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शुक्रवार, 02 मार्च, 2007 को 04:38 GMT तक के समाचार
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मीडिया और अभिशासन

पहले बात होली की...

हम इस साल फिर होली मना रहे हैं. हर साल की तरह होली के रंग और उल्लास में हम सब डूबे हैं. धर्म, जाति और भौगोलिक सीमाओं को हर साल की तरह होली ने तोड़ दिया है. होली के मौक़े पर बोले जाने वाला वाक्य ‘बुरा न मानो होली है’ दरअसल हमारे मन के अंदर की जड़ता तो तोड़ता है. दूसरे त्योहारों की तुलना में होली एक ऐसा त्योहार भी है जो हमारी आत्मा को साफ़ करने का काम भी करता है.

यही वजह है कि होली के दिन दोस्त नहीं दुश्मन से भी गले मिला जाता है. शिकवे-शिकायतें दूर होती हैं और हँसी मज़ाक़ के रंग में ज़िंदगी को एक अर्थ मिलता है.

आज के माहौल में होली कितनी ज़रूरी है यह किसी से छिपा नहीं है. तो इस मौक़े पर मस्ती और उल्लास का रंग हमारे अंदर के कूड़े-करकट को थोड़ा साफ़ करेगा, यही कामना करते हुए आप सबको होली की शुभकामनाएँ.

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मीडिया और अभिशासन

पिछले हफ़्ते 17 फरवरी को दिल्ली में मीडिया और अभिशासन (गनर्नेंस) पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई थी. इसकी आयोजक संस्था आईसी सेंटर फॉर गवर्नेंस है जो इससे पहले भी राष्ट्रीय स्तर अभिशासन केंद्रित कार्यक्रम आयोजित करती रही है. इस संगठन ने अभिशासन के अंतगर्त सूचना के अधिकार के मुद्दे पर बहुत सार्थक सेमीनार किए हैं जिससे सूचना अधिकार के कई पक्षों पर प्रकाश पड़ा है. यह स्वागत योग्य है कि संस्था से जुड़े भूतपूर्व बड़े सरकारी अधिकारी अभिशासन के संबंध में देशव्यापी चर्चा के लिए माहौल बना रहे हैं.

सरकारी नीतियाँ, सरकार चलाए जाने के तरीक़े, प्रशासकों की जवाबदेही, सूचना का आदान-प्रदान आदि जैसे बड़े मुद्दों पर विचार किए बिना हमारी समस्याओं का समाधान असंभव है. आज स्थिति यह है कि सरकार और जनता के बीच कोई रिश्ता नहीं है. सरकार देती है और अपेक्षा की जाती है कि जनता उसे लेगी. सरकार जनता को कैसे देती है? क्या देती है? क्यों देती है? जैसे सवालों पर विचार नहीं होता. योजनाएँ बनाने वाले बंद कमरों में बैठे अपना काम करते रहते हैं. जनता का उनसे कोई रिश्ता नहीं बन पाता. इसका नतीजा यह निकलता है कि अभिशासन मनमाने, भ्रष्ट और जनविरोधी तरीके़ अपनाने लगता है. यहाँ से वहाँ तक सुनवाई नहीं होती. लगता है सरकार बहरी और अंधी हो गई है. और निश्चित रूप से बहरी और अंधी सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं. उनका हाल मुहावरे के अंधे वाला हो जाता है जो ‘रेवड़िया’ अपने आपको ही बाँटता रहता है.

अभिशासन में मीडिया की भूमिका को महत्त्वपूर्ण स्वीकार करते हुए विशेषज्ञों का यह मत भी था कि मीडिया को अधिक विस्तार से परिभाषित करने की आवश्यकता है. आज हमारे देश में मीडिया का एक स्वरूप नहीं है. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अलावा अलग-अलग स्तरों पर काम करने वाले मीडिया के स्वभाव में अंतर है. क्षेत्रीय और स्थानीय मीडिया अभिशासन को सही दिशा देने के संबंध में क्या कर सकता है, यह भी विचार करने योग्य है. मीडिया के क्षेत्र में कम्युनिटी रेडियो की भूमिका उभर कर सामने आ रही है. लेकिन उसका स्वरूप कई कारणों से केवल मनोरंजन तक सीमित है तथा उसमें कम्युनिटी का वह योगदान नहीं है जो होना चाहिए. कम्युनिटी रेडियों भी अभिशासन संबंधी मुद्दों पर सार्थक काम कर सकता है.

दरअसल अभिशासन की मुख्य समस्या राजधानी की नहीं बल्कि देश में फैले हज़ारों छोटे शहरों और लाखों गाँवों की है. हमारे देश में बौद्धिक गतिविधियाँ बड़े शहरों तक केंद्रित होकर रह गई है. इसमें संदेह नहीं कि बड़े शहरों में आयोजित गतिविधियाँ देश में माहौल बनाती हैं. लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि अभिशासन जैसे मुद्दों पर छोटे शहरों और गाँव के स्तर पर कार्यक्रम बनाए जाएं. एक ऐसी भाषा में सामग्री उपलब्ध हो जो लोगों की समझ में आती हो.

अंतरराष्ट्रीय चेतना बहुत महत्वपूर्ण है. आज अपने आपको संसार से जोड़े बिना कुछ नहीं किया जा सकता. लेकिन इसके साथ ‘स्थानीयता’ भी बहुत आवश्यक है. उससे कट कर किया जाने वाला एक ‘बैद्धिक क्रीड़ा’ बन कर रह जाएगा. अंतरराष्ट्रीय हमें ‘आयाम’ देती है तो स्थानीयता हमें ‘आधार’ है और इन दोनों के बिना हमारा काम नहीं चल सकता.

ऐसी जानकारी मिली है कि आईसी सेंटर फॉर गवर्नेंस अपनी गतिविधियों को व्यापक आधार देने के लिए तैयार है. निश्चित रूप से यह सार्थक होगा.

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