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गाँव में लगा हैंडपंप | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गाँव में एक हैंडपंप लगाया जाता है. कुछ दिन बाद वह ख़राब हो जाता है. पानी नहीं निकलता. गाँव वाले चुप बैठ जाते हैं. वे कहते हैं कि यह सरकार ने लगाया है, वही ठीक करेगी. वैसे गाँव वाले अगर हैंडपंप ठीक करना चाहें भी तो ठीक नहीं करा सकते क्योंकि यह नहीं पता कि हैंडपंप कैसे ठीक किया जाता है. इसी तरह गाँव में सड़क बनती है. गाँव वालों को यह पता नहीं होता कि उनके गाँव के पास से सड़क निकल रही है. क्यों निकल रही है? कब निकलेगी? कहाँ से जाएगी? सड़क कैसी होगी? ये किसी को मालूम नहीं होता. सड़क बनने के साल भर में टूट जाती है तो गाँव वालों को यह भी नहीं पता होता कि सड़क कैसे टूट गई? अभी एक साल पहले ही तो बनी थी. और टूट गई तो सरकार ही बनाएंगी क्योंकि सड़क सरकार की है. उर्दू के प्रसिद्ध कवि अकबर इलाहाबादी ने मशहूर दिल्ली दरबार पर एक कविता लिखी है जिसमें अंग्रेज़ों के दिल्ली दरबार की विशेषताएं बयान करते-करते आख़िर में लिखा है,‘‘आँखें मेरी बाक़ी उनका.’’ मतलब यह कि यहाँ जो भी है वह अंग्रेज़ बहादुर की सरकार का है. मैं तो सिर्फ़ देख रहा हूँ. इससे ज़्यादा मेरा कुछ नहीं है. आज हमारे देश में विकास के संदर्भ में आम आदमी की प्रतिक्रिया भी यही है- जो हो रहा है, जो किया जा रहा है, सब सरकार का है; मैं तो सिर्फ़ देख रहा हूँ. मेरा इसमें कुछ नहीं है. न मुझसे पूछ कर यह हो रहा है और न इसके बारे में मैं कुछ जानता हूँ. आज़ादी के बाद से लेकर आजतक हमारे देश में विकास के जो ‘मॉडल’ हैं वो एकतरफा हैं. यानी सरकार अपना विकास करती है जबकि उद्देश्य जनता का विकास करना है. मतलब यह कि विकास एक पहिए की गाड़ी है जो अपनी धुरी पर चला जाता रहा है. काफ़ी आश्चर्य की बात यह है कि विकास की इस व्यवस्था पर इलाहाबाद में जन्मे और बड़े सरकारी पदों पर रहे प्रभात कुमार ने अपने एक लेख में प्रकाश डाला है. उन्होंने जो कुछ लिखा है वह एक अनुभवी, संवेदनशील और देशप्रेमी के उदगार हैं लेकिन उनका ‘एप्रोच’ बहुत व्यवहारिक है. वो कहते हैं कि क्या होना चाहिए यह सबको पता है. कैसे किया जाना चाहिए यह भी सब जानते हैं लेकिन फिर भी कुछ या उतना जितना होना चाहिए, नहीं हो रहा है, इसका क्या कारण है. राजनीति आज हमारे समाज की बहुत बड़ी ताक़त है. इतना निश्चित है कि बिना सार्थक राजनीति के कुछ नहीं हो सकता. पर हकीकत में राजनीतिज्ञ आज सस्ती लोकप्रियता के लिए जाति, धर्म, संप्रदाय और चलताऊ नारों का सहारा लेते हैं. और विकास में उनकी उतनी प्रतिबद्धता नहीं है जितनी होनी चाहिए. नौकरशाही पर कोई पाबंदी नहीं है. वह राजनेताओं को संतुष्ट करती है और अपना ‘करियर’ बनाती है. बदकिस्मती यह है कि लोगों के पास हमारे जनतंत्र में उतनी ताक़त नहीं है जितनी होनी चाहिए. वे मात्र दर्शक हैं. ऐसा संभव नहीं है कि जनता सरकारी प्रयासों और सहयोग के बिना विकास के पहिए को घुमाती रहे. लेकिन इतना तो हो सकता है कि जनता केंद्रित विकास का एक नया मॉडल बनाया जाए जिसमें जनता मात्र दर्शक न हो. विकास के लिए जनता और सरकारी संस्थाओं के बीच में एक पुल बनाने के हिमायती प्रभात कुमार कहते हैं कि जब तक विकास और प्रशासन की प्रक्रिया में नगर समाज की भागीदारी नहीं होगी तब तक विकास का सही मॉडल नहीं बन पाएगा और वह एकतरफा ही रहेगा और आज सब इस समस्या से दो-चार हो रहे हैं लेकिन बद क़िस्मती से समझते यह हैं कि यह समस्या ‘हमारी’ नहीं ‘उनकी’ है और वे यह समझते हैं कि यह समस्या ‘उनकी’ नहीं ‘हमारी’ है. ये एहसास पैदा होना चाहिए कि यह समस्या हम सबकी है. | इससे जुड़ी ख़बरें हिंदी के अख़बारों की दुनिया09 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका कमलेश्वर का न रहना01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका रॉयल्टी के मुद्दे पर पहल की ज़रूरत25 जनवरी, 2007 | पत्रिका ज़िलाधिकारी का धरना19 जनवरी, 2007 | पत्रिका सांस्कृतिक धरोहरः संरक्षण की नीति11 जनवरी, 2007 | पत्रिका लघु पत्रिकाएँ और नया संसार05 जनवरी, 2007 | पत्रिका साहित्य से दोस्ती29 दिसंबर, 2006 | पत्रिका अख़बार की महत्ता अब भी बरक़रार21 दिसंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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