंकड़ों लोग रहते हैं. ज़ाहिर है कि सड़के रबड़ की नहीं है. उनकी अपनी क्षमता है जो समाप्त हो सकती है. एक और बड़ी समस्या यह है कि हमारे देश में जिन लोगों के पास कारें हैं वे अपनी कारों से घर के दरवाज़े के सामने ही उतरना चाहते हैं. दुकानदार यह चाहते हैं कि कार से दुकान के सामने उतरें. उन्हें दो कदम भी पैदल न चलना पड़े. इस मानसिकता ने सड़क के किनारे वाली जगह को पार्किंग बना दिया है जो मुफ्त में मिल जाती है. लेकिन इसकी वजह से कितनी अव्यवस्था होती है. लोगों को कितनी परेशानी होती है, यह सब जानते हैं. लंदन में ऐसा नियम है कि प्रमुख बाज़ारों जैसे आक्सफोर्ड स्ट्रीट आदि क्षेत्रों में केवल पब्लिक ट्रांसपोर्ट ही जा सकता है. मतलब यह कि प्राइवेट गाड़ियाँ दूर किसी पार्किंग में खड़ी करनी पड़ती हैं. दिल्ली में इसका उल्टा है. कनाट प्लेस में बसें नहीं आ सकतीं, सिर्फ़ प्राइवेट गाड़ियाँ, कारें या टैक्सियाँ आ सकती है. बसें कनाट प्लेस से कुछ दूर आकर रूक जाती है. यानी बस में चलने वाले को कनाट प्लेस तक आने के लिए पैदल चलना पड़ता है लेकिन कार सीधे दुकान के सामने आ सकती है. पब्लिक ट्राँसपोर्ट पर प्राइवेट ट्राँसपोर्ट को प्राथमिकता देना शायदी हमारी सामंती समझ का हिस्सा है. हमारे देश में सामंत तो नहीं हैं लेकिन सामंती संस्कार बहुत प्रबल हैं. ट्रैफिक की समस्या के समाधान में लोगों का जो सहयोग मिलना चाहिए वह नहीं मिलता. प्रशासन का रवैया टालने वाला है. ज़ाहिर है समस्या जटिल होती जा रही है. | इससे जुड़ी ख़बरें सफलता की कुंजी बेतार के तारों में15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका साहित्य से दोस्ती29 दिसंबर, 2006 | पत्रिका सांस्कृतिक धरोहरः संरक्षण की नीति11 जनवरी, 2007 | पत्रिका गाँव में लगा हैंडपंप16 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका कमलेश्वर का न रहना01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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