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अतिथियों का विदा हो जाना... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अतिथि का मतलब ही होता है जो बिना तिथि के आता है और चला जाता है. हम सब अपने प्रियजनों को आमंत्रित करते हैं. लेकिन अगर कोई समारोह न हो तो वह बिना किसी तय तिथि के ही आता है. देवानंद इन पन्नों के अतिथि संपादक होकर आए. बहुत दिन विचार किया. बहुत से सवाल पूछे. फिर एक दिन हामी भरी. जब आए तो उम्रभर के अपने अनुभवों को बहुत सहजता के साथ बाँटते रहे. जिस उम्र में कोई सामान्य व्यक्ति अपने आपको समेटने लगता है, उस उम्र में देवानंद विस्तार की योजनाओं और कल्पनाओं में व्यस्त दिखे. उनकी हर चिंता में युवाओं का भविष्य शामिल दिखा. जब उनकी बातें सुनते रहने का मन लग रहा था उन्होंने सामान समेटा और चल दिए.
फिर असग़र वजाहत आए. कई दिन उनसे संवाद चलता रहा. किसी आम साहित्यकार की तरह उन्होंने कल्पनातीत विषयों पर चर्चा नहीं की. उन्होंने एक पत्रकार की तरह दुनियावी विषयों को देखा और उस पर टिप्पणियाँ लिखीं. फिर एक दिन उन्होंने भी विदा ली. देवानंद और फिर असग़र वजाहत के जाने के बाद कई दिनों तक पाठकों के पत्र मिलते रहे. लगा कि किसी को भी अच्छा नहीं लगा कि अतिथि चले जा रहे हैं. सबने कहा, याद आएगी. अब भी यदाकदा पाठक देवानंद को याद करते रहते हैं. अतिथियों की इस तरह की याद, इस समय में दुर्लभ है. ख़ासकर तब, जब अतिथि या मेहमान होने के अर्थ बदल गए हैं. जब संयुक्त परिवार होते थे और घर में जगह हमेशा कम पड़ रही होती थी तब दिल में जगह कम नहीं पड़ती थी. अब परिवार सिकुड़ रहे हैं. मकान में जगह खाली हो रही है. लेकिन दिलों की जगह सिकुड़ रही है.
अब महानगरों को तो छोड़ दीजिए, छोटे शहरों में भी अगर आप अतिथि की तरह कहीं जाना चाहते हैं तो मेज़बान से बाक़ायदा अनुमति लेनी होती है. तरह-तरह से आश्वस्त होना होता है कि मेज़बान को परेशानी तो नहीं होगी. नाराज़ तो नहीं हो जाएगा. अब ज़्यादातर लोग अतिथि के बारे में सोचने लगे हैं कि वह तिथि न ही आए तो अच्छा है. शहरों में जीवन लगातार आत्मकेंद्रित और समाज निरपेक्ष होता जा रहा है. परिचितों को और दूर-दराज़ के रिश्तेदारों को छोड़ दें, अब तो निकटतम लोग एक-दूसरे के अतिथि नहीं होते. गाँवों में अब भी रिश्तों की गर्माहट एक हद तक बची हुई है. थोड़ा दोष बदली हुई जीवनशैली का है. थोड़ा बच्चों की पढ़ाई का दबाव बढ़ जाने का है. परिवार के ज़्यादातर सदस्यों के कामकाज़ी हो जाने के बीच आतिथ्य का है और थोड़ा बजट का भी है. लेकिन अब दुनिया के एक बड़े गाँव में बदले जाने का शोर हर ओर है. दूरियाँ सिकुड़ने के दावे हो रहे हैं, तब यह दूरी थोड़ी अखरती है. लगता है कि क्या आधुनिक होने के साथ, तरक्क़ी करने के साथ हम थोड़े से पुरातन नहीं बच सकते? और कुछ नहीं तो अतिथियों के स्वागत को ही सही. फिलहाल अपने सुधीपाठकों के साथ हम फिर किसी अतिथि के आने की प्रतीक्षा करते रहेंगे. |
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