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गुरुवार, 03 मई, 2007 को 17:44 GMT तक के समाचार
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प्रेस की ज़िम्मेदारी का भी सवाल

तरह-तरह के दिवस शायद इसीलिए मनाए जाते हैं कि लोग उस दिन किसी ख़ास मुद्दे पर अच्छी-अच्छी बातें करें, आदर्श-नीति-सिद्धांत वग़ैरह पर ज़ोर दिया जाए.

तीन मई 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस' है, यह दिन प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में बातें करने के लिए मुक़र्रर है, ऐसा नहीं है कि इस दिन किसी देश में प्रेस को स्वतंत्रता मिल गई थी या उसकी स्वतंत्रता छिन गई थी.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1993 में तय किया कि अगर प्रेस की आज़ादी के बारे में तीन मई को हर वर्ष पूरी दुनिया में बात की जाए तो अच्छा रहेगा, तीन मई ही क्यों? इसका कोई जवाब मुझे नहीं मिल सका अगर आपको पता हो तो ज़रूर बताइएगा.

बहरहाल, तीन मई है इसलिए प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में कुछ बात कर ली जाए, हालाँकि प्रेस-स्वतंत्रता दिवस पर अप्रिय बातें करने का रिवाज़ नहीं है लेकिन खरी-खरी बातें तो कभी भी हो सकती हैं.

दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में प्रेस को चौथा खंभा माना जाता है, कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को जनता से जोड़ने वाला खंभा.

पत्रकारों को कई सुविधाएँ मिलती हैं जैसे कई जगहों पर आने-जाने की आज़ादी, कार्यक्रमों में बेहतर कुर्सी, टेलीफ़ोन ख़राब होने पर जल्दी ठीक करवाने की व्यवस्था, रेल के आक्षरण के लिए अलग खिड़की वग़ैरह...ताकि वे अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह ठीक से कर सकें.

ठीक उसी तरह जैसे सांसदों को टेलीफ़ोन, आवास, मुफ़्त यात्रा आदि की सुविधा दी जाती है. सांसद अपना काम ठीक से नहीं करते तो मीडिया उन पर टिप्पणी करने के लिए आज़ाद है. लेकिन जब मीडिया अपना काम ठीक से न करे तो?

दरअसल, जिन लोगों की ज़िम्मेदारी दूसरों के कामकाज की निगरानी, टीका-टिप्पणी और उस पर फ़ैसला सुनाने की होती है उनकी जवाबदेही कहीं और ज़्यादा हो जाती है.

न्यायपालिका और मीडिया इसी श्रेणी में आते हैं. पत्रकारों और जजों की ग़ैर-ज़िम्मेदारी पर चर्चा बहुत कम होती है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि उनकी ग़लतियों और उनके अपराधों की गंभीरता कम है.

पत्रकार भी समाज का ही हिस्सा हैं, समाज में भ्रष्टाचार, बेईमानी और सत्ता के दुरुपयोग की जितनी बीमारियाँ हैं उनसे पत्रकारों के बचे रहने की उम्मीद करना नासमझी है.

नाज़ुक मसला ये है कि कोई भी पत्रकार बाहर से किसी नियंत्रण को स्वीकार करने को तैयार नहीं होगा, उसे होना भी नहीं चाहिए, स्वतंत्र मीडिया न हो तो उसका कोई अर्थ ही नहीं है.

इसका एक ही जवाब है--सेल्फ रेगुलेशन यानी मीडिया अपने कामकाज की निगरानी ख़ुद करे, ऐसा करने की बातें अक्सर होती हैं लेकिन एक पत्रकार के रूप में मैं जानता हूँ कि कोई सेल्फ़ रेगुलेशन नहीं है.

अगर होता तो भारत में टीवी पर दर्शकों को वह सब नहीं झेलना पड़ता जो वे झेल रहे हैं, ग़लत ख़बरें, नियमों का उल्लंघन, संवेदनाओं की हेठी और मनमाने मानदंड...

बीच-बीच में स्टिंग ऑपरेशनों से घबराई विधायिका मीडिया नियमन लागू करने की बात करती है, प्रेस को यह अपनी आज़ादी पर ख़तरा लगता है, पत्रकार कहते हैं कि हम ख़ुद अपना नियमन कर लेंगे.

लेकिन जब तक ख़बरों के नाम पर नाग-नागिन, भूत-प्रेत, काल-कपाल चलते रहेंगे तब मीडिया के नियमन का तर्क मज़बूत होता रहेगा और सेल्फ़ रेगुलेशन की दलील कमज़ोर होती रहेगी.

मीडिया की ताक़त को बनाए रखना मीडिया के हाथ में है और विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर बात होनी चाहिए कि प्रेस की सच्ची स्वतंत्रता हमेशा कैसे बनी रहे.

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